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साक्षात्कार: पूजा शांति चौबे — "जज़्बात जो कविता बन गए"







 



  राजस्थान उच्च न्यायालय की अधिवक्ता, लेखिका एवं समाज सेविका पूजा शांति चौबे से उनके नवीनतम काव्य संग्रह "जज़्बात जो कविता बन गए" पर विशेष बातचीत

  पूजा शांति चौबे एक ऐसा नाम है जो कानून, साहित्य और समाजसेवा — तीनों क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय है। राजस्थान उच्च न्यायालय की अधिवक्ता होने के साथ साथ वे एक संवेदनशील लेखिका हैं। उनका पहला अंग्रेज़ी उपन्यास "What's Your Surname" लगभग 450 पृष्ठों का, दो भागों में प्रकाशित हो चुका है, जिस पर वेब सीरीज़ बनने की संभावना है। अब उनका दूसरा लेखन — हिंदी काव्य संग्रह "जज़्बात जो कविता बन गए" — पाठकों के बीच आ चुका है। प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश...

शीर्षक की प्रेरणा: जब भावनाएँ स्वयं कविता बन जाएँ

प्रश्न: "जज़्बात जो कविता बन गए" शीर्षक के पीछे क्या विचार था?

  पूजा जी बताती हैं — "यह शीर्षक उन भावनाओं और आत्मा की अभिव्यक्ति को समेटे हुए है, जहाँ जीवन के विभिन्न पहलुओं को कविता में ढालना था। जीवन में कुछ भाव हमें इतनी गहराई से महसूस होते हैं कि वे अपने आप कविता का स्वरूप लेने लग जाते हैं। वहीं से इस टाइटल की प्रेरणा मिली — आखिर में वो जज़्बात ही थे जो कविता बन गए।"

 व्यक्तिगत या सामाजिक? — अनुभवों की सीमा को पार करती कविता

 प्रश्न: क्या इस पुस्तक की कविताएँ आपके व्यक्तिगत अनुभवों से प्रेरित हैं या समाज के अनुभवों से?

 इस पर वे कहती हैं — "मेरा मानना है कि चाहे अनुभव व्यक्तिगत हों या सामाजिक, वे हमें किसी न किसी स्वरूप में ढालते हैं। कई बार बहुत सारी बातें मिलकर ऐसी भावनाएँ बन जाती हैं कि हम अंतर ही नहीं कर पाते कि कौन सा भाव कहाँ से उत्पन्न हुआ।"

 वे आगे कहती हैं — "यह कहना गलत होगा कि सम्पूर्ण भावनाएँ मेरी ही हैं। और न ही यह पूर्णतः सामाजिक हैं। ये कविताएँ मेरे व्यक्तिगत या सामाजिक अनुभवों से ऊपर उठकर वे सारे भाव हैं, जो मैंने कहीं देखे, सुने, मेरे अंतर्मन में प्रकट हुए और जिन्हें मैंने गहराई से महसूस किया।"

'बियॉन्ड लाइफ' — दो अध्याय जो सबसे करीब हैं

 प्रश्न: क्या इस पुस्तक का कोई ऐसा अध्याय है जो आपके सबसे अधिक करीब है?

 पूजा जी का जवाब — "अगर एक या दो चुनने हों, तो पहला — 'मृत्यु एक अंत नहीं, अल्पविराम है' और दूसरा — 'अधूरी मोहब्बत'।"

  वे समझाती हैं — "बाकी अध्याय वर्तमान जीवन की बात करते हैं, लेकिन मृत्यु वाला अध्याय एक अलग जीवन की संभावना की बात करता है — आत्मा अविनाशी है, वह दोबारा कहीं और जन्म लेगी। यानी एक अंत के बाद भी एक संभावना है। और 'अधूरी मोहब्बत' में विभिन्न कविताओं के माध्यम से एक प्रेमी जोड़े के उस वादे को व्यक्त किया गया है, जहाँ वे अगले जन्म में मिलने की बात करते हैं। क्योंकि वे इस जन्म में किसी कारणवश नहीं मिल पाए। इन दोनों अध्यायों में 'बियॉन्ड लाइफ' जैसी गहराई है।"

कविता: साहित्य या आत्मा की अभिव्यक्ति?

 प्रश्न: आपके अनुसार कविता केवल साहित्य है या आत्मा की अभिव्यक्ति?

 उनका उत्तर स्पष्ट है — "मेरे लिए तो आत्मा की अभिव्यक्ति है। और वही आत्मा की अभिव्यक्ति आगे चलकर साहित्य का रूप ले लेती है।"

अधूरापन और पूर्णता का द्वंद्व

प्रश्न: क्या अधूरापन भी इंसान को पूर्ण बना सकता है?

 इस गहन प्रश्न पर वे कहती हैं — "जब आप दुनिया के बहुत सारे लोगों से बात करते हैं, तो पाते हैं कि हर इंसान किसी न किसी प्रकार से अधूरा है। लेकिन फिर भी उनमें पूर्णता है — वे एक जगह रुके नहीं हैं, वे चल रहे हैं, लड़ रहे हैं।"

  वे आगे बताती हैं — "किसी ख्वाहिश का पूरा न होना नई ख्वाहिशों को जन्म देता है, किसी इंसान का न मिलना नए इंसानों से मिलवाता है, और किसी सपने का टूटना नई अपॉर्च्युनिटीज़ और नए सपने लेकर आता है। अधूरापन तो है, क्योंकि जो नहीं मिल पाया उसका मलाल रहेगा — लेकिन जो उसकी वजह से मिल गया, वह भी तो कहीं न कहीं पूर्णता ला ही रहा है।"

  लेखन की प्रक्रिया: भावनाओं के साथ जीने का समय

 प्रश्न: क्या आप नियमित रूप से लिखती हैं या भावनाएँ आने पर?

 पूजा जी बताती हैं — "नहीं, मैं नियमित रूप से नहीं लिखती। मुझे लिखने के लिए उस 'स्टेट ऑफ माइंड' में जाना पड़ता है — थोड़ा आइसोलेट करना पड़ता है, क्योंकि किसी भी बात को लिखने के लिए मुझे उस भाव में डूबना पड़ता है।"

 वे कहती हैं — "बहुत सारे दिनों में से कुछ ही दिन ऐसे होते हैं जब मैं किसी एक भाव को लेकर बैठ जाती हूँ। वह रोज़ नहीं होता, क्योंकि रोज़ किसी एक भाव के साथ जीवन नहीं चल सकता।"

 लेखन या जीवन — किसने किसको बदला?

प्रश्न: क्या लेखन ने आपको बदला है?

 उनका जवाब — "लेखन ने मुझे नहीं बदला। जीवन ने मुझे बहुत प्रकार से बदला है, और उसी वजह से लेखन है, और लेखन में विविधता भी है।"

 वे कहती हैं — "कई बार लोगों के लिए आश्चर्य होता है कि कोई इंसान इतने अलग अलग विषयों पर कैसे लिख सकता है। लेकिन जीवन ने मुझे विभिन्न प्रकार से बदला है। और मैं एक संवेदनशील इंसान हूँ — किसी भी बात को बहुत गहराई से महसूस करती हूँ, इसलिए अलग अलग विषयों पर लिखना मेरे लिए आसान हो जाता है।"

लेखक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी

 प्रश्न: आपके अनुसार एक लेखक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या होती है?

 पूजा जी कहती हैं — "एक लेखक की जिम्मेदारी यह होती है कि वह ऐसा लेखन करे जिसमें पाठक डूब पाए — लेकिन साथ ही अपनी किताब को ऐसी रूपरेखा दे कि जब पाठक पढ़कर बाहर निकले, तो उस विषय से संबंधित उसकी समझ पहले से बेहतर हो चुकी हो। वह किसी भँवर में न रह जाए, बल्कि वहाँ से कुछ सीखकर और समझकर जीवन में आगे बढ़े।"

पाठकों के लिए संदेश: "मरने से पहले जी लेना चाहिए"

 प्रश्न: "जज़्बात जो कविता बन गए" पढ़ने के लिए आप पाठकों से क्या कहना चाहेंगी?

 अपने पाठकों से बातचीत के अंत में पूजा जी का संदेश अत्यंत मार्मिक है —

 "मरने से पहले हमें जी लेना चाहिए। सारी अधूरी बातों को पूरा कर लेना चाहिए। कभी किसी से कुछ कहना था, तो कह देना चाहिए। कोई इकरार था, तो कर देना चाहिए। कब, कैसे और किस विषय पर क्या महसूस किया, वह भी बता देना चाहिए।"

 "दुनिया की भीड़ से कभी हटकर खुद को भी ढूँढ़ना चाहिए। और जो लोग आज हमारे पास हैं, उनकी अहमियत समय रहते समझ लेनी चाहिए।"

 पूजा शांति चौबे का यह साक्षात्कार केवल एक किताब की चर्चा नहीं है — यह जीवन, मृत्यु, प्रेम, वियोग, अधूरापन और पूर्णता के दार्शनिक पक्षों को उजागर करता है। उनकी कविताएँ, उनके शब्द और उनका दृष्टिकोण यह सिखाता है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों को समझने और जीवन को बेहतर ढंग से जीने का एक माध्यम है।

"जज़्बात जो कविता बन गए" सिर्फ एक किताब नहीं — यह उन सभी भावनाओं का आईना है, जिन्हें हम अक्सर जीते तो हैं, पर कभी कह नहीं पाते।

विशेष लेख - मध्यप्रदेश में आम उत्पादन की बढ़ती संभावनाएँ और “मैंगो फेस्टिवल 2026 - अनिल वशिष्ठ







 

    भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ उद्यानिकी फसलों के उत्पादन में भी विश्व स्तर पर अपनी मजबूत पहचान रखता है। फलों, फूलों और सब्जियों के उत्पादन के माध्यम से देश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल रही है। इसी क्रम में मध्यप्रदेश ने उद्यानिकी क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित करते हुए देश के अग्रणी राज्यों में अपना स्थान बनाया है। विशेष रूप से फल उत्पादन के क्षेत्र में प्रदेश देश में चौथे स्थान पर है। भारतवर्ष में कुल लगभग 1176 लाख मीट्रिक टन फलों का उत्पादन होता है, जिसमें से लगभग 102 लाख मीट्रिक टन उत्पादन मध्यप्रदेश में किया जा रहा है। यह उपलब्धि प्रदेश के किसानों की मेहनत, अनुकूल जलवायु और राज्य सरकार की योजनाओं का प्रतिफल है।

   फल उत्पादन की दृष्टि से यदि किसी एक फल की लोकप्रियता और आर्थिक महत्व की चर्चा की जाए तो आम का नाम सबसे पहले आता है। आम को 'फलों का राजा' कहा जाता है, मध्यप्रदेश में इसका उत्पादन निरंतर बढ़ रहा है। पिछले चार वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन करें तो प्रदेश में आम उत्पादन में लगभग 72 हजार मैट्रिक टन की वृद्धि दर्ज की गई है। यह वृद्धि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि प्रदेश के किसान अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों, विशेषकर आम उत्पादन की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं।

   मध्यप्रदेश की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियाँ आम उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल सिद्ध हो रही हैं। प्रदेश के विभिन्न अंचलों में अलग-अलग किस्मों के आम का उत्पादन किसानों को बेहतर आय उपलब्ध करा रहा है। यही कारण है कि राज्य सरकार द्वारा आम उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर योजनाबद्ध प्रयास किए जा रहे हैं।

   इसी दिशा में 13 जून 2026 को प्रदेश की राजधानी भोपाल में 'मैंगो फेस्टिवल 2026' अर्थात 'आम महोत्सव' आयोजित किया जाना प्रस्तावित है। यह आयोजन केवल एक प्रदर्शनी या उत्सव नहीं होगा, बल्कि प्रदेश के आम उत्पादक किसानों, उद्यानिकी विशेषज्ञों, व्यापारियों और उपभोक्ताओं के बीच संवाद और विपणन का महत्वपूर्ण मंच बनेगा। महोत्सव के माध्यम से प्रदेश की विभिन्न किस्मों के आमों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास किया जाएगा। साथ ही किसानों को आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन संबंधी जानकारी भी उपलब्ध कराई जाएगी।

   इस वर्ष प्रदेश के प्रमुख जिलों — अलीराजपुर, रीवा, शहडोल, सीधी, सतना, नर्मदापुरम, अनूपपुर और नरसिंहपुर में लगभग 3200 हेक्टेयर क्षेत्र में आम उत्पादन विस्तार की कार्ययोजना तैयार की गई है। यह योजना किसानों को उद्यानिकी आधारित खेती की ओर प्रेरित करेगी और प्रदेश में आम उत्पादन का दायरा और अधिक विस्तृत होगा।

   प्रदेश के लिए गौरव का विषय यह भी है कि सुंदरजा आम को अंतरराष्ट्रीय पहचान प्राप्त हुई है। रीवा जिले के प्रसिद्ध सुंदरजा आम को जीआई (Geographical Indication) टैग मिलने से न केवल इसकी विशिष्टता को वैश्विक पहचान मिली है, बल्कि इससे स्थानीय किसानों को आर्थिक लाभ और बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त होने की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। सुंदरजा आम अपनी मिठास, सुगंध और विशिष्ट स्वाद के कारण देश-विदेश में लोकप्रिय हो रहा है।

   भारत सरकार की प्राथमिकता छोटे और सीमांत किसानों को पारंपरिक खेती से आगे बढ़ाकर नकदी फसलों, फल, फूल एवं सब्जी उत्पादन की ओर प्रोत्साहित करना है। उद्यानिकी फसलें किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि इनकी बाजार में मांग निरंतर बनी रहती है और उत्पादन से अपेक्षाकृत अधिक लाभ प्राप्त होता है। आम जैसी फसलें किसानों को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता प्रदान कर सकती हैं।

   राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2026 को 'कृषि वर्ष' के रूप में मनाने का निर्णय भी इसी सोच को आगे बढ़ाने वाला कदम है। कृषि एवं उद्यानिकी क्षेत्र को सशक्त बनाने के उद्देश्य से अनेक योजनाएँ संचालित की जा रही हैं। किसानों को गुणवत्तायुक्त पौधे, तकनीकी प्रशिक्षण, सिंचाई सुविधाएँ और विपणन सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इससे प्रदेश में उद्यानिकी फसलों के प्रति किसानों का विश्वास और उत्साह बढ़ा है।

   आज आवश्यकता इस बात की है कि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक खेती और मूल्य संवर्धन के माध्यम से आम उत्पादन को और अधिक बढ़ावा दिया जाए। यदि किसानों को प्रसंस्करण इकाइयों, निर्यात सुविधाओं और बेहतर बाजार व्यवस्था से जोड़ा जाए तो मध्यप्रदेश देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आम उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

   'मैंगो फेस्टिवल' 2026” इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध होगा। यह आयोजन न केवल प्रदेश की उद्यानिकी क्षमता को प्रदर्शित करेगा, बल्कि किसानों की आय वृद्धि, कृषि विविधीकरण और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के निर्माण में भी मील का पत्थर साबित होगा। मध्यप्रदेश में आम उत्पादन के प्रति बढ़ता रुझान यह दर्शाता है कि आने वाले समय में प्रदेश उद्यानिकी क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करेगा और 'फलों के राजा' आम के माध्यम से किसानों की समृद्धि का नया अध्याय लिखा जाएगा।


   (लेखक जनसंपर्क विभाग में सहायक जनसंपर्क अधिकारी है।)

सोमनाथ और भारत की अदम्य आत्मशक्ति: पीएम मोदी का भावुक संदेश | 75वीं वर्षगांठ पर बोले –‘जय सोमनाथ’






 



जय सोमनाथ !

  वर्ष 2026 की शुरुआत में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था। अब 11 मई को मुझे एक बार फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है। इस बार यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में है। मैं उस क्षण को फिर जीने जा रहा हूं जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर का लोकार्पण किया था। उस दिन, सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर से जीवंत होगी। छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है।





 

   सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है। इसके सामने लहराता विशाल समुद्र अनंत काल की अनूभूति कराता है। इसकी लहरें हमें सिखाती हैं कि तूफान चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, मनुष्य का साहस और आत्मबल हर बार फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम है। तट से टकराती लहरें सदियों से यह उद्घोष कर रही हैं कि मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता है।

  हमारे प्राचीन शास्त्रों में लिखा है: प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसंभवम्। अर्थात दिव्य प्रभास (सोमनाथ) की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है! जब लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, तब उन्हें उस सभ्यता की अद्भुत निरंतरता का भी अनुभव होता है, जिसकी ज्योति कभी बुझाई नहीं जा सकी। कई साम्राज्य आए और गए, समय बदला और इतिहास ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे, फिर भी सोमनाथ हमारे हृदय में हमेशा बना रहा।

  यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे। लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया। चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था। समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल और आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी। ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था। कर्णदेव सोलंकी और जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना और ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया। विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की। महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया। पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर, जिनकी 300वीं जयंती मनाई जा रही है, उन्होंने सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा। बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की। इसके साथ ही हमारी यह धरती वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है। उनके साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है।








 
  1940 के दशक में स्वतंत्रता की भावना पूरे भारत में फैल रही थी। सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की नींव रखी जा रही थी। ऐसे में एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा। 13 नवंबर 1947 को, दिवाली के समय, उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, ‘’इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा। यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी।’’ उनके इस आह्वान ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष को नए उत्साह से भर दिया।








 

  दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था। इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके बावजूद, प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है। उनके विजन को के.एम. मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला। 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद, डॉ. प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर इसे ऐतिहासिक बना दिया।








  

  मुझे अक्टूबर 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब मैंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था। 31 अक्टूबर 2001 को, सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर गुजरात सरकार ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया। इसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनाई जा रही थी। इस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और तत्कालीन गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी की मौजूदगी ने इसे और भी गरिमापूर्ण बना दिया।

  11 मई 1951 को अपने भाषण में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि सोमनाथ मंदिर दुनिया को यह संदेश देता है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने आशा व्यक्त की, कि यह मंदिर सदैव लोगों के हृदय में बसा रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के पुनर्निर्माण से सरदार पटेल का सपना साकार हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सरदार पटेल की भावनाओं के अनुरूप लोगों के जीवन में समृद्धि भी लानी होगी। इसको लेकर उनके संदेश अत्यंत प्रेरणादायी रहे हैं।

  पिछले एक दशक से हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं। ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र से प्रेरित होकर सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन और त्रयंबकेश्वर से श्रीशैलम तक, हमने अपने आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया है। इसके साथ ही उनकी पारंपरिक पहचान को भी बनाए रखा है। आज बेहतर कनेक्टिविटी से ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आ पा रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है, आजीविका सुरक्षित हो रही है, साथ ही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना और सशक्त हो रही है।

  सोमनाथ की रक्षा और इसके पुनर्निर्माण के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान किया, उनका संघर्ष हम कभी नहीं भुला सकते। भारत के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों ने इसकी भव्यता और दिव्यता को लौटाने में अपना अद्भुत योगदान दिया। उनकी ऐसी ही आस्था पूरे भारतवर्ष को लेकर भी थी। वे एकता की ऐसी अद्भुत डोर से बंधे थे, जिसे जमीनी सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता। आज की विभाजित दुनिया में, सोमनाथ से मिलने वाली एकता की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। सोमनाथ अपनी गौरवशाली परंपरा के साथ हमेशा खड़ा रहेगा, क्योंकि यह हमारी साझा सभ्यता का प्रतीक है। इसी गौरव को नमन करते हुए बलिदान देने वाले वीरों की स्मृति में और दानवीरों की उदारता को याद करते हुए अगले एक हजार दिनों तक यहां विशेष पूजा आयोजित की जाएगी। यह देखकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि बड़ी संख्या में लोग इस पुनीत कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं।

  सोमनाथ हमें याद दिलाता है कि जब कोई समाज अपनी आस्था, अपनी संस्कृति और अपनी एकता से जुड़ा रहता है, तब उसे लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता। आज भी हमारी सबसे बड़ी शक्ति यही साझा चेतना है, यही एकात्म भाव है। यही भावना हमें विभाजन से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में साथ चलने की प्रेरणा देती है।







  
  मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि इस पावन अवसर पर पवित्र सोमनाथ धाम की यात्रा करें और इसकी भव्यता के साक्षात दर्शन करें। जब आप सोमनाथ के तट पर खड़े होंगे, तब उसकी प्राचीन प्रतिध्वनियों को अपने भीतर महसूस करेंगे। वहां आपको केवल भक्ति का अनुभव नहीं होगा, बल्कि उस सभ्यतागत चेतना की सशक्त धड़कन भी सुनाई देगी, जो कभी रुकी नहीं, जिसकी तीव्रता कभी कम नहीं हुई। वहां आप भारत की उस अपराजित आत्मा का अनुभव करेंगे, जिसने हर आघात के बावजूद अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखा। आप समझ पाएंगे कि इतने प्रयासों के बाद भी क्यों हमारी सभ्यता मिट नहीं सकी। वहां आपको चिर विजय के उस दर्शन का अनुभव होगा, जो सदियों से भारत की शक्ति बना हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव होगा।

जय सोमनाथ।

(नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं और श्री सोमनाथ ट्रस्ट के चेयरमैन भी हैं)

तप-साधना का अमर हिमालय: जब विश्वपूज्य गुरुदेव राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराजा साहेब के महासंकल्प ने रचा विश्व का विशालतम शब्दकोश और काल का चक्र भी नतमस्तक हो गया







 




21 अप्रैल विशेष: बड़ी दीक्षा और आचार्य पद के गौरवशाली वर्ष पर विशेष अक्षय भंडारी की रिपोर्ट 
 

 

  
  राजगढ़ (मध्य प्रदेश)। कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, कुछ इतिहास रचते हैं, लेकिन कुछ महापुरुष ऐसे होते हैं जो खुद एक जीवित 'इतिहास' बन जाते हैं। मालवा की पवित्र माटी और राजगढ़ के 'राजेन्द्र भवन' की दीवारें आज भी एक ऐसी ही अमर कहानी की गवाह हैं। यह कहानी है—त्याग, संयम और एक ऐसे अद्वितीय संकल्प की, जिसने दुनिया को 'अभिधान राजेन्द्र कोश' जैसा ज्ञान का हिमालय दिया।
  आइए,आज दिल से महसूस करते हैं 'विश्वपूज्य' श्रीमद् विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी महाराज (जिन्हें भक्त लाड़ से 'दादा गुरुदेव' कहते हैं) के उस जीवन को, जिसने प्रकृति के नियमों को भी प्रेम से झुका दिया।

 जन्म: जब एक जौहरी के घर 'असली रत्न' उतरा

 राजस्थान के भरतपुर में एक साधारण रत्न व्यापारी थे—ऋषभदास जी। उनके घर एक बालक ने जन्म लिया, नाम रखा गया 'रत्नराज'। पिता पत्थरों के रत्न परखते थे, पर बालक की आँखों में वैराग्य की चमक थी।
  कुदरत का करिश्मा देखिए, गुरुदेव का पूरा जीवन 'सप्तमी' के अंक में सिमटा रहा। उनका जन्म पौष शुक्ला सप्तमी को हुआ, उनकी समाधि के बाद अग्नि संस्कार भी सप्तमी को हुआ, और उनका सबसे महान कार्य 'अभिधान राजेन्द्र कोश' भी 7 खंडों में ही बना।

दीक्षा और आचार्य पद: एक ही तिथि का अद्भुत संयोग

  20 साल की उम्र में जब दुनिया सपनें देखती है, रत्नराज ने संसार त्याग कर दीक्षा ले ली (वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् 1904)। ठीक 20 साल बाद, उसी तिथि को उन्हें 'आचार्य' पद मिला। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि उनकी साधना का वो प्रताप था जिसने समय की सुइयों को भी एक ही बिंदु पर रोक दिया।

 'अभिधान राजेन्द्र कोश': 14.5 साल की अखंड कलम-साधना
   
 क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति 63 वर्ष की उम्र में एक ऐसा काम शुरू करे जो अगले 14.5 साल तक चले? और इस दौरान वह एक जगह रुके नहीं, बल्कि तपती धूप और कड़कड़ाती ठंड में हजारों मील पैदल (विहार) चलता रहे?
  गुरुदेव ने 14 वर्ष, 6 माह और 14 दिन तक निरंतर लिखकर 'अभिधान राजेन्द्र कोश' की रचना की।
 विशालता: इसमें 80,000 से अधिक शब्द हैं।
 वजन: इस ग्रंथ का भार लगभग 35 किलोग्राम है।
  पूर्णता: यह प्राकृत भाषा का विश्व का सबसे बड़ा और प्रामाणिक शब्दकोश माना जाता है।

लाहौर से वॉशिंगटन तक: एक वैश्विक धरोहर

  दादा गुरुदेव की यह रचना आज किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की धरोहर बन चुकी है। यही कारण है कि आज 'अभिधान राजेन्द्र कोश' दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में सम्मान के साथ रखा गया है:
 राष्ट्रपति भवन (नई दिल्ली): यहाँ के 'ग्रंथ कुटीर' में इसे सर्वोच्च स्थान प्राप्त है (एक्सेशन संख्या 15897-15899)।
 दिल्ली विश्वविद्यालय (DULS): डीयू के पुस्तकालय में इसे 'नॉट फॉर लोन' (Not for Loan) की श्रेणी में रखा गया है, यानी इसे पढ़ा तो जा सकता है पर बाहर नहीं ले जाया जा सकता—इतना दुर्लभ है यह!

 अंतरराष्ट्रीय स्तर:

 अमेरिका की विस्कॉन्सिन-मैडिसन यूनिवर्सिटी, पाकिस्तान की लाहौर यूनिवर्सिटी, साथ ही जापान और जर्मनी के शोध संस्थानों में इसे 'ज्ञान का अंतिम आधार' माना जाता है।

 जब खूंखार शेर ने झुकाया सिर: प्रकृति के साथ एकाकार

  गुरुदेव की अहिंसा केवल शब्दों में नहीं थी। एक बार राणकपुर के जंगलों में एक खूंखार शेर (वनराज) उनके सामने आ गया। शिष्य भयभीत थे, लेकिन गुरुदेव शांत थे। उन्होंने बस करुणा भरी दृष्टि से शेर को देखा। वह हिंसक पशु शांत होकर बैठ गया, मानो अपने स्वामी की वंदना कर रहा हो, और चुपचाप चला गया।

   जावरा (म.प्र.) में जब अचानक आग लगी, तो गुरुदेव ने अपने तपोबल से उसे शांत कर दिया, लेकिन अपनी इस शक्ति के प्रदर्शन के लिए तुरंत 'तेले' का कठोर उपवास (प्रायश्चित) भी किया। ऐसी थी उनकी विनम्रता।

त्रिकालदर्शी: समय की लकीरों को पढ़ने वाले

  गुरुदेव समय से पहले देख लेते थे। उन्होंने 1955 में ही अगले साल आने वाले भीषण अकाल (छप्पनियां अकाल) की भविष्यवाणी कर दी थी। यहाँ तक कि उन्होंने अपने निर्वाण (देह त्याग) का दिन और समय भी पहले ही बता दिया था।

 अंतिम विश्राम: राजगढ़ की पावन माटी

  80 वर्ष की उम्र में, राजगढ़ (धार) की इसी मिट्टी पर गुरुदेव ने अपनी अंतिम सांस ली। राजगढ़ का 'राजेन्द्र भवन' आज भी उस पावन 'पाट' को सँभाले हुए है जहाँ बैठकर गुरुदेव ने अपना देह त्याग किया था। उनका अंतिम संस्कार **श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ** में हुआ, जो आज करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है।

  अभिधान राजेन्द्र कोश केवल एक किताब नहीं, एक महापुरुष के 14.5 साल के पसीने और साधना की बूंदें हैं। राजगढ़ की माटी खुशनसीब है कि उसे ऐसे 'विश्वपूज्य' महापुरुष का सान्निध्य मिला।

  अगर आप भी ज्ञान, साधना और चमत्कार की इस त्रिवेणी को महसूस करना चाहते हैं, तो एक बार राजगढ़ के राजेन्द्र भवन और मोहनखेड़ा तीर्थ के दर्शन जरूर करें।

जय श्री राजेन्द्र सूरीश्वर!



  
 

World Navkar Day 2026 पर विशेष : महामंत्र नवकार – वैश्विक शांति और आत्म-शुद्धि का शाश्वत मार्ग : लेखक: मुनि श्री पीयूष चंद्र विजय जी | मोहनखेड़ा तीर्थ

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✍️ लेखक: मुनि श्री पीयूष चंद्र विजय जी | मोहनखेड़ा तीर्थ

  आज का आधुनिक युग जहां तकनीकी प्रगति और भौतिक उपलब्धियों के शिखर पर पहुंच चुका है, वहीं दूसरी ओर मानव जीवन में अशांति, तनाव, भय और असंतुलन भी तेजी से बढ़ रहा है। व्यक्ति बाहरी सुखों की तलाश में है, लेकिन आंतरिक शांति से दूर होता जा रहा है।

  ऐसे दौर में 9 अप्रैल को मनाया जाने वाला World Navkar Day हमें एक ऐसे दिव्य मार्ग की ओर ले जाता है, जो न केवल आत्मा को शुद्ध करता है बल्कि संपूर्ण विश्व में शांति और सद्भावना स्थापित करने की प्रेरणा देता है।

   Navkar Mahamantra जैन धर्म का मूल मंत्र है, लेकिन इसकी महिमा किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है। यह मंत्र संपूर्ण मानवता के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक है।

🟢 नवकार महामंत्र क्या है? (What is Navkar Mahamantra)

  नवकार मंत्र एक अनादि, अनंत और सार्वभौमिक मंत्र है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी व्यक्ति विशेष की स्तुति नहीं की गई, बल्कि उन श्रेष्ठ गुणों की वंदना की गई है जिन्हें धारण कर कोई भी आत्मा परमात्मा बन सकती है।

 ‘णमो अरिहंताणं’, ‘णमो सिद्धाणं’, ‘णमो आयरियाणं’, ‘णमो उवज्झायाणं’, ‘णमो लोए सव्वसाहूणं’ — ये पाँच पद आत्मा के उत्कर्ष के पाँच चरणों का प्रतीक हैं।

  यह मंत्र हमें सिखाता है कि जीवन में व्यक्तित्व नहीं, बल्कि गुण सर्वोपरि हैं।

🟢 अनादि सिद्ध मंत्र की आध्यात्मिक महिमा

 नवकार महामंत्र को जैन धर्म में सभी मंत्रों का राजा माना गया है। यह मंत्र आत्मा को उसके मूल स्वरूप की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है।

 यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत है, जो व्यक्ति के भीतर छिपी दिव्यता को जागृत करता है।

 जो व्यक्ति नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करता है, उसके भीतर:

  • क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकार कम होते हैं

  • आत्मविश्वास और धैर्य बढ़ता है

  • जीवन में संतुलन और शांति आती है

🟢 मोहनखेड़ा तीर्थ की साधना परंपरा

  मोहनखेड़ा तीर्थ जैन समाज की एक महत्वपूर्ण तपोभूमि है, जहां अनेक महान संतों ने साधना कर आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रसार किया है।

  युगप्रधान दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी महाराज ने अपने जीवन में नवकार महामंत्र को सर्वोच्च स्थान दिया। उन्होंने हर कठिन परिस्थिति में इस मंत्र को आधार बनाकर समाज को नई दिशा दी।

  उनके द्वारा रचित ‘अभिधान राजेन्द्र कोष’ और ‘क्रियोद्धार’ जैसे कार्य यह सिद्ध करते हैं कि नवकार मंत्र केवल आस्था नहीं, बल्कि जीवन परिवर्तन का माध्यम है।

🟢 नवकार मंत्र के वैज्ञानिक लाभ (Scientific Benefits)

  आधुनिक विज्ञान भी अब यह स्वीकार कर रहा है कि मंत्रों की ध्वनि तरंगें हमारे मस्तिष्क और शरीर पर गहरा प्रभाव डालती हैं।

Navkar Mantra meditation करने से:

  • मस्तिष्क शांत और स्थिर होता है

  • तनाव और चिंता कम होती है

  • शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है

  • एकाग्रता और निर्णय क्षमता बढ़ती है

 इस मंत्र को ‘सव्वपावप्पणासणो’ कहा गया है, अर्थात यह सभी प्रकार के पापों और मानसिक विकारों का नाश करने वाला है।

🟢 विश्व नवकार दिवस का उद्देश्य

 मुनि श्री पीयूष चंद्र विजय जी के अनुसार, विश्व नवकार दिवस केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह आत्म-जागरण का पर्व है।

इस दिन का वास्तविक उद्देश्य है:

  • आत्म-शुद्धि का संकल्प लेना

  • जीवन में करुणा और मैत्री को अपनाना

  • विश्व शांति के लिए सकारात्मक सोच विकसित करना

यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर शांति स्थापित कर ले, तो पूरा विश्व स्वतः शांत और सुखी हो सकता है।

🟢 नवकार मंत्र: विश्व शांति का मार्ग

 आज जब विश्व विभिन्न संघर्षों, विचारधाराओं और असंतुलन से जूझ रहा है, तब नवकार महामंत्र एक ऐसा सार्वभौमिक समाधान प्रस्तुत करता है, जो सभी सीमाओं से परे है।

यह मंत्र हमें सिखाता है:
👉 किसी से द्वेष नहीं
👉 सभी के प्रति करुणा
👉 आत्मा की शुद्धि ही सर्वोच्च लक्ष्य

🟢 निष्कर्ष 

 इस पावन अवसर पर आइए हम सभी यह संकल्प लें कि प्रतिदिन श्रद्धा, विश्वास और नियमितता के साथ Navkar Mahamantra का जाप करेंगे।

 यह मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि जीवन को बदलने वाली दिव्य शक्ति है।
यदि इसे सच्चे मन से अपनाया जाए, तो यह न केवल हमारे जीवन को, बल्कि पूरे विश्व को शांति, प्रेम और सद्भावना से भर सकता है।

 “नवकार महामंत्र से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न”

❓ नवकार महामंत्र क्या है?

  नवकार महामंत्र जैन धर्म का सबसे पवित्र और प्राचीन मंत्र है। इसमें किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि अरिहंत, सिद्ध,आचार्य, उपाध्याय और साधु के गुणों की वंदना की जाती है।


❓ विश्व नवकार दिवस कब मनाया जाता है?

  विश्व नवकार दिवस हर वर्ष 9 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिन नवकार मंत्र के जाप और उसके महत्व को समझने का विशेष अवसर होता है।


❓ नवकार मंत्र के क्या लाभ हैं?

नियमित रूप से नवकार मंत्र का जाप करने से:

  • मानसिक शांति मिलती है

  • तनाव और चिंता कम होती है

  • सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है

  • आत्म-शुद्धि होती है


❓ क्या नवकार मंत्र वैज्ञानिक रूप से लाभकारी है?

  हाँ, आधुनिक शोध के अनुसार मंत्रों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। नवकार मंत्र ध्यान और मानसिक संतुलन में मदद करता है।


❓ क्या नवकार मंत्र किसी भी धर्म का व्यक्ति जप सकता है?

  हाँ, नवकार मंत्र सार्वभौमिक है। यह किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है, इसलिए कोई भी व्यक्ति इसे जप सकता है और इसके लाभ प्राप्त कर सकता है।


❓ नवकार मंत्र का सही उच्चारण कैसे करें?

 नवकार मंत्र का उच्चारण शुद्ध भाव और ध्यान के साथ करना चाहिए। धीरे-धीरे और स्पष्ट उच्चारण करने से इसका अधिक लाभ मिलता है।



विश्व नवकार दिवस (9 अप्रैल 2026) : णमोकार महामंत्र: श्रद्धा,समता और आत्मशुद्धि का शाश्वत मंत्र - श्रमण डॉ पुष्पेंद्र






 


 
  जैन धर्म की आराधना परंपरा में णमोकार महामंत्र को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, समता और विनय का सार्वभौमिक संदेश है। इसकी महिमा का उल्लेख प्राचीन जैन आगम ग्रंथ भगवती सूत्र के प्रारम्भ में महामंगल वाक्य के रूप में मिलता है.- “णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं।” यह मंत्र अनादि और अविनाशी माना गया है। सभी तीर्थंकरों ने इसकी महत्ता को स्वीकार किया है। इसे जैन धर्म का मूल मंत्र और जिनागम का सार कहा जाता है।

गुण-पूजा का अद्वितीय संदेश

  णमोकार महामंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी व्यक्ति-विशेष या देवता की स्तुति नहीं की गई, बल्कि उनके गुणों को नमन किया गया है। यह व्यक्ति-पूजा नहीं, बल्कि गुण-पूजा का संदेश देता है। इसमें किसी प्रकार की याचना या कामना नहीं है, केवल निस्वार्थ श्रद्धा, समर्पण और आत्मशुद्धि का भाव है। यही कारण है कि यह मंत्र किसी एक संप्रदाय या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वभौमिक और सर्वग्राह्य है।

    णमोकार महामंत्र में पांच पद है, ३५ अक्षर है। इनमें ११ अक्षर लघु हैं, २४ गुरु हैं, १५ दीर्घ हैं और २० हस्व हैं। ३५ स्वर हैं और ३४ व्यंजन हैं। यह एक अद्वितीय बीज संयोजना है। 'णमो अरिहंताणं' में सात अक्षर है, 'णमो सिद्धाणं' में पांच अक्षर हैं, 'णमो आयरियाणं' में सात अक्षर हैं, 'णमो उवज्झायाणं' में सात अक्षर है, 'णमो लोए सव्व साहूणं' में नौ अक्षर हैं। इस प्रकार इस महामंत्र में कुल ३५ अक्षर हैं। स्वर और व्यंजन का विश्लेषण करने पर 'नमो अरिहंताणं' में ७ स्वर और ६ व्यंजन हैं, 'नमो सिद्धाणं' में ५ स्वर और ६ व्यंजन हैं, 'नमो उवज्झायाणं' में ७ स्वर और ७ ही व्यंजन हैं। 'नमो लोए सव्व साहूणं' में ६ स्वर तथा ६ व्यंजन हैं। इस प्रकार नमोकार महामंत्र में ३५ स्वर और ३४ व्यंजन हैं। यह महामंत्र जैन आराधना और साधना का ध्रुव केन्द्र है, इसकी शक्ति अपरिमेय है। इस महामंत्र के वर्णों के संयोजन पर चिन्तन करें तो यह बड़ा अद्भुत और पूर्ण वैज्ञानिक है। इसके बीजाक्षरों को आधुनिक शब्द विज्ञान की कसौटी पर कसने पर साधक यह पाते हैं कि इसमें विलक्षण ऊर्जा है और शक्ति का भण्डार छिपा हुआ है। प्रत्येक अक्षर का विशिष्ट अर्थ है, प्रयोजन और सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता है।

पंच परमेष्ठियों का वंदन

   इस मंत्र में पंच परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया हैकृअरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु। अरिहंत वे हैं जिन्होंने अपने आंतरिक शत्रुओंकृराग, द्वेष, मोह और वासनाओं पर विजय प्राप्त कर सर्वज्ञता को उपलब्ध किया। सिद्ध वे मुक्त आत्माएँ हैं जो जन्म-मृत्यु के चक्र से परे मोक्ष में स्थित हैं।
आचार्य संघ के आध्यात्मिक पथप्रदर्शक हैं। उपाध्याय शास्त्रों के ज्ञाता एवं अध्यापक हैं। साधु वे तपस्वी आत्माएँ हैं जो आत्मकल्याण और लोककल्याण हेतु धर्म का आचरण करती हैं। जैन दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक उत्कर्ष में न तो वेष बाधक है और न ही लिंग। स्त्री हो या पुरुष, सभी आत्मिक उन्नति के अधिकारी हैं।

साधना और मानसिक शांति

  श्रद्धा,शुद्ध उच्चारण और एकाग्र भाव से णमोकार महामंत्र का जप मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। शास्त्रों में इसे “सर्व पापों का नाश करने वाला और परम मंगलकारी” कहा गया है। प्रत्येक अक्षर स्वयं में मंत्रस्वरूप है और इसका जप किसी भी क्रम में किया जा सकता है। ध्यानपूर्वक जप करने से चित्त की चंचलता कम होती है और साधक आत्मस्वरूप के निकट पहुँचता है। यह मंत्र हमें भीतर की पवित्र चेतना से जोड़ता है।

भाषिक एवं वैज्ञानिक संरचना

   णमोकार महामंत्र प्राकृत भाषा में रचित है और इसकी रचना आर्या छंद में की गई है। इसके पाँच मुख्य पदों में कुल ३५ अक्षर माने गए हैं। ध्वनि-विज्ञान की दृष्टि से इसमें लघु-गुरु, ह्रस्व-दीर्घ वर्णों का संतुलित संयोजन है। स्वर और व्यंजन की विशिष्ट व्यवस्था इसे अद्वितीय बीज-संरचना प्रदान करती है।
  आधुनिक ध्वनि-विज्ञान के अनुसार, मंत्रोच्चारण से उत्पन्न कंपन मानसिक और शारीरिक संतुलन में सहायक होते हैं। प्रत्येक अक्षर में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मजागरण की क्षमता निहित है।

आत्मजागरण का मार्ग

  णमोकार महामंत्र बाह्य आडंबरों से हटाकर साधक को आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाता है। इसमें भौतिक उपलब्धियों की कामना नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का मार्ग निहित है। यह समता, विनय और करुणा का संदेश देता है।
   वास्तव में, णमोकार महामंत्र केवल जैन धर्म का मूल मंत्र नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए आत्मजागरण का शाश्वत उद्घोष है। गुणों की आराधना ही आत्मा को परम शांति और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करती है और यही इस महामंत्र का सार है।

श्रीराम और तीर्थंकर महावीर के बीच वंश परंपरा का मधुर संबंध - श्रमण डॉ पुष्पेन्द्र ।





 

 




  चैत्र महीने का सीधा संबंध महापुरुषों के जन्मों के साथ जुड़ा हुआ है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्मोत्सव आता है तो जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक (जन्म जयंती) भी चैत्र महीने में ही शुक्ल की त्रयोदशी को मनाया जाता है।
  
   इन दो महान व्यक्तित्वों का जन्म चैत्र माह में ही सिर्फ 4 तिथियों के अंतर पर हुआ। हालांकि दोनों के जन्म में हजारों वर्षों का अंतर है। फिर भी दोनों के बीच एक मधुर, गहरा और अद्भुत संबंध है।

  भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर हैं। इस महान परंपरा की तीर्थंकर परंपरा के प्रथमेश असि, मसि कृषि व अंक शब्दों के जनक प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) से हुआ, जो कि पहले तीर्थंकर थे। भगवान आदिनाथ अयोध्या के राजा नाभि के पुत्र के रूप में जन्मे। यानी अयोध्या न केवल श्रीराम की जन्मभूमि रही है, बल्कि जैन परंपरा में भी अत्यंत पवित्र स्थान है, क्योंकि यहां चार अन्य तीर्थंकरों का जन्म भी हुआ अजितनाथ (दूसरे), अभिनंदननाथ (चौथे), सुमतिनाथ (पांचवें) और अनंतनाथ (14वें)।

  संयोग से,भगवान आदिनाथ का जन्म भी चैत्र मास में ही हुआ था। हालांकि वह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। उन्होंने सूर्यवंश की इक्ष्वाकु परंपरा की स्थापना की, वही वंश जिसमें कई पीढ़ियों बाद भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। इस सदी के चौबीस तीर्थंकरो में से तीन तीर्थंकरों, वासु पूज्य स्वामी, मुनि सुव्रतनाथ व नेमिनाथ तीर्थंकर को छोड़कर बाक़ी इक्कीस तीर्थंकर इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न हुए। इस प्रकार, भगवान महावीर की जैन परंपरा और भगवान श्रीराम की वंशावली दोनों की जड़ें भगवान आदिनाथ से जुड़ती हैं।
   त्रिशष्टिशलाका पुरुषचरियं, पउम चरियं, पद्मपुराण साहित्यक ग्रंथों में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का उल्लेख सम्मिलित है। चौथे आरे के बीसवें तीर्थंकर मुनि सुव्रत स्वामी के समय में श्रीराम का उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य अनुसार श्रीराम को बलदेव माना गया है जो कि 63श्लाघ्य पुरुष में आते हैं, तो एक दार्शनिक परंपरा है, दूसरी जैविक। यह संबंध केवल भूगोल, वंश और नामों तक सीमित नहीं है। यह गहराई तक विचार और मूल्य व्यवस्था में रचा-बसा है। चाहे तीर्थंकर हों या श्रीराम, सभी ने धर्म की भावना को जीवन का मूल बनाया। इक्ष्वाकु वंश का नाम ही 'इक्षु' अर्थात गन्ने से लिया गया है। सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्यावासी गन्ने की खेती करते थे थे और उसका रस निकालना जानते थे। यह बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब हम पाते हैं कि भगवान ऋषभदेव ने अपने पौत्र श्रेयांस कुमार के हाथों हस्तिनापुर शहर में अपने 400 दिवसीय उपवास को अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस को स्वीकर कर उस कठिन तपस्या का पारणा संपन्न किया।

   विस्तृत गहराई से अगर अध्ययन किया जाए तो दोनों महापुरुषों ने सत्य, धर्म व सात्विक जीवन शैली तथा पर पीड़ा नहीं पहुँचाने का प्रयास ही नहीं किया अपितु जनमानस को संदेश भी दिया।
  अनेक प्रकार से देखा और समझा जा सकता है कि मूलतः धर्म की आत्मा हमें यह सिखाती है कि मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है। चाहे वो तीर्थंकर हों या मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। धर्म वह स्वभाव है जो हर मानव के भीतर प्राकृतिक रूप से निहित है।

  तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर ने वर्तमान समय में व्यथित व कुंठित जनमानस को संदेश देते हुए कहा कि सर्व प्रथम मन पर नियंत्रण बनाना होगा। मन हमेशा दुख देता है। मन की इच्छाएँ अनंत हैं, वह कभी भी पूर्ण नहीं होता है। अगर एक इच्छा पूरी होगी तो उसके साथ सौ नई इच्छाएँ शुरू हो जाएँगी। ऐसे में सभी इच्छाएँ पूरी होंगी, इसकी कल्पना भी संभव नहीं है। जैसे ही इच्छा अपूर्ण हुई, मन विचलित होगा और दुख देगा। यही दुख और दूसरी इच्छाओं के अपूर्ण होने पर बढ़ता जाएगा। एक समय यह आएगा कि अनंत इच्छाओं की अपूर्णता लिए मन दुखों का अंबार उडेल देगा और पूरा जीवन दुखों के भंवर में उलझ जाएगा। बेहतर यही है कि मन पर नियंत्रण बनाओ और उसके साथ जीवन की इच्छाओं पर भी। अगर हम यह करने में सफल रहे तो गृहस्थ में रहकर भी मुक्ति का मार्ग पकड़ लेंगे। हम अनंत इच्छाओं के समुद्र में रहकर भी शांत और सुखी रहेंगे। सुख कोई वस्तु नहीं है, यह केवल मन की अवस्था है। दुख कोई वस्तु नहीं है, यह भी अवस्था है। अगर मन पर नियंत्रण होगा तो सुख और दुख की अवस्था पर भी नियंत्रण होगा। अगर मन नियंत्रित होगा तो इच्छाओं पर नियंत्रण होगा और जब इच्छाएँ नियंत्रण में आ जाएँगी, जीवन प्रसन्नता से भर जाएगा और जीव आनंद की अनुभूति करेगा। जीवन में मुक्ति क्या है... आनंद ही तो है। जब आनंद की अवस्था मिल गई तो समझ लो जीवन से मुक्ति मिल गई। उस अवस्था को पाने का प्रयास ही मुक्ति का मार्ग है।
  यही मुक्ति का मार्ग तीर्थंकर वर्द्धमान ने व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने स्वीकार किया तभी वर्षों उपंरात भी उनके कथन सदैव जीवन में नया संदेश देते है।

ishuflac (Ishwar Kumar) कौन हैं? Musical Artist,Web Developer और Lens Creator की कहानी

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ishuflac (Ishwar Kumar) – Musical Artist, Web Developer और Lens Creator

  ishuflac, जिनका असली नाम Ishwar Kumar है, एक भारतीय Musical Artist, Web Developer और Lens Creator हैं। उन्होंने डिजिटल क्रिएटिव दुनिया में अपनी पहचान धीरे-धीरे मेहनत और निरंतर प्रयास से बनाई है।

 आज के समय में वे उन नए डिजिटल क्रिएटर्स में शामिल हैं जो संगीत, टेक्नोलॉजी और डिजिटल क्रिएटिविटी को एक साथ जोड़कर काम करते हैं।

 उनकी यात्रा यह दिखाती है कि इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से कोई भी व्यक्ति अपनी प्रतिभा को दुनिया तक पहुँचा सकता है।

शुरुआती रुचि: संगीत और तकनीक

 कम उम्र से ही Ishwar Kumar को संगीत और डिजिटल तकनीक में गहरी रुचि थी। जहाँ संगीत उन्हें भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम देता था, वहीं टेक्नोलॉजी उन्हें नई संभावनाओं की दुनिया दिखाती थी।

साल 2016 में उन्होंने आधिकारिक रूप से अपनी क्रिएटिव यात्रा शुरू की। इसी समय उन्होंने:

  • म्यूजिक प्रोडक्शन सीखना
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म समझना
  • ऑनलाइन कंटेंट बनाना

 जैसी चीज़ों पर काम करना शुरू किया। शुरुआती समय में उनका फोकस सीखने और अपने स्किल्स को बेहतर बनाने पर था।

म्यूजिक करियर की शुरुआत

 म्यूजिक उनकी क्रिएटिव यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। शुरुआती वर्षों में उनका मुख्य लक्ष्य था:

  • म्यूजिक प्रोडक्शन को समझना
  • अपना यूनिक साउंड बनाना
  • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर गाने रिलीज करना

 धीरे-धीरे उन्होंने अपने गाने इंटरनेट पर शेयर करने शुरू किए और समय के साथ उनका म्यूजिक अधिक लोगों तक पहुँचने लगा।

 आज कई इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट की तरह उन्होंने भी डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से अपने म्यूजिक को दुनिया तक पहुँचाया।

2022 में वायरल सफलता

 हालाँकि उन्होंने अपनी यात्रा 2016 में शुरू की थी, लेकिन उनके करियर का बड़ा मोड़ 2022 में आया।

इस दौरान उनके कुछ गाने इंटरनेट और सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगे और कई म्यूजिक कम्युनिटी में वायरल हो गए।

इस वायरल सफलता के कारण:

  • उनकी पहचान तेजी से बढ़ी
  • नए श्रोताओं तक उनका म्यूजिक पहुँचा
  • डिजिटल म्यूजिक स्पेस में उन्हें पहचान मिली

यही समय उनके करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन गया।

Augmented Reality और Lens Creation

 म्यूजिक के अलावा ishuflac ने एक और दिलचस्प क्षेत्र में काम करना शुरू किया — Augmented Reality (AR)

  उन्होंने Lens Creator के रूप में काम करना शुरू किया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए इंटरएक्टिव फिल्टर और डिजिटल इफेक्ट्स बनाना शुरू किया।

ये लेंस यूज़र्स को अपने स्मार्टफोन कैमरा के जरिए डिजिटल इफेक्ट्स के साथ इंटरैक्ट करने का मौका देते हैं।

उन्होंने कई प्लेटफॉर्म के लिए लेंस बनाए, जिनमें शामिल हैं:

  • Snapchat
  • YouTube Effects

Snapchat Profile:

Web Developer के रूप में करियर

म्यूजिक और AR के अलावा Ishwar Kumar वेब डेवलपमेंट में भी सक्रिय हैं।

टेक्नोलॉजी में रुचि होने के कारण उन्होंने वेबसाइट और डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाना भी सीखा।

एक Web Developer के रूप में वे:

  • वेबसाइट बनाते हैं
  • डिजिटल प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं
  • आधुनिक वेब टेक्नोलॉजी का उपयोग करते हैं

 वेब डेवलपमेंट की जानकारी उन्हें अपनी डिजिटल पहचान और प्रोजेक्ट्स को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद करती है।

सोशल मीडिया और ऑनलाइन उपस्थिति

 आज के समय में डिजिटल क्रिएटर्स के लिए सोशल मीडिया बहुत महत्वपूर्ण है। ishuflac भी अपने फॉलोअर्स से जुड़े रहने के लिए कई प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं।

Instagram:

YouTube:

एक मल्टी-टैलेंटेड डिजिटल क्रिएटर

 ishuflac की सबसे खास बात यह है कि वे केवल एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं।

वे एक साथ कई क्षेत्रों में काम करते हैं:

  • Musical Artist
  • AR Lens Creator
  • Web Developer

 इस तरह वे कला और तकनीक दोनों को मिलाकर नए डिजिटल अनुभव तैयार करते हैं।

भविष्य की योजनाएँ

डिजिटल दुनिया लगातार बदल रही है और Ishwar Kumar भी नए अवसरों की तलाश में आगे बढ़ रहे हैं।

भविष्य में वे:

  • नया म्यूजिक बनाना
  • डिजिटल प्रोजेक्ट्स विकसित करना
  • नई क्रिएटिव टेक्नोलॉजी पर प्रयोग करना

जारी रखना चाहते हैं।

 2016 से शुरू हुई उनकी यात्रा और 2022 में मिली पहचान यह साबित करती है कि लगातार मेहनत और धैर्य से सफलता मिल सकती है।

मेरी व्यथा… – डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)





 



  दफ्तर की खामोशी बहुत कुछ कहती है। दिनभर की चहल-पहल के बाद जब कुर्सियाँ खाली हो जाती हैं, कंप्यूटर स्क्रीन्स बंद हो जाती हैं और बालकनी में सन्नाटा फैल जाता है, तब एक उद्योगपति का मन अक्सर सवालों से भर जाता है। क्या यह वही सपना है, जिसे कभी शून्य से शुरू किया था? क्या यह वही संस्थान है, जिसे अपने खून-पसीने से सींचा था? और क्या यह वही टीम है, जिसे साथ लेकर भविष्य की इमारत खड़ी करने का संकल्प लिया था?
   यह केवल मेरी नहीं, उन तमाम उद्योगपतियों की व्यथा है, जिन्होंने एक विचार से शुरुआत की। जिनके पास शुरुआत में पूँजी कम थी, पर हौसला बड़ा था। एक छोटी-सी मेज, सीमित संसाधन, अनिश्चित भविष्य लेकिन एक स्पष्ट लक्ष्य। उस समय हर कर्मचारी, हर सहयोगी, हर साझेदार को यह एहसास था कि यदि आज हमने पूरी ताकत नहीं लगाई, तो कल शायद यह अवसर न बचे। तब संस्थान 'किसी एक का' नहीं था; वह संघर्ष सबका था।
   समय बदला, संस्थान बढ़ा, संरचना मजबूत हुई। छोटे दफ्तर की जगह बड़ी बिल्डिंग ने ले ली। कुछ कर्मचारी प्रबंधक बने, कुछ प्रशिक्षु विशेषज्ञ बने। कारोबार स्थिर हुआ, ब्रांड बना, बाजार में पहचान बनी। पर इसी विकास के साथ एक बदलाव भी आया, अपनापन धीरे-धीरे जिम्मेदारी में बदल गया, और जिम्मेदारी धीरे-धीरे औपचारिकता में। एक उद्योगपति की व्यथा यहीं से शुरू होती है।
   वह देखता है कि शाम पाँच बजते ही घड़ियाँ देखने की आदत बढ़ गई है। प्रोजेक्ट 'मेरे हिस्से का' और 'तुम्हारे हिस्से का' बन गए हैं। ग्राहक की समस्या अब व्यक्तिगत चुनौती नहीं, विभागीय फाइल बन गई है। वेतन की तारीख याद रहती है, पर लक्ष्य की तारीख धुंधली हो जाती है। संस्थान, जो कभी साझा सपना था, अब कई लोगों के लिए सिर्फ नौकरी का स्थान बनकर रह गया है।
   एक बॉस के रूप में वह शिकायत नहीं करता। उसे मालूम है कि नेतृत्व की जिम्मेदारी उसी ने चुनी है। बैंक का कर्ज, निवेशकों का भरोसा, ग्राहकों की अपेक्षाएँ और कर्मचारियों के परिवारों की सुरक्षा, इन सबका भार अंततः उसी के कंधों पर आता है। जब बाकी लोग घर लौटते हैं, वह अगले महीने की रणनीति बनाता है। जब टीम छुट्टी पर होती है, वह संभावित जोखिमों की गणना करता है। यह उसका कर्तव्य है, और वह उससे पीछे नहीं हटता। पर उसकी व्यथा यह नहीं कि उसे अधिक काम करना पड़ता है। उसकी व्यथा यह है कि वह अकेला महसूस करने लगता है, उस यात्रा में, जो कभी सामूहिक थी।
   हर उद्योगपति चाहता है कि उसकी टीम उसे 'सर' या 'मालिक' भर न माने, बल्कि एक सहभागी समझे। वह चाहता है कि कर्मचारी यह महसूस करें कि जिस कुर्सी पर वे बैठे हैं, जिस वेतन से उनका घर चलता है, जिस पहचान से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है, वह सब एक साझा प्रयास का परिणाम है। कंपनी केवल पूँजी से नहीं बनती; वह विश्वास, समर्पण और स्वामित्व की भावना से बनती है।
   समस्या यह नहीं कि आज के कर्मचारी सक्षम नहीं हैं। वे प्रतिभाशाली हैं, शिक्षित हैं, तकनीकी रूप से दक्ष हैं। समस्या यह है कि संस्थान से भावनात्मक जुड़ाव कम होता जा रहा है। जब संगठन छोटा था, हर निर्णय जीवन-मरण जैसा लगता था। आज संरचना बड़ी है, प्रक्रियाएँ जटिल हैं, और व्यक्तिगत योगदान का प्रभाव दिखाई कम देता है। परिणामस्वरूप, 'यह मेरा भी है' वाली भावना धुंधली पड़ने लगती है।
   यह व्यथा केवल उद्योगपति की ही नहीं, बल्कि नेतृत्व की उस भूमिका की है जो समझती है कि संस्थान एक जीवित इकाई है। वह मशीन नहीं, जिसे एक बार चालू कर दिया जाए और वह स्वयं चलती रहे। उसे हर दिन विचारों की, प्रतिबद्धता की और विश्वास की ऊर्जा चाहिए।
   सच्चाई यह है कि अधिकतर कर्मचारी ईमानदार होते हैं। वे मेहनत करते हैं, सीखना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं। पर उन्हें बार-बार यह याद दिलाने की आवश्यकता होती है कि वे केवल वेतनभोगी नहीं, बल्कि निर्माता भी हैं। उद्योगपति की सबसे बड़ी चुनौती यही है 'सपने को साझा सपना बनाए रखना'।
  एक उद्योगपति की व्यथा का निचोड़ यही है कि वह अपनी कंपनी को अगली ऊँचाई पर ले जाना चाहता है, पर अकेले नहीं। वह चाहता है कि टीम लक्ष्य को 'कंपनी का लक्ष्य' नहीं, 'अपना लक्ष्य' माने। वह चाहता है कि कर्मचारी केवल कार्य-घंटों की गणना न करें, बल्कि योगदान की गुणवत्ता को भी मापें। वह चाहता है कि संस्थान पर गर्व केवल बोर्डरूम तक सीमित न रहे, बल्कि हर डेस्क तक पहुँचे।
   पर इसके साथ ही उद्योगपति को भी आत्ममंथन करना होता है। क्या उसने संवाद कम कर दिया? क्या उसने विकास की कहानी साझा करना छोड़ दिया? क्या उसने यह मान लिया कि लोग स्वतः समझ रहे हैं? नेतृत्व का अर्थ केवल दिशा देना नहीं, बल्कि निरंतर संवाद बनाए रखना भी है।
  आज आवश्यकता किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि पुनः जागृत विश्वास की है। जब कर्मचारी संस्थान को अपना मानते हैं, तो वे केवल काम नहीं करते, वे निर्माण करते हैं। और जब उद्योगपति अपनी टीम को सहभागी मानता है, तो वह केवल प्रबंधन नहीं करता, बल्कि प्रेरित करता है।
  'मेरी व्यथा…' दरअसल एक पुकार है, साझेदारी की, स्वामित्व की और उस सामूहिक संकल्प की, जिसने कभी एक छोटे से विचार को बड़े संस्थान में बदला था। यदि यह भावना फिर से जीवित हो जाए, तो कोई भी कंपनी केवल बाजार में नहीं, इतिहास में भी अपनी पहचान बना सकती है।

उल्लास का उत्सव भगोरिया मेला - क्रांतिदीप अलूने




 


  भगोरिया मेला प्रदेश के झाबुआ, आलीराजपुर आलीराजपुर, खरगौन, बड़वानी और धार के भील, भिलाला और बारेला जनजाति द्वारा होली से सात दिन पहले मनाया जाने वाला सात दिवसीय प्रसिद्ध जनजातीय उत्सव है। फसल कटाई का जश्न होली के सात दिन पहले शुरू होने वाला यह मेला, फसल कटाई के बाद जनजातीय समुदाय द्वारा उल्लास के साथ मनाए जाने वाला का त्यौहार है। भगोरिया में पारम्परिक रूप से जीवन साथी चुनने, रंग-गुलाल लगाने, नृत्य-संगीत और खरीदारी करने की उदात्त भावनाएँ मुखरता से प्रदर्शित होती है।

  फागुन महीने में जब चारों ओर प्रकृति में नया उल्लास होता हैं तब पश्चिम निमाड़ से झाबुआ तक के जनजातीय क्षेत्रों के साप्ताहिक हाट बाजार भगोरिया के रंग में रंगे होते हैं। मेले में हर तरफ फागुन और इन्द्रधनुषी प्रेम के रंग नज़र आते हैं। इन मेलों में मुख्य रूप से होली के लिए खरीददारी करने के लिए लोग आते हैं। गैर जनजातीय समुदाय के लिए भी भगौरिया के साप्ताहिक हाट बाजार विशिष्ट होते हैं। इसका सभी व्यापारियों को भी इंतजार रहता है। इसमें दुकानदार साल भर की कमाई, भगोरिया के साप्ताहिक बाजार से कर लेते हैं। भगोरिया हाट (बाजार) में जरूरत की वस्तुएं, मिठाइयाँ और पारंपरिक आभूषण बिकते हैं।

  भगोरिया मेले में बड़े-बड़े ढोल और मांदल की थाप पर पारंपरिक आदिवासी नृत्य किया जाता है, जिसमें विभिन्न दल ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं। वाद्य यंत्रों के साथ शामिल होने वाले विभिन्न दल एक ही रंग के वस्त्रों में अपनी अलग पहचान के साथ छटा बिखेरते हैं। महिलाओं के साथ पुरूष भी चांदी के आभूषणों से सज्जित होकर पारम्परिक वाद्य यंत्रों की ताल पर थिरकते हैं। चांदी के आभूषण भील जनजाति में समृद्धि के प्रतीक हैं।

  भगोरिया मेल-मिलाप, आनंद और उल्लास का उत्सव है। माना जाता है कि इसमें युवा अपनी पसंद के साथी को गुलाल लगाकर या पान खिलाकर अपने प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं। भगोरिया में मनपसंद के साथी के साथ भागकर विवाह करने की मान्यता भी प्रचलित है।

  भगोरिया पर्व होली के सात दिन पहले से शुरू होकर होलिका दहन तक चलता है। यह मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के झाबुआ, आलीराजपुर, धार, बड़वानी और खरगोन जिलों के विभिन्न गाँवों में साप्ताहिक बाजार के दिन आयोजित होता है। भगोरिया मेला आदिवासी संस्कृति, उमंग और जीवन को करीब से जानने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है।

वालपुर का प्रसिद्ध भगोरिया

 आलीराजपुर जिले के वालपुर का भगोरिया मेला अपनी ऐतिहासिक प्राचीनता, आदिवासी संस्कृति के जीवंत रंगों और अनूठी पारंपरिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है।

 किंवदंती है कि इस मेले की शुरुआत राजा भोज के समय में भील राजाओं द्वारा की गई थी। आलीराजपुर जिले के वालपुर में तीन प्रांतों की जनजातीय संस्कृति के रंग दिखाई देते हैं। यह स्थान तीन प्रांतों (मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, और गुजरात के निकट) की सांस्कृतिक संस्कृति का संगम स्थल होने के कारण भी विशेष जाना जाता है। वालपुर का मेला आदिवासी संस्कृति और आधुनिकता का एक अद्भुत मिश्रण है, जहाँ पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों के साथ, ढोल-मांदल की थाप पर आदिवासी युवा थिरकते हैं।

भगोरिया प्रदेश में राजकीय उत्सव

  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 4 मार्च 2025 को 'भगोरिया पर्व' को मुख्यमंत्री निवास में आयोजित जनजातीय देवलोक महोत्सव में राजकीय उत्सव किया। उन्होंने कहा कि भगोरिया उल्लास का पर्व है। यह फागुन के रंगों से सराबोर प्रकृति की खुशबू में कुछ पल थम जाने और इसी में रम जाने का पर्व है। हमारी सरकार भगोरिया का उल्लास बरकरार रखेगी।

  वर्ष 2026 में भगोरिया महोत्सव 24 फरवरी मंगलवार से प्रारंभ होगा। यह 2 मार्च सोमवार तक चलेगा। बड़वानी जिले में सोमवार 2 मार्च को निवाली में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भगोरिया महोत्सव में शामिल होंगे।

 (लेखक उप संचालक जनसम्पर्क हैं)


वेनेज़ुएला पर अमेरिका के सैन्य हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी सही या गलत : एक वैश्विक विवाद - डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

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डॉ. अतुल मलिकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

  इंदौर : वैश्विक राजनीति में एक नया, बेहद विवादास्पद तथा इतिहास बनाने वाला अध्याय जुड़ गया है। 3 जनवरी 2026 की रात अमेरिका ने दक्षिण अमेरिकी देश वेनेज़ुएला की राजधानी कराकास पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला किया और मात्र आधे घंटे के भीतर वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ़्तार कर लिया। इस ऑपरेशन ने दुनिया भर में तीखी, गहन तथा बहुआयामी बहस छेड़ दी है। एक तरफ इसे तानाशाही के खिलाफ न्याय की जीत, दमनकारी शासन के अंत तथा लोकतंत्र बहाली की दिशा में निर्णायक कदम बताया जा रहा है, तो दूसरी तरफ इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन, संप्रभुता पर हमला तथा साम्राज्यवादी हस्तक्षेप माना जा रहा है। प्रख्यात राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम का कहना है कि “वेनेज़ुएला पर अमेरिका का हमला और मादुरो की गिरफ़्तारी एक जटिल, बहुआयामी, ऐतिहासिक तथा वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाली घटना है। यह कार्रवाई न केवल वेनेज़ुएला के भविष्य को प्रभावित करेगी, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता, क्षेत्रीय स्थिरता, विकासशील देशों की संप्रभुता तथा बड़े देशों की एकतरफा कार्रवाइयों पर भी गहरा, दीर्घकालिक तथा अप्रत्याशित असर डालेगी। भारत जैसे देशों को इस घटना से सतर्कता बरतने, कूटनीतिक सबक लेने तथा अपनी रक्षा, सुरक्षा तथा विदेश नीति की रणनीति को और अधिक मजबूत करने की प्रेरणा लेनी चाहिए।”


   घटना का पूरा ब्यौरा बेहद चौंकाने वाला तथा फिल्मी पटकथा जैसा है। 3 जनवरी 2026 की रात कराकास में कई जोरदार धमाकों ने पूरे शहर को हिलाकर रख दिया। अमेरिकी लड़ाकू विमान तथा हेलीकॉप्टरों ने कराकास के सैन्य ठिकानों पर सटीक हमले किए। ऑपरेशन इतना तेज तथा सुनियोजित था कि वेनेज़ुएला की रक्षा प्रणाली जवाब नहीं दे सकी। अमेरिकी विशेष बलों ने राष्ट्रपति भवन में घुसकर मादुरो तथा उनकी पत्नी को गिरफ़्तार किया। मादुरो दंपती को अमेरिका ले जाकर न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन डिटेंशन सेंटर में रखा गया है, जहां उन पर नारको-टेररिज्म, मादक पदार्थ तस्करी तथा हथियारों की तस्करी जैसे गंभीर आरोपों में मुकदमा चलेगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस ऑपरेशन को “सफल कार्रवाई” बताया और दावा किया कि मादुरो ड्रग तस्करी तथा नारको-टेररिज्म में शामिल थे।


  इस कार्रवाई की पृष्ठभूमि कई वर्षों की है। मादुरो पर 2020 से ही अमेरिकी अदालत में आरोप थे और उनकी गिरफ़्तारी के लिए इनाम घोषित था। ट्रंप ने इसे अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी बताया। लेकिन इस कार्रवाई ने वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं उकसाईं।

  अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई नारको-टेररिज्म के खिलाफ थी। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि मादुरो तथा उनकी सरकार मादक पदार्थ तस्करी में शामिल थी। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका वेनेज़ुएला में स्थिरता के लिए भूमिका निभाएगा। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का मानना है कि मादुरो का शासन दमनकारी था। वेनेज़ुएला में आर्थिक संकट, भुखमरी तथा मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें थीं। लाखों लोग देश छोड़कर भाग गए। समर्थकों का कहना है कि मादुरो की गिरफ़्तारी लोकतंत्र बहाली का कदम हो सकती है।

  विरोधी पक्ष इस कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन मानता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार, किसी संप्रभु देश पर हमला तभी वैध है जब वह आत्मरक्षा में हो या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी हो। विरोधी कहते हैं कि यह हमला तेल संसाधनों पर कब्जे की साजिश थी। वेनेज़ुएला के पास दुनिया के बड़े तेल भंडार हैं। इतिहास में अमेरिका के हस्तक्षेप अस्थिरता लाए हैं।

  भारत ने इस घटना पर गहरी चिंता जताई और संयम व संवाद की अपील की। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत संप्रभुता का सम्मान करता है।

  यह कार्रवाई नैतिक रूप से जटिल है। मादुरो का शासन दमनकारी था, लेकिन अमेरिका का तरीका अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन लगता है। कानूनी मानदंड से देखें तो यह गलत प्रतीत होता है। लेकिन सुरक्षा के नजरिए से कुछ के लिए जरूरी था।

  वेनेज़ुएला पर अमेरिका का हमला और मादुरो की गिरफ़्तारी एक ऐतिहासिक घटना है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगी। डॉ. मलिकराम कहते हैं कि “यह घटना सतर्कता का संदेश है। भारत को अपनी रणनीति मजबूत करनी होगी।”

विशेष लेख : सुशासन,संवेदना और महिला सशक्तिकरण : मध्यप्रदेश में ‘मोहन मॉडल’ का सजीव अनुभव · श्रीमती संपतिया उइके

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   जब आज से दो वर्ष पूर्व डॉ. मोहन यादव ने मध्यप्रदेश के 19वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की थी, तभी यह आभास होने लगा था कि उनका नेतृत्व केवल प्रशासनिक स्थिरता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह शासन को एक 'नैतिक, सामाजिक और मानवीय दिशा' देने का प्रयास करेगा। सत्ता की बागडोर संभालने के कुछ ही दिनों के भीतर यह स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे कि वे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विश्वासपात्र मुख्यमंत्रियों की सूची में शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान सुनिश्चित करेंगे। इसका कारण केवल राजनीतिक सामंजस्य नहीं, बल्कि नीति, नीयत और क्रियान्वयन का संतुलन था।

  मैं स्वयं एक साधारण श्रमिक पृष्ठभूमि से आती हूँ। जीवन में संघर्ष, अभाव और श्रम का अनुभव मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा मुझे मंत्रीमंडल का हिस्सा बनाना केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह उस समावेशी सोच का प्रमाण था, जिसमें पृष्ठभूमि नहीं, प्रतिबद्धता और कार्यक्षमता को महत्व दिया जाता है। मंत्रीमंडल में उन्होंने सभी साथियों के साथ समभाव और समानता का व्यवहार रखा और व्यवहार में उस लोककथन को चरितार्थ किया।

“मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान सब एक”

  यह केवल कहावत नहीं, बल्कि उनके शासन का स्वभाव बन चुका है।आज डॉ. मोहन यादव की पहचान केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि “सबके भैया” के रूप में बन चुकी है। मेरे मंडला जिले में आयोजित एक सामूहिक कार्यक्रम के दौरान मैंने सहज भाव से कहा था “हमारे भैया आज सब बहनों के भाई बन गए हैं।”

  आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो गर्व होता है कि वह नारा प्रदेश की लाखों बहनों की भावना बन गया। यह पहचान किसी प्रचार अभियान से नहीं बनी, बल्कि उनके व्यवहार, संवाद और संवेदना से निर्मित हुई है।

  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कार्यकाल के आरंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि महिला सशक्तिकरण उनकी सरकार के लिए केवल एक योजनागत प्राथमिकता नहीं, बल्कि नैतिक प्रतिबद्धता है। यही कारण है कि पूर्ववर्ती सरकार द्वारा प्रारंभ की गई योजनाओं को न केवल निरंतरता दी गई, बल्कि उन्हें और अधिक प्रभावी, पारदर्शी और व्यापक स्वरूप प्रदान किया गया। साथ ही प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विशेष आग्रह पर कई नई योजनाओं की शुरुआत की गई, जिनका उद्देश्य महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर सशक्त बनाना था।

  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा लिखे गए ब्लॉग में यह दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है। उन्होंने भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए यह भरोसा दिलाया कि सरकार महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उनका यह कथन अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जब महिलाएँ आर्थिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से सशक्त होंगी, तभी परिवार, समाज और राष्ट्र मजबूत होंगे।

   लाड़ली बहना योजना आज मध्यप्रदेश सरकार की पहचान बन चुकी है। लगभग 1.26 करोड़ महिलाओं के खातों में प्रतिमाह 1500 रुपये की राशि का नियमित अंतरण न केवल आर्थिक सहायता है, बल्कि राज्य और नागरिक के बीच विश्वास का सेतु भी है। इस राशि को चरणबद्ध रूप से 3 हजार रुपये प्रतिमाह करने की घोषणा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार इस योजना को अल्पकालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक निवेश के रूप में देख रही है।

  इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इससे महिलाएँ डिजिटल लेन-देन से जुड़ रही हैं और वित्तीय निर्णयों में उनकी भागीदारी बढ़ी है। हाल ही में योजना की 31वीं किश्त जारी करते हुए मुख्यमंत्री का यह कहना कि “बहनों का आशीर्वाद हमारी सबसे बड़ी ताकत है”, उनके नेतृत्व की भावनात्मक गहराई को दर्शाता है।

   महिला सशक्तिकरण को केवल प्रत्यक्ष सहायता तक सीमित न रखते हुए सरकार ने महिलाओं को उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर करने पर विशेष ध्यान दिया है। लखपति दीदी योजना के माध्यम से स्व-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए प्रति वर्ष एक लाख रुपये की आय का लक्ष्य रखा गया है। मुख्यमंत्री उद्यम शक्ति योजना महिलाओं को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराकर स्वयं का व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

  आज यह तथ्य अत्यंत उत्साहवर्धक है कि प्रदेश में 47 प्रतिशत स्टार्टअप्स महिलाओं द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। रेडीमेड गारमेंट उद्योग में कार्यरत महिलाओं को 5 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि देना और “एक बगिया माँ के नाम” योजना के अंतर्गत फलदार पौधरोपण- ये सभी पहल इस बात का प्रमाण हैं कि सरकार महिलाओं को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि आर्थिक भागीदार बनाना चाहती है।

  महिलाओं के लिए आर्थिक सशक्तिकरण के साथ सुरक्षा और अवसर भी उतने ही आवश्यक हैं। इसी सोच के तहत राज्य सरकार की नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण को 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 प्रतिशत किया गया है। संपत्ति पंजीयन शुल्क में एक प्रतिशत की छूट और कामकाजी महिलाओं के लिए 'सखी निवास' के रूप में सुरक्षित आवास सुविधाओं का विस्तार, ये सभी निर्णय महिला हितों के प्रति सरकार की गंभीरता को दर्शाते हैं।

  मुख्यमंत्री डॉ. यादव द्वारा अपने पुत्र का विवाह सार्वजनिक सामूहिक विवाह समारोह में संपन्न कराना आज के समय में एक विरल उदाहरण है। जब विवाह सामाजिक प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हों, तब यह कदम उन परिवारों के लिए आशा का संदेश है, जो सीमित साधनों में बच्चों के भविष्य की चिंता करते हैं। यह उदाहरण सिद्ध करता है कि मुख्यमंत्री की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है।

  मध्यप्रदेश में पिछले दो वर्षों में महिला सशक्तिकरण की दिशा में जो कार्य हुए हैं, वे अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। फिर भी मुख्यमंत्री डॉ. यादव कहते हैं कि उन्हें प्रशंसा नहीं केवल बहनों का आशीर्वाद चाहिए। यही आशीर्वाद उन्हें निष्ठा, ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ अपने कर्तव्यों के निर्वहन की प्रेरणा देता है।

  एक मंत्री, एक महिला और एक जनप्रतिनिधि के रूप में मुझे गर्व है कि मैं इस परिवर्तनकारी यात्रा की सहभागी हूँ। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश आज सुशासन, संवेदना और समावेशी विकास की दिशा में एक सशक्त उदाहरण बनकर उभर रहा है।


 (लेखिका मध्यप्रदेश शासन की लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री है)