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केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर ने मोहनखेड़ा महातीर्थ में किए गुरु दर्शन,मुनिराज पीयूषचन्द्र विजयजी से लिया आशीर्वाद






 




 राजगढ़ (धार)। केंद्रीय राज्यमंत्री एवं क्षेत्रीय सांसद श्रीमती सावित्री ठाकुर ने प्रसिद्ध जैन तीर्थ मोहनखेड़ा महातीर्थ पहुंचकर भगवान आदिनाथ के दर्शन किए। इस दौरान उन्होंने जैन श्वेतांबर समाज के महान संत और 'अभिधान राजेंद्र कोष' के रचयिता श्रीमद विजय राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराज साहेब की समाधि स्थल पर मत्था टेककर वंदन किया। इस अवसर पर श्री आदिनाथ राजेंद्र जैन श्वेतांबर पेढ़ी ट्रस्ट मंडल द्वारा केंद्रीय मंत्री का भव्य बहुमान किया गया।

    श्रीमती ठाकुर ने मोहनखेड़ा महातीर्थ के विकास प्रेरक आचार्य प्रवर श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्र सूरीश्वरजी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य और राजगढ़ नंदन मुनिराज श्री पीयूषचन्द्र विजयजी महाराज साहेब से भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। मुनि श्री वर्तमान में सप्तम वर्षीतप की कठिन साधना में लीन हैं। भेंट के दौरान मुनि श्री ने केंद्रीय मंत्री को आगामी धार्मिक कार्यक्रमों की जानकारी दी और धर्म चर्चा की।

 इस गरिमामयी अवसर पर मैनेजिंग ट्रस्टी सुजानमल सेठ,अशोक भंडारी,राकेश राजावत, अजय राजावत,नवीन बानिया और अक्षय भंडारी सहित बड़ी संख्या में गुरुभक्त और समाजजन उपस्थित रहे।

राष्ट्रीय मंच पर अलीगढ़ का गौरव: गीतकार डॉ. अवनीश राही को मिलेगा "अटल बिहारी वाजपेयी कवि रत्न सम्मान–2026 "





 

23 मार्च 26 दिल्ली/अलीगढ़ हिंदी साहित्य और गीत-सृजन के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर चुके अलीगढ़ के प्रख्यात गीतकार डॉ. अवनीश राही को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित “अटल बिहारी वाजपेयी कवि रत्न सम्मान” प्रदान किया जाएगा।

यह सम्मान आगामी 2 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में आयोजित एक गरिमामयी राष्ट्रीय समारोह में प्रदान किया जाएगा, जिसका आयोजन इंडिया ए आई न्यूज समूह द्वारा किया जा रहा है। इस अवसर पर दिल्ली की माननीय मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता, केंद्रीय मंत्री श्री रामदास अठावले तथा केंद्रीय राज्य मंत्री श्री सतीश चंद्र दुबे के करकमलों द्वारा डॉ. राही को सम्मानित किया जाएगा।



इंडिया ए आई न्यूज समूह के चेयरमैन श्री विनय सिंह द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, इस सम्मान समारोह में देशभर से साहित्यकार, शिक्षाविद, समाजसेवी एवं उद्यमी भी शिरकत करेंगे।

डॉ. अवनीश राही पिछले चार दशकों से हिंदी साहित्य, गीत-लेखन और सामाजिक चेतना से जुड़े सृजन के माध्यम से अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। उनके लेखन में समाज के वंचित वर्ग, मानवीय संवेदनाएँ और समकालीन यथार्थ की प्रभावी अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी डॉ. राही को विद्या-वाचस्पति (मानद डॉक्टरेट), दिल्ली विधानसभा में “भारत विभूषण” सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

उनकी रचनाएँ साहित्यिक मंचों से लेकर राष्ट्रीय आयोजनों तक व्यापक रूप से सराही गई हैं और वे साहित्य को सामाजिक जागरूकता एवं परिवर्तन का सशक्त माध्यम मानते हैं।

यह सम्मान उनके निरंतर सृजन, साहित्यिक प्रतिबद्धता और समाज के प्रति उनकी संवेदनशील दृष्टि का एक और राष्ट्रीय स्वीकार है।

इस उपलब्धि से अलीगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदी साहित्य जगत में हर्ष की लहर है। विभिन्न साहित्यकारों, सामाजिक संगठनों एवं शुभचिंतकों द्वारा उन्हें अग्रिम बधाइयाँ दी जा रही हैं।

श्रीराम और तीर्थंकर महावीर के बीच वंश परंपरा का मधुर संबंध - श्रमण डॉ पुष्पेन्द्र ।





 

 




  चैत्र महीने का सीधा संबंध महापुरुषों के जन्मों के साथ जुड़ा हुआ है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्मोत्सव आता है तो जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक (जन्म जयंती) भी चैत्र महीने में ही शुक्ल की त्रयोदशी को मनाया जाता है।
  
   इन दो महान व्यक्तित्वों का जन्म चैत्र माह में ही सिर्फ 4 तिथियों के अंतर पर हुआ। हालांकि दोनों के जन्म में हजारों वर्षों का अंतर है। फिर भी दोनों के बीच एक मधुर, गहरा और अद्भुत संबंध है।

  भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर हैं। इस महान परंपरा की तीर्थंकर परंपरा के प्रथमेश असि, मसि कृषि व अंक शब्दों के जनक प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) से हुआ, जो कि पहले तीर्थंकर थे। भगवान आदिनाथ अयोध्या के राजा नाभि के पुत्र के रूप में जन्मे। यानी अयोध्या न केवल श्रीराम की जन्मभूमि रही है, बल्कि जैन परंपरा में भी अत्यंत पवित्र स्थान है, क्योंकि यहां चार अन्य तीर्थंकरों का जन्म भी हुआ अजितनाथ (दूसरे), अभिनंदननाथ (चौथे), सुमतिनाथ (पांचवें) और अनंतनाथ (14वें)।

  संयोग से,भगवान आदिनाथ का जन्म भी चैत्र मास में ही हुआ था। हालांकि वह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। उन्होंने सूर्यवंश की इक्ष्वाकु परंपरा की स्थापना की, वही वंश जिसमें कई पीढ़ियों बाद भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। इस सदी के चौबीस तीर्थंकरो में से तीन तीर्थंकरों, वासु पूज्य स्वामी, मुनि सुव्रतनाथ व नेमिनाथ तीर्थंकर को छोड़कर बाक़ी इक्कीस तीर्थंकर इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न हुए। इस प्रकार, भगवान महावीर की जैन परंपरा और भगवान श्रीराम की वंशावली दोनों की जड़ें भगवान आदिनाथ से जुड़ती हैं।
   त्रिशष्टिशलाका पुरुषचरियं, पउम चरियं, पद्मपुराण साहित्यक ग्रंथों में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का उल्लेख सम्मिलित है। चौथे आरे के बीसवें तीर्थंकर मुनि सुव्रत स्वामी के समय में श्रीराम का उल्लेख मिलता है। जैन साहित्य अनुसार श्रीराम को बलदेव माना गया है जो कि 63श्लाघ्य पुरुष में आते हैं, तो एक दार्शनिक परंपरा है, दूसरी जैविक। यह संबंध केवल भूगोल, वंश और नामों तक सीमित नहीं है। यह गहराई तक विचार और मूल्य व्यवस्था में रचा-बसा है। चाहे तीर्थंकर हों या श्रीराम, सभी ने धर्म की भावना को जीवन का मूल बनाया। इक्ष्वाकु वंश का नाम ही 'इक्षु' अर्थात गन्ने से लिया गया है। सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्यावासी गन्ने की खेती करते थे थे और उसका रस निकालना जानते थे। यह बात तब और स्पष्ट हो जाती है जब हम पाते हैं कि भगवान ऋषभदेव ने अपने पौत्र श्रेयांस कुमार के हाथों हस्तिनापुर शहर में अपने 400 दिवसीय उपवास को अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस को स्वीकर कर उस कठिन तपस्या का पारणा संपन्न किया।

   विस्तृत गहराई से अगर अध्ययन किया जाए तो दोनों महापुरुषों ने सत्य, धर्म व सात्विक जीवन शैली तथा पर पीड़ा नहीं पहुँचाने का प्रयास ही नहीं किया अपितु जनमानस को संदेश भी दिया।
  अनेक प्रकार से देखा और समझा जा सकता है कि मूलतः धर्म की आत्मा हमें यह सिखाती है कि मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है। चाहे वो तीर्थंकर हों या मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। धर्म वह स्वभाव है जो हर मानव के भीतर प्राकृतिक रूप से निहित है।

  तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर ने वर्तमान समय में व्यथित व कुंठित जनमानस को संदेश देते हुए कहा कि सर्व प्रथम मन पर नियंत्रण बनाना होगा। मन हमेशा दुख देता है। मन की इच्छाएँ अनंत हैं, वह कभी भी पूर्ण नहीं होता है। अगर एक इच्छा पूरी होगी तो उसके साथ सौ नई इच्छाएँ शुरू हो जाएँगी। ऐसे में सभी इच्छाएँ पूरी होंगी, इसकी कल्पना भी संभव नहीं है। जैसे ही इच्छा अपूर्ण हुई, मन विचलित होगा और दुख देगा। यही दुख और दूसरी इच्छाओं के अपूर्ण होने पर बढ़ता जाएगा। एक समय यह आएगा कि अनंत इच्छाओं की अपूर्णता लिए मन दुखों का अंबार उडेल देगा और पूरा जीवन दुखों के भंवर में उलझ जाएगा। बेहतर यही है कि मन पर नियंत्रण बनाओ और उसके साथ जीवन की इच्छाओं पर भी। अगर हम यह करने में सफल रहे तो गृहस्थ में रहकर भी मुक्ति का मार्ग पकड़ लेंगे। हम अनंत इच्छाओं के समुद्र में रहकर भी शांत और सुखी रहेंगे। सुख कोई वस्तु नहीं है, यह केवल मन की अवस्था है। दुख कोई वस्तु नहीं है, यह भी अवस्था है। अगर मन पर नियंत्रण होगा तो सुख और दुख की अवस्था पर भी नियंत्रण होगा। अगर मन नियंत्रित होगा तो इच्छाओं पर नियंत्रण होगा और जब इच्छाएँ नियंत्रण में आ जाएँगी, जीवन प्रसन्नता से भर जाएगा और जीव आनंद की अनुभूति करेगा। जीवन में मुक्ति क्या है... आनंद ही तो है। जब आनंद की अवस्था मिल गई तो समझ लो जीवन से मुक्ति मिल गई। उस अवस्था को पाने का प्रयास ही मुक्ति का मार्ग है।
  यही मुक्ति का मार्ग तीर्थंकर वर्द्धमान ने व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने स्वीकार किया तभी वर्षों उपंरात भी उनके कथन सदैव जीवन में नया संदेश देते है।

राजगढ़ में मुनि श्री पीयूषचन्द्र विजयजी का भव्य मंगल प्रवेश: गुरु के बिना ज्ञान संभव नहीं,अहिंसा ही धर्म का सच्चा मार्ग







 




  राजगढ़ (धार)। मोहनखेड़ा महातीर्थ विकास प्रेरक आचार्य प्रवर श्रीमद्विजय ऋषभचन्द सूरीश्वरजी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य, राजगढ़ नंदन और सप्तम वर्षीतप के तपस्वी मुनिराज श्री पीयूषचन्द्र विजयजी महाराज साहेब का राजगढ़ नगर में अत्यंत भव्य और मंगलमय प्रवेश संपन्न हुआ। मुनि श्री की अगवानी प्रातः काल हेमकमल धाम मंदिर (पुराना बस स्टैंड) से की गई, जहाँ समाज के प्रबुद्धजनों अशोक भंडारी, संदीप खजांची, राजेंद्र बाफना, संजय पुराणी, सुनील चत्तर, राजेश फरबदा, नीलेश पुराणी, दिलीप मेहता, सुनील फरबदा, सुरेश मालवी, सुनील छजलानी, पप्पू गादिया ,महेंद्र मोदी और राजेंद्र भंडारी, शैलेष जैन,नीलेश सराफ,संदीप जैन पारस गादिया आदि ने उपस्थित होकर मुनि श्री का आत्मीय स्वागत और वंदन किया।
    
  नगर प्रवेश के पश्चात राजेंद्र भवन में मुनि श्री की महिला मंडल ने आगवानी कर गहुली की जिसके पश्चात धर्मसभा जिसमें मुनि श्री पीयूषचन्द्र विजयजी ने सारगर्भित उद्बोधन देते हुए कहा कि जीवन में संत और गुरु का होना अनिवार्य है क्योंकि गुरु ही हमें सही बोध कराते हैं। उन्होंने समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि आज लोग सांप से तो डरते हैं, लेकिन पाप करने से नहीं डरते, जबकि पाप का भय ही मनुष्य को सन्मार्ग पर रखता है। जैन धर्म की मूल भावना अहिंसा और शांति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने संवाद के महत्व को समझाया और कहा कि जीवन में संवाद आवश्यक है, अन्यथा विवादों में वृद्धि होती है। इस पावन अवसर पर मुनि श्री के वर्षीतप के उपलक्ष्य में राजेंद्र भवन में चौबीसी का भव्य आयोजन भी हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में समाज की महिलाओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर धर्म लाभ लिया। मुनि श्री पीयूष चंद्र विजयजी मसा का बुधवार को मोहनखेड़ा तीर्थ सुबह विहार करेंगे ।

शहादत दिवस पर “कौन थे वो लोग” कविता में जमशेदपुर की कवयित्री रीना सिन्हा ने क्रांतिकारियों का साहस दिखाकर युवा पीढ़ी को प्रेरित किया

 

कौन थे वो लोग – शहादत दिवस पर विशेष

शहीद भगत सिंह की याद में कविता ने जगाई देशभक्ति की भावना

23 मार्च को पूरे देश में शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत को याद किया गया। इस अवसर पर कई साहित्यिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित हुए, जहाँ देशभक्ति से ओतप्रोत कविताओं और लेखों के माध्यम से युवाओं को प्रेरित किया गया। इसी क्रम में कवयित्री रीना सिन्हा "सलोनी" की कविता "कौन थे वो लोग" विशेष रूप से चर्चा में रही।

कविता में उन क्रांतिकारियों के संघर्ष को दर्शाया गया है, जो जेल की काल कोठरियों में भी अपने विचारों को जिंदा रखते थे। यह रचना आज की पीढ़ी को यह संदेश देती है कि आजादी अनगिनत बलिदानों का परिणाम है।

पढ़िए पूरी कविता:

कौन थे वो लोग कौन थे वो लोग जो कैद में भी लिखते रहे जेल की दीवारों पर अपनी नाखूनों से खुरच खुरच कर क्रांतिकारी कविताएँ… वो कौन लोग थे जो खाना पानी नहीं काग़ज़ कलम और अखबार माँगा करते जो लिखते थे ख़त देशवासियों के नाम, और पहुँच जाते थे दूर गांवों और शहरों में विचारों का तूफान बनकर… वो कैसे बंदी थे जिनसे डरती थीं सरकारें और हुक्मरान, जिन्हें चुप करने को पूरा सिस्टम चीख उठा था, वो कौन लोग थे जिनकी बातें ही नहीं चुप्पी भी सुनी जाती थी सात समंदर पार तक… वो कैसे लोग थे जिन्हें उपवास से मिलती थी ताक़त, और जिनके मुँह में कौर ठूसने को जेलर और सिपाही लगा देते थे पूरा जोर वो कौन लोग थे जिनके बमों की धमक से हिल जाती थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव… कौन थे वो लोग जो भरी जवानी में छोड़ आए अपना घर, गाँव, परिवार, जिनकी दुल्हन आज़ादी थी, जिन्हें अपनी माँ की नहीं भारत माँ की फिक्र थी… वो कौन थे जिन्हें दे दी गई फाँसी चुपचाप आधी रात को, जो फंदे को चूमकर झूल गए हँसते हुए, वो कौन थे जिनकी लाशों से इतनी भयभीत थी सरकार कि उन्हें टुकड़ों में काटकर जला दिया गया चुपचाप… वो कैसे लोग थे जो जेल में क़ैद होकर भी मुक्त थे, वो कौन लोग हैं जो मर कर भी नहीं मरे, वो लोग भी आम ही थे बस इतनी ही खासियत रही उनमें वो झुके नहीं, टूटे नहीं आखिरी साँस तक ….
~ रीना सिन्हा "सलोनी"

द लीजेंड ऑफ़ उधम सिंह, भावनात्मक और प्रेरणादायक कहानी ने जीता दर्शकों का दिल

 

वसीम अमरोही के दमदार अभिनय और सशक्त निर्देशन ने फ़िल्म को बनाया प्रभावशाली, वेव्स ओटीटी पर देशभक्ति कंटेंट की मजबूत पेशकश

देशभक्ति पर आधारित फ़िल्म द लीजेंड ऑफ़ उधम सिंह दर्शकों के सामने एक सशक्त और भावनात्मक कहानी पेश करती है। यह फिल्म बिना किसी अनावश्यक जटिलता के सीधे अपने मूल विषय पर केंद्रित रहती है, जिससे इसकी कहानी और भी प्रभावशाली बन जाती है। दर्शकों को एक ऐसी यात्रा पर ले जाया जाता है जो गहराई से जुड़ाव और गर्व की भावना पैदा करती है। वेव्स ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म लगातार देशभक्ति से जुड़ी कहानियों को बढ़ावा दे रहा है, और यह फिल्म उसी दिशा में एक मजबूत कदम है। इस तरह की सार्थक फिल्मों के माध्यम से प्लेटफ़ॉर्म न केवल इतिहास को जीवंत करता है, बल्कि युवा दर्शकों को भी आकर्षित करने में सफल होता दिख रहा है। अगर इसी तरह का कंटेंट जारी रहा, तो यह बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को कड़ी टक्कर दे सकता है।

फ़िल्म में वसीम अमरोही ने मुख्य भूमिका निभाई है और उनका अभिनय संतुलित और प्रभावशाली है। उन्होंने उधम सिंह के किरदार को बेहद सादगी और दृढ़ता के साथ प्रस्तुत किया है। बिना किसी अतिशयोक्ति के, उनका प्रदर्शन कहानी को मजबूती देता है और दर्शकों को किरदार से जोड़ता है। कहानी का भावनात्मक केंद्र जलियांवाला बाग नरसंहार की घटना है, जिसने उधम सिंह के जीवन को गहराई से प्रभावित किया। फिल्म इस ऐतिहासिक घटना के असर को संवेदनशीलता के साथ दिखाती है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत बनती है। कई दृश्य दर्शकों को भावुक कर देते हैं और देशभक्ति की भावना को मजबूत करते हैं।

सहायक कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ कहानी को मजबूती दी है। अफ़सर अमरोही और ख़ुशबू खान ने सधी हुई एक्टिंग की है, जबकि राजेश दुबेय कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों में खास प्रभाव छोड़ते हैं। भगत सिंह के रूप में सत्यम तिवारी की छोटी लेकिन असरदार उपस्थिति फिल्म में अतिरिक्त भावनात्मक गहराई जोड़ती है। द लीजेंड ऑफ़ उधम सिंह एक प्रेरणादायक और भावनात्मक फिल्म है जो दर्शकों को इतिहास से जोड़ने के साथ-साथ गर्व की भावना भी जगाती है। यह फिल्म खासकर उन लोगों के लिए एक बेहतरीन अनुभव है जो अर्थपूर्ण और प्रभावशाली सिनेमा देखना पसंद करते हैं।

जमशेदपुर के वरिष्ठ अधिवक्ता केवल कृष्ण के निधन पर शोक, विधि समुदाय में शोक की लहर

 

पांच दशकों तक ईमानदारी और समर्पण से की वकालत, 81 वर्ष की आयु में निधन

जमशेदपुर: शहर के प्रख्यात वरिष्ठ अधिवक्ता केवल कृष्ण, जिन्हें स्नेहपूर्वक “केवल बाबू” के नाम से जाना जाता था, का शनिवार, 21 मार्च की देर रात लगभग 2:00 बजे टाटा मेन हॉस्पिटल (TMH) में निधन हो गया। वह 81 वर्ष के थे। उनके निधन से जमशेदपुर के विधि समुदाय में गहरा शोक व्याप्त है।

भुइयांडीह निवासी केवल कृष्ण ने वर्ष 1974 में अपने विधिक करियर की शुरुआत की थी। पांच दशकों से अधिक समय तक उन्होंने पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ वकालत की। अपने सादगीपूर्ण जीवन और सिद्धांतों पर अडिग रहने के कारण वह अधिवक्ताओं के बीच अत्यंत सम्मानित थे। उनके निधन के साथ ही स्थानीय बार में एक युग का अंत माना जा रहा है। उनके सम्मान में जिला बार एसोसिएशन ने सोमवार, 23 मार्च को न्यायिक कार्य के दूसरे सत्र में कार्य से विरत रहने की घोषणा की है। झारखंड स्टेट बार काउंसिल के उपाध्यक्ष राजेश कुमार शुक्ला ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि केवल कृष्ण का योगदान विधि क्षेत्र के लिए सदैव स्मरणीय रहेगा।

इस दौरान बार एसोसिएशन के कई पदाधिकारियों एवं अधिवक्ताओं ने शोक व्यक्त किया, जिनमें अध्यक्ष रत्नेंद्र नाथ दास, उपाध्यक्ष बलई पांडा, महासचिव कुमार राजेश रंजन, संयुक्त सचिव विनीता सिंह एवं संजीव रंजन बरियार, कोषाध्यक्ष जयप्रकाश भक्त, कार्यकारिणी सदस्य अभय कुमार सिंह और आलोक सिंह शामिल हैं। इसके अलावा अधिवक्ता अक्षय कुमार झा, मिथिलेश सिंह और राजीव नयन ओझा सहित कई अन्य अधिवक्ताओं ने भी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। जमशेदपुर का विधि समुदाय आज एक ऐसे व्यक्तित्व को खो चुका है, जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।