राजस्थान उच्च न्यायालय की अधिवक्ता, लेखिका एवं समाज सेविका पूजा शांति चौबे से उनके नवीनतम काव्य संग्रह "जज़्बात जो कविता बन गए" पर विशेष बातचीत
पूजा शांति चौबे एक ऐसा नाम है जो कानून, साहित्य और समाजसेवा — तीनों क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय है। राजस्थान उच्च न्यायालय की अधिवक्ता होने के साथ साथ वे एक संवेदनशील लेखिका हैं। उनका पहला अंग्रेज़ी उपन्यास "What's Your Surname" लगभग 450 पृष्ठों का, दो भागों में प्रकाशित हो चुका है, जिस पर वेब सीरीज़ बनने की संभावना है। अब उनका दूसरा लेखन — हिंदी काव्य संग्रह "जज़्बात जो कविता बन गए" — पाठकों के बीच आ चुका है। प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश...
शीर्षक की प्रेरणा: जब भावनाएँ स्वयं कविता बन जाएँ
प्रश्न: "जज़्बात जो कविता बन गए" शीर्षक के पीछे क्या विचार था?
पूजा जी बताती हैं — "यह शीर्षक उन भावनाओं और आत्मा की अभिव्यक्ति को समेटे हुए है, जहाँ जीवन के विभिन्न पहलुओं को कविता में ढालना था। जीवन में कुछ भाव हमें इतनी गहराई से महसूस होते हैं कि वे अपने आप कविता का स्वरूप लेने लग जाते हैं। वहीं से इस टाइटल की प्रेरणा मिली — आखिर में वो जज़्बात ही थे जो कविता बन गए।"
व्यक्तिगत या सामाजिक? — अनुभवों की सीमा को पार करती कविता
प्रश्न: क्या इस पुस्तक की कविताएँ आपके व्यक्तिगत अनुभवों से प्रेरित हैं या समाज के अनुभवों से?
इस पर वे कहती हैं — "मेरा मानना है कि चाहे अनुभव व्यक्तिगत हों या सामाजिक, वे हमें किसी न किसी स्वरूप में ढालते हैं। कई बार बहुत सारी बातें मिलकर ऐसी भावनाएँ बन जाती हैं कि हम अंतर ही नहीं कर पाते कि कौन सा भाव कहाँ से उत्पन्न हुआ।"
वे आगे कहती हैं — "यह कहना गलत होगा कि सम्पूर्ण भावनाएँ मेरी ही हैं। और न ही यह पूर्णतः सामाजिक हैं। ये कविताएँ मेरे व्यक्तिगत या सामाजिक अनुभवों से ऊपर उठकर वे सारे भाव हैं, जो मैंने कहीं देखे, सुने, मेरे अंतर्मन में प्रकट हुए और जिन्हें मैंने गहराई से महसूस किया।"
'बियॉन्ड लाइफ' — दो अध्याय जो सबसे करीब हैं
प्रश्न: क्या इस पुस्तक का कोई ऐसा अध्याय है जो आपके सबसे अधिक करीब है?
पूजा जी का जवाब — "अगर एक या दो चुनने हों, तो पहला — 'मृत्यु एक अंत नहीं, अल्पविराम है' और दूसरा — 'अधूरी मोहब्बत'।"
वे समझाती हैं — "बाकी अध्याय वर्तमान जीवन की बात करते हैं, लेकिन मृत्यु वाला अध्याय एक अलग जीवन की संभावना की बात करता है — आत्मा अविनाशी है, वह दोबारा कहीं और जन्म लेगी। यानी एक अंत के बाद भी एक संभावना है। और 'अधूरी मोहब्बत' में विभिन्न कविताओं के माध्यम से एक प्रेमी जोड़े के उस वादे को व्यक्त किया गया है, जहाँ वे अगले जन्म में मिलने की बात करते हैं। क्योंकि वे इस जन्म में किसी कारणवश नहीं मिल पाए। इन दोनों अध्यायों में 'बियॉन्ड लाइफ' जैसी गहराई है।"
कविता: साहित्य या आत्मा की अभिव्यक्ति?
प्रश्न: आपके अनुसार कविता केवल साहित्य है या आत्मा की अभिव्यक्ति?
उनका उत्तर स्पष्ट है — "मेरे लिए तो आत्मा की अभिव्यक्ति है। और वही आत्मा की अभिव्यक्ति आगे चलकर साहित्य का रूप ले लेती है।"
अधूरापन और पूर्णता का द्वंद्व
प्रश्न: क्या अधूरापन भी इंसान को पूर्ण बना सकता है?
इस गहन प्रश्न पर वे कहती हैं — "जब आप दुनिया के बहुत सारे लोगों से बात करते हैं, तो पाते हैं कि हर इंसान किसी न किसी प्रकार से अधूरा है। लेकिन फिर भी उनमें पूर्णता है — वे एक जगह रुके नहीं हैं, वे चल रहे हैं, लड़ रहे हैं।"
वे आगे बताती हैं — "किसी ख्वाहिश का पूरा न होना नई ख्वाहिशों को जन्म देता है, किसी इंसान का न मिलना नए इंसानों से मिलवाता है, और किसी सपने का टूटना नई अपॉर्च्युनिटीज़ और नए सपने लेकर आता है। अधूरापन तो है, क्योंकि जो नहीं मिल पाया उसका मलाल रहेगा — लेकिन जो उसकी वजह से मिल गया, वह भी तो कहीं न कहीं पूर्णता ला ही रहा है।"
लेखन की प्रक्रिया: भावनाओं के साथ जीने का समय
प्रश्न: क्या आप नियमित रूप से लिखती हैं या भावनाएँ आने पर?
पूजा जी बताती हैं — "नहीं, मैं नियमित रूप से नहीं लिखती। मुझे लिखने के लिए उस 'स्टेट ऑफ माइंड' में जाना पड़ता है — थोड़ा आइसोलेट करना पड़ता है, क्योंकि किसी भी बात को लिखने के लिए मुझे उस भाव में डूबना पड़ता है।"
वे कहती हैं — "बहुत सारे दिनों में से कुछ ही दिन ऐसे होते हैं जब मैं किसी एक भाव को लेकर बैठ जाती हूँ। वह रोज़ नहीं होता, क्योंकि रोज़ किसी एक भाव के साथ जीवन नहीं चल सकता।"
लेखन या जीवन — किसने किसको बदला?
प्रश्न: क्या लेखन ने आपको बदला है?
उनका जवाब — "लेखन ने मुझे नहीं बदला। जीवन ने मुझे बहुत प्रकार से बदला है, और उसी वजह से लेखन है, और लेखन में विविधता भी है।"
वे कहती हैं — "कई बार लोगों के लिए आश्चर्य होता है कि कोई इंसान इतने अलग अलग विषयों पर कैसे लिख सकता है। लेकिन जीवन ने मुझे विभिन्न प्रकार से बदला है। और मैं एक संवेदनशील इंसान हूँ — किसी भी बात को बहुत गहराई से महसूस करती हूँ, इसलिए अलग अलग विषयों पर लिखना मेरे लिए आसान हो जाता है।"
लेखक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी
प्रश्न: आपके अनुसार एक लेखक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी क्या होती है?
पूजा जी कहती हैं — "एक लेखक की जिम्मेदारी यह होती है कि वह ऐसा लेखन करे जिसमें पाठक डूब पाए — लेकिन साथ ही अपनी किताब को ऐसी रूपरेखा दे कि जब पाठक पढ़कर बाहर निकले, तो उस विषय से संबंधित उसकी समझ पहले से बेहतर हो चुकी हो। वह किसी भँवर में न रह जाए, बल्कि वहाँ से कुछ सीखकर और समझकर जीवन में आगे बढ़े।"
पाठकों के लिए संदेश: "मरने से पहले जी लेना चाहिए"
प्रश्न: "जज़्बात जो कविता बन गए" पढ़ने के लिए आप पाठकों से क्या कहना चाहेंगी?
अपने पाठकों से बातचीत के अंत में पूजा जी का संदेश अत्यंत मार्मिक है —
"मरने से पहले हमें जी लेना चाहिए। सारी अधूरी बातों को पूरा कर लेना चाहिए। कभी किसी से कुछ कहना था, तो कह देना चाहिए। कोई इकरार था, तो कर देना चाहिए। कब, कैसे और किस विषय पर क्या महसूस किया, वह भी बता देना चाहिए।"
"दुनिया की भीड़ से कभी हटकर खुद को भी ढूँढ़ना चाहिए। और जो लोग आज हमारे पास हैं, उनकी अहमियत समय रहते समझ लेनी चाहिए।"
पूजा शांति चौबे का यह साक्षात्कार केवल एक किताब की चर्चा नहीं है — यह जीवन, मृत्यु, प्रेम, वियोग, अधूरापन और पूर्णता के दार्शनिक पक्षों को उजागर करता है। उनकी कविताएँ, उनके शब्द और उनका दृष्टिकोण यह सिखाता है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों को समझने और जीवन को बेहतर ढंग से जीने का एक माध्यम है।
"जज़्बात जो कविता बन गए" सिर्फ एक किताब नहीं — यह उन सभी भावनाओं का आईना है, जिन्हें हम अक्सर जीते तो हैं, पर कभी कह नहीं पाते।


