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मंत्रि-परिषद की बैठक में विकास योजनाओं के लिये 26 हजार 800 करोड़ रूपये की स्वीकृति






 

लोक निर्माण के कार्यों के लिए 26311 करोड़ और चिकित्सा शिक्षा, आंगनवाड़ी एवं सिंचाई योजना के लिए 490 करोड़ रूपये की स्वीकृति
लखुंदर उच्च दाबयुक्त सूक्ष्म सिंचाई परियोजना के लिए 155 करोड़ 82 लाख रूपये की मिली स्वीकृति
पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थी छात्रगृह योजना में संशोधन,छात्रवृत्ति 1550 से बढ़कर हुई 10 हजार प्रतिमाह, अब प्रतिवर्ष 100 नए विद्यार्थी होंगे लाभांवित
38,901 आँगनवाड़ी भवनों में विद्युतीकरण के लिए 80 करोड़ 41 लाख रूपये की स्वीकृति
गांधी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल में पी.जी. सीट वृद्धि योजना अंतर्गत 79 करोड़ 16 लाख रूपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति
श्यामशाह चिकित्सा महाविद्यालय रीवा के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के विस्तार के लिए 174 करोड़ 80 लाख रूपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति
मुख्यमंत्री डॉ.यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद की बैठक में लिए गए निर्णय


   मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रि-परिषद की बैठक मंगलवार को मंत्रालय में सम्पन्न हुई। मंत्रि-परिषद द्वारा प्रदेश के सर्वांगीण विकास और जन-कल्याण के लिए 26 हजार 800 करोड़ रुपये से अधिक की महत्वपूर्ण विकास योजनाओं को स्वीकृति प्रदान की गई। प्रदेश के बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए लोक निर्माण विभाग की आगामी 5 वर्षों (2026-2031) की विभिन्न निर्माण व नवीनीकरण परियोजनाओं के लिए 26,311 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है। सामाजिक न्याय और शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए मंत्रि-परिषद ने पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों के लिये छात्रवृत्ति राशि में ऐतिहासिक वृद्धि कर इसे 1,550 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये प्रतिमाह करने का निर्णय लिया है। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण सिंचाई व्यवस्था के लिए लखुंदर सूक्ष्म सिंचाई परियोजना और प्रदेश की 38,901 आंगनवाड़ियों के विद्युतीकरण के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय प्रावधान किए गए हैं। चिकित्सा क्षेत्र में विस्तार के लिए भोपाल और रीवा के चिकित्सा महाविद्यालयों के लिए पुनरीक्षित प्रशासनिक स्वीकृतियां भी दी गईं, जो प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं और अधोसंरचना को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नई ऊंचाई प्रदान करेंगी। मंत्रि-परिषद की बैठक वन्दे मातरम गान से प्रारंभ हुई।

लखुंदर उच्च दाबयुक्त सूक्ष्म सिंचाई परियोजना के लिए 155 करोड़ 82 लाख रूपये की स्वीकृति

  मंत्रि-परिषद द्वारा शाजापुर जिले की लखुंदर उच्च दाबयुक्त सूक्ष्म सिंचाई परियोजना लागत राशि 155 करोड़ 82 लाख रूपये की प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई। लखुंदर उच्च दाबयुक्त सूक्ष्म सिंचाई परियोजना से शाजापुर जिले की शाजापुर तहसील के 17 एवं उज्जैन जिले की तराना तहसील के 7 ग्राम इस तरह कुल 24 ग्रामों के लिए 9 हजार 200 हैक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। परियोजना अंतर्गत लखुंदर नदी पर शाजापुर जिले में मक्सी के समीप पूर्व से ही निर्मित जलाशय से 24.37 मीट्रिक घन. मीटर जल का उद्वहन कर सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जाऐगी।

लोक निर्माण विभाग के निर्माण और विभिन्न विकास कार्यों के लिए 26 हजार 311 करोड़ रूपये की स्वीकृति

  मंत्रि-परिषद द्वारा लोक निर्माण विभाग के अंतर्गत मार्गों के नवीनीकरण, कार्यालयों की स्थापना और मरम्मत, आवासों के अनुरक्षण सहित भू-अर्जन के लिए मुआवजा संबंधी विभिन्न योजनाओं की सोलहवें वित्त आयोग की अवधि 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक की निरन्तरता के लिए लगभग 26 हजार 311 करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है।

  स्वीकृति अनुसार मुख्यालय कार्यालय स्थापना, मण्डल कार्यालय स्थापना, अनुरक्षण, मरम्मत-संधारण और संभागीय कार्यालय स्थापना संबंधी योजनाओं के लिए 6,180 करोड़ 57 लाख रूपये की स्वीकृति दी गई है।

  इसके साथ ही केन्द्रीय सड़क अधोसंरचना निधि संबंधी योजनाओं के लिए 6 हजार 925 करोड़ रूपये, एफ-टाईप से उच्च श्रेणी के शासकीय आवास एवं गैर आवासीय भवनों का अनुरक्षण का कार्य संबंधी योजना के लिए 1 हजार 680 करोड़ रूपये और भू-अर्जन के लिए मुआवजा संबंधी योजना के लिए 6 हजार 500 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए है।

 इसके अलावा भारतीय सड़क कांग्रेस को अनुदान और डिक्रीधन के भुगतान के लिए 25 करोड़ 50 लाख रूपये और मुख्य जिला मार्गों, जिला मार्ग तथा अन्य जिला मार्गों के नवीनीकरण संबंधी योजना के लिए 5 हजार करोड़ रूपये की स्वीकृति दी गई है।

पिछड़ा वर्ग विद्यार्थी छात्रगृह योजना-2005 में संशोधन की स्वीकृति

  मंत्रि-परिषद द्वारा पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग द्वारा संचालित दिल्ली स्थित उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत मध्यप्रदेश के पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों के लिए छात्रगृह योजना-2005 में संशोधन की स्वीकृति दी है।

 स्वीकृति अनुसार अब हर साल कुल 100 नए विद्यार्थियों को इस योजना का लाभ मिलेगा, जिसमें 50 सीटें स्नातक और 50 सीटें स्नातकोत्तर स्तर के विद्यार्थियों के लिए तय की गई हैं। इसके साथ ही, जो विद्यार्थी पहले से इस योजना का लाभ ले रहे हैं, उन्हें उनके कोर्स की अवधि पूरी होने तक सहायता मिलती रहेगी।

 छात्रवृत्ति के रूप में मिलने वाली 1,550 रूपये की राशि को अब बढ़ाकर सीधे 10 हजार रूपये प्रति माह कर दी है। योजना का लाभ लेने के लिए यह जरूरी है कि विद्यार्थी पिछड़ा वर्ग पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के लिए पात्र हो और उसके अभिभावकों की वार्षिक आय सरकार द्वारा समय-समय पर निर्धारित की गई आय सीमा के भीतर हो।

गांधी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल में पी.जी. सीट वृद्धि योजना अंतर्गत 79 करोड़ 16 लाख रूपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति

 मंत्रि-परिषद द्वारा प्रदेश में गुणवत्ता पूर्ण चिकित्सा शिक्षा के विस्तार तथा दूरस्थ अंचलों में तृतीयक स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पी.जी. सीट वृद्धि योजना के अंतर्गत गांधी चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल के लिए रेडियोथैरिपी विभाग की ओ.पी.डी, लीनियक मशीन बंकर, बोनमैरो ट्रांसप्लांट यूनिट और कैथलैब का निर्माण कार्य के लिए 14 करोड़ 8 लाख रूपये की कार्योत्तर स्वीकृति प्रदान करने के साथ 79 करोड़ 16 लाख रूपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई है।

श्यामशाह चिकित्सा महाविद्यालय रीवा के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल विस्तार के लिए 174 करोड़ 80 लाख रूपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति

 मंत्रि-परिषद द्वारा श्यामशाह चिकित्सा महाविद्यालय रीवा के अंतर्गत सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के विस्तार के तहत निर्माण कार्य के लिए 164 करोड़ 49 लाख रूपये के स्थान पर 174 करोड़ 80 लाख रूपये की पुनरीक्षित प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई है।

38,901 आँगनवाड़ी भवनों में विद्युतीकरण के लिए 80 करोड़ 41 लाख रूपये की स्वीकृति

 मंत्रि-परिषद द्वारा महिला एवं बाल विकास विभाग अंतर्गत विद्युतविहीन आँगनवाड़ी भवनों में विद्युत व्यवस्था अन्तर्गत 38 हजार 901 ऑगनवाड़ी भवनों में बाहय विद्युतीकरण संबंधी योजना की 16 वें वित्त आयोग की निर्धारित अवधि (वित्तीय वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक) की स्वीकृति एवं निरंतरता के लिए 80 करोड़ 41 लाख रूपये की स्वीकृति दी है।

 स्वीकृति अनुसार प्रदेश में संचालित कुल 97,882 आँगनवाड़ी केन्द्रों में से विद्युत व्यवस्थाविहीन 38,901 विभागीय आँगनवाड़ी भवनों में विदयुत व्यवस्था करवाई जाएगी। आंगनवाड़ी भवनों में बाहय विदयुतीकरण होने पर ट्यूबलाईट/बल्ब, पंखा, कूलर, स्मार्ट टी.वी.,वॉटर प्यूरीफायर इत्यादि के समुचित उपयोग होगा एवं महिला एवं बाल विकास विभाग की समस्त विभागीय योजनाओं का बेहतर तरीके से संचालन होगा। विभागीय योजनाओं की गतिशीलता बढ़ेगी। आँगनवाड़ी केन्द्र के बच्चें सुविधाजनक वातावरण में शालापूर्व शिक्षा व अन्य सेवायें ले सकेंगे।

 वित्तीय वर्ष 2026-27 से वित्तीय वर्ष 2030-31 तक कुल 38,814 विभागीय आँगनवाड़ी भवनों, धरती आबा योजना अंतर्गत शेष संभावित 69 आँगनवाड़ी भवन एवं जिला खनिज फंड से निर्मित 18 आँगनवाड़ी भवनों सहित अनुमानत 38,901 आँगनवाड़ी भवनों में बाहय विदयुतीकरण का लक्ष्य है।

मध्यप्रदेश में जंगली भैंसा का पुनर्स्थापन: 100 साल बाद वन्य इतिहास का नया अध्याय






 




  मध्यप्रदेश की धरती पर लगभग एक सदी बाद जंगली भैंसा (Wild Buffalo) की वापसी ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पल दर्ज किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बालाघाट जिले के सूपखार क्षेत्र में इस महत्वाकांक्षी योजना का शुभारंभ करते हुए इसे प्रदेश की जैव-विविधता के लिए एक निर्णायक कदम बताया।

कान्हा टाइगर रिजर्व बना पुनर्स्थापन का केंद्र

 असम के प्रसिद्ध काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से लाए गए जंगली भैंसों को कान्हा टाइगर रिजर्व में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। पहले चरण में चार जंगली भैंसों—तीन मादा और एक नर—को सॉफ्ट रिलीज प्रक्रिया के तहत सुरक्षित बाड़े में छोड़ा गया। सभी भैंस युवा और स्वस्थ हैं, जिससे इनके अनुकूलन की संभावना मजबूत मानी जा रही है।

  मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि यह सिर्फ वन्यजीवों की वापसी नहीं, बल्कि प्रदेश के पारिस्थितिक संतुलन को पुनर्जीवित करने की दिशा में बड़ा कदम है।

100 साल बाद वापसी: जैव विविधता को मिलेगा नया जीवन

 मध्यप्रदेश में जंगली भैंसों की प्रजाति लगभग 100 वर्ष पहले विलुप्त हो चुकी थी। वर्तमान में इनकी प्राकृतिक उपस्थिति मुख्य रूप से असम तक सीमित है। ऐसे में यह पुनर्स्थापन परियोजना न केवल एक खोई हुई प्रजाति की वापसी है, बल्कि घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने का भी प्रयास है।

जंगली भैंसें घास के मैदानों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाती हैं। इनके चरने से वनस्पति संतुलन बना रहता है, जिससे अन्य वन्य प्रजातियों को भी लाभ मिलता है।











असम से मध्यप्रदेश तक 2000 किलोमीटर का सफर

 इस परियोजना के तहत 19 मार्च से 10 अप्रैल 2026 के बीच काजीरंगा के विभिन्न क्षेत्रों से सात किशोर भैंसों को चयनित किया गया। इनमें से चार भैंसों को 25 अप्रैल 2026 को लगभग 2000 किलोमीटर की लंबी यात्रा के बाद कान्हा टाइगर रिजर्व लाया गया।

 यह पूरा ट्रांसलोकेशन अभियान विशेषज्ञ वन अधिकारियों और अनुभवी पशु चिकित्सकों की निगरानी में सम्पन्न हुआ, जिससे जानवरों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जा सका।

वैज्ञानिक अध्ययन ने बताया कान्हा को सबसे उपयुक्त

 भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा किए गए अध्ययन में कान्हा टाइगर रिजर्व को जंगली भैंसों के पुनर्स्थापन के लिए सबसे अनुकूल स्थान पाया गया। यहां के विस्तृत घास के मैदान, पर्याप्त जल स्रोत और कम मानव हस्तक्षेप इस प्रजाति के लिए आदर्श परिस्थितियां प्रदान करते हैं।

वन्य संरक्षण में मध्यप्रदेश की बढ़ती पहचान

 मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश पहले ही “टाइगर स्टेट” और “चीता स्टेट” के रूप में देश में अपनी पहचान बना चुका है। कूनो नेशनल पार्क में चीतों की सफल वापसी के बाद अब जंगली भैंसों का पुनर्स्थापन प्रदेश को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।

 उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में अन्य विलुप्त या संकटग्रस्त प्रजातियों के पुनर्वास पर भी कार्य किया जाएगा, जिससे प्रदेश की जैव विविधता और समृद्ध हो सके।

स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

 इस परियोजना से न केवल पर्यावरण को लाभ होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। वन्यजीवों की विविधता बढ़ने से देश-विदेश के पर्यटक आकर्षित होंगे, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।

अंतर्राज्यीय सहयोग का मजबूत उदाहरण

 इस अभियान ने असम और मध्यप्रदेश के बीच सहयोग का एक नया अध्याय भी जोड़ा है। मुख्यमंत्री ने असम के मुख्यमंत्री डॉ. हेमंत बिस्वा सरमा के साथ हुई चर्चा को इस परियोजना की सफलता का आधार बताया।

भविष्य की दिशा: संतुलित विकास और संरक्षण

 जंगली भैंसों की यह वापसी केवल एक प्रजाति का पुनर्स्थापन नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। मध्यप्रदेश सरकार अधोसंरचना विकास के साथ-साथ पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रही है।


मध्यप्रदेश कैडर के डॉ. ए. अंसारी सेंट्रल जू ऑथोरिटी की ‘कंजर्वेशन-ब्रीडिंग’ कमेटी में शामिल

Dr. A. Ansari, Madhya Pradesh cadre, Central Zoo Authority, Conservation Breeding Committee, Wildlife Conservation



 

  ‘‘कंजर्वेशन-ब्रीडिंग’ को वैज्ञानिक दिशा प्रदान करेगी विशेषज्ञ समिति

 डॉ. अंसारी समिति में शामिल होने वाले मध्यप्रदेश कैडर के पहले आईएफएस

  भोपाल : देश में वन्य जीव संरक्षण को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने ‘‘कंजर्वेशन-ब्रीडिंग’ के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। समिति का गठन देशभर के चिड़ियाघरों में संचालित ‘‘कंजर्वेशन-ब्रीडिंग’ गतिविधियों की समीक्षा, मार्गदर्शन और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया है। समिति में पहली बार मध्यप्रदेश कैडर के आईएफएस अधिकारी डॉ. ए. अंसारी को शामिल किया गया है। डॉ. अंसारी प्रदेश के सिवनी में वर्किंग प्लान अधिकारी के रूप में सेवाएं दे रहे हैं।

   समिति में विभिन्न क्षेत्रों के अनुभवी विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। इनमें- डॉ. ए. अंसारी (वर्किंग प्लान ऑफिसर, सिवनी, मध्यप्रदेश), डॉ. मनोज वी. नायर (अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, ओडिशा), डॉ. कार्तिकेयन वासुदेवन (वैज्ञानिक, हैदराबाद) और डॉ. अभिजीत पावडे (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली) शामिल हैं। समिति का कार्यकाल आदेश जारी होने की तिथि से 6 माह निर्धारित किया गया है। गैर-सरकारी सदस्यों को बैठक शुल्क एवं यात्रा भत्ता केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा प्रदान किया जाएगा। प्राधिकरण समिति को आवश्यक प्रशासनिक एवं सचिवीय सहयोग भी उपलब्ध कराएगा।

  ‘‘कंजर्वेशन-ब्रीडिंग’ समिति का गठन देश में वन्यजीव संरक्षण और लुप्तप्राय प्रजातियों के वैज्ञानिक प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के मार्गदर्शन से संरक्षण प्रजनन कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी, संगठित और परिणामोन्मुख बनाने में मदद मिलेगी। इस समिति के गठन से देशभर के चिड़ियाघरों में संचालित संरक्षण प्रयासों को नई दिशा और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  समिति चिड़ियाघरों में संरक्षण प्रजनन से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच करेगी। इनमें—संरक्षण प्रजनन प्रस्तावों की समीक्षा एवं सिफारिशें, वित्तीय सहायता के प्रस्तावों का परीक्षण, प्राथमिकता वाली प्रजातियों की पहचान और सूची का पुनरीक्षण, समन्वयक और सहभागी चिड़ियाघरों की भूमिका निर्धारित करना,कार्यक्रम के मूल्यांकन और मॉनिटरिंग के लिए मानकीकृत प्रक्रियाओं का विकास, प्रगति रिपोर्ट के लिए प्रारूप तैयार करना और चिड़ियाघरों के मूल्यांकन हेतु प्रश्नावली विकसित करना शामिल हैं। समिति मास्टर प्लान प्रस्तुत करने के लिए प्रारूप भी तैयार करेगी और आवश्यकतानुसार अन्य कार्य भी संपादित करेगी।


नवगुंजरा’ का पहला पोस्टर जारी,मेकर्स ने दिखाई एक रहस्यमयी सिनेमाई दुनिया की झलक

Navgunjara movie first poster showing a mysterious PSYCON world theme with dark cinematic visuals and fantasy elements






 



   मनोरंजन । फिल्म नवगुंजरा के निर्माताओं ने इसका पहला आधिकारिक पोस्टर जारी कर दिया है, जिसने एक दिलचस्प और रहस्यमयी कहानी की ओर इशारा किया है। पोस्टर पर लिखी लाइन—“Welcome to the world of PSYCON… we live in a world shared with them”—एक अनदेखी दुनिया का संकेत देती है, जिसने दर्शकों की उत्सुकता तुरंत बढ़ा दी है।

  फिल्म का निर्देशन और निर्माण अमित दीक्षित ने किया है, जबकि रोहित यादव ने कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स लिखे हैं। First Film Studios LLP के बैनर तले, Low Agers Production और Cine Arts के सहयोग से बन रही यह फिल्म भारतीय सिनेमा के बदलते परिदृश्य में एक अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रही है। फिल्म के निर्माता अमित दीक्षित, अंकिता गोयल और आयुष जैन हैं, जबकि अजीत पडवलकर सह-निर्माता हैं।

   फिल्म में जितेंद्र बोहरा, तुषार कवाले, क्षितिज पवार, प्रतीक्षा सिंह, संध्या गेमावत, जेसिका यादव, कैलाश चौधरी और संदीप रावल जैसे कलाकार नजर आएंगे। खास बात यह है कि फिल्म को एक Shubhro B musical के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें संगीत कहानी को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। सिनेमैटोग्राफी जय नंदन ने संभाली है, वहीं अभिषेक दुबे एसोसिएट प्रोड्यूसर के रूप में जुड़े हैं।

  हालांकि मेकर्स ने कहानी के अहम पहलुओं को अभी गुप्त रखा है, लेकिन पहला पोस्टर एक रहस्य और परतदार कहानी की झलक देता है, जो दर्शकों को एक नई दुनिया में ले जाने का वादा करता है।

  नवगुंजारा 15 मई 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। पोस्टर के साथ बनी शुरुआती चर्चा के बाद अब दर्शकों को ट्रेलर का इंतजार है, जिससे फिल्म के विजन और स्केल की और स्पष्ट झलक मिल सकेगी।

कारीगरों की आजीविका को सशक्त बनाने के लिए हैंडलूम को रोज़मर्रा के फैशन से जोड़ रहा 'इंडियन पीकॉक'

हैदराबाद, तेलंगाना, भारत

पीढ़ियों से इस कला में माहिर भारतीय हैंडलूम (हथकरघा) बुनकरों को उन्हीं की अपनी कहानी से बाहर किया जा रहा था। उनके द्वारा बनाए गए कपड़े या तो संग्रहालयों तक सीमित रह गए या उन पर केवल "एथनिक वियर" (ethnic wear) का ठप्पा लगा दिया गया। इस बीच उनकी आजीविका अनिश्चित होती गई और उनका ज्ञान धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया।

 ऐसा इसलिए नहीं है कि इस शिल्प (craft) का कोई मूल्य नहीं बचा, बल्कि इसलिए है क्योंकि करघे (loom) से लेकर रोज़मर्रा के जीवन तक के सफर में बहुत सी बाधाएं हैं।

 इंडियन पीकॉक' सीधी साझेदारी के माध्यम से इन दूरियों को मिटाने का प्रयास कर रहा है।

आर्किटेक्ट प्रीति पथिरेड्डी द्वारा स्थापित, 'द इंडियन पीकॉक' वह जगह है जहाँ वास्तुकला में उनका एक दशक लंबा सफर टेक्सचर, रूप और सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनके गहरे प्रेम से मिलता है। आइवी लीग (Ivy League) की पूर्व छात्रा रहीं प्रीति हमेशा से अपने डिजाइन दृष्टिकोण में सहज रही हैं, जो संरचना (structure) और कोमलता, शिल्प और उपयोगिता के बीच एक संबंध स्थापित करती हैं। भारत की कपड़ा विरासत की एक व्यक्तिगत खोज के रूप में जो शुरू हुआ था, वह जल्द ही 'स्लो फैशन' और 'कॉन्शियस लिविंग' (conscious living) के प्रति प्रतिबद्ध एक ब्रांड के रूप में विकसित हो गया।

 हम पूरे भारत में हैंडलूम कारीगरों के साथ मिलकर काम करते हैं। इनमें पश्चिम बंगाल के जामदानी (Jamdani) बुनकर, तेलंगाना के इकत (Ikat) बुनकर, राजस्थान के हैंडब्लॉक प्रिंट (handblock print) कारीगर और आंध्र प्रदेश के मंगलगिरी (Mangalgiri) बुनकर शामिल हैं। वे हमारे लिए केवल वेंडर नहीं बल्कि भागीदार हैं। हम उनके शिल्प, उनकी प्रक्रियाओं और उनकी कहानियों को समझते हैं। हम उन्हें केवल मौसमी मांग नहीं बल्कि उचित पारिश्रमिक और निरंतर काम के साथ समर्थन देते हैं।

 यह पारंपरिक शिल्प के "आधुनिकीकरण" (modernizing) के बारे में नहीं है। हम कुछ बहुत ही सरल करते हैं: हम उनके काम को रोज़मर्रा के जीवन में पहनने योग्य (wearable) बनाते हैं।

 हम रोज़ पहनने के लिए स्ट्रक्चर्ड शर्ट, विभिन्न किस्म के कुर्ते और सोच-समझकर तैयार किए गए को-ऑर्ड सेट डिज़ाइन करते हैं। हम शिल्प को 'फ्यूज़न' या केवल 'अवसर विशेष' (occasionwear) के परिधान के रूप में नहीं देखते हैं। हमारा उद्देश्य हथकरघा वस्त्रों को जीवन की लय में लाना है, ताकि उन्हें बार-बार पहना जा सके, उन्हें जिया जा सके और उन पर भरोसा किया जा सके। क्योंकि कोई भी शिल्प केवल कभी-कभार की जाने वाली प्रशंसा से जीवित नहीं रहता बल्कि अपनी प्रासंगिकता और निरंतर उपयोग से जीवित रहता है।

एक हाथ से बुना हुआ परिधान ऐसा बन जाता है जिसे आप हफ्ते दर हफ्ते पहनना पसंद करते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादित विकल्पों (mass-produced alternatives) के बजाय, यह एक शांत निरंतरता पैदा करता है। यह करघों को सक्रिय रखता है, कौशल को प्रासंगिक बनाता है और आजीविका को स्थिर रखता है। हैंडलूम केवल प्रशंसा या कभी-कभार पहनने से जीवित नहीं रहता, बल्कि उन रोज़मर्रा के विकल्पों से जीवित रहता है जो इस शिल्प को प्रासंगिक और गतिमान बनाए रखते हैं।

इस तरह हम अपनी कहानी को वापस हासिल करते हैं: कारीगरों के शिल्प को वापस उसी जगह रखकर जहाँ का वह हमेशा से हकदार रहा है।

'इंडियन पीकॉक' कारीगरों को 'बचा' नहीं रहा है; उन्हें बाज़ार, सम्मान और उचित अनुदान की आवश्यकता है, और हम वही प्रदान कर रहे हैं। हम परंपरा को किसी संग्रहालय में सहेज कर नहीं रख रहे हैं, बल्कि हम यह साबित कर रहे हैं कि यह कला जीवित है और आवश्यक है।

 हर परिधान में उसे बनाने वाले की उपस्थिति झलकती है। हर कलेक्शन की शुरुआत कपड़े से होती है, न कि किसी ट्रेंड से। हमारा हर फैसला यह पूछता है: क्या यह शिल्प और शिल्पकार के हित में है? क्योंकि जब भारतीय परिधान विरासत वाले करघों से निकलकर आधुनिक सड़कों तक पहुंचते हैं, तो वे अपनी बुनाई के साथ कारीगर की गरिमा को भी पहनते हैं, और तब यह कहानी फिर से उनकी हो जाती है।

 यह काम करघे से कहीं आगे तक फैला हुआ है। हमारे हैदराबाद स्थित स्टूडियो में हर परिधान एक ऐसी टीम के हाथों से होकर गुजरता है जो कपड़े को उसी बारीकी से काटती, सिलती और फिनिश करती है, जिस बारीकी के साथ उसे बुना गया था। शिल्प कभी भी अलगाव में मौजूद नहीं होता और न ही हम। उचित पारिश्रमिक, निरंतर काम और एक सहायक वातावरण वे सिद्धांत हैं जिन्हें हम इस प्रक्रिया में शामिल सभी लोगों पर लागू करते हैं। न केवल विचारों में, बल्कि व्यवहार में भी।

हम यहां सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि यह कहानी सोची-समझी रणनीति, निरंतरता और उस पर विश्वास करने वाली एक टीम के साथ दुनिया को बताई जाए।

गौमाता को 'राष्ट्रमाता' घोषित करने की मांग : सरदारपुर में उमड़ा गौ भक्तों का जनसैलाब

गौमाता को 'राष्ट्रमाता' घोषित करने की मांग : सरदारपुर में उमड़ा गौ भक्तों का जनसैलाब







   सरदारपुर (धार): आज देशभर के गौ भक्तों और सनातन धर्मावलंबियों ने एकजुट होकर एक स्वर में गौमाता के सम्मान और संरक्षण के लिए हुंकार भरी। 'गौ सम्मान आह्वान अभियान' के तहत मध्यप्रदेश के सरदारपुर सहित देश की लगभग 5400 तहसीलों में एक साथ प्रशासनिक अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर गौमाता को 'राष्ट्रमाता' का दर्जा देने की मांग की गई।

विशाल रैली और 'जय गौमाता' का उदघोष 

   सरदारपुर के खेर परिसर मैदान से प्रारंभ हुई यह विशाल रैली नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए तहसील कार्यालय पहुंची। रैली में हजारों की संख्या में गौ भक्त, साधु-संत, महिलाएं और युवा शामिल हुए। हाथों में भगवा ध्वज लिए भक्तों ने 'जय गौमाता, जय गोपाल' के नारों से पूरे आकाश को गुंजायमान कर दिया।

राष्ट्रपति के नाम सौंपा 5 सूत्रीय ज्ञापन

    तहसील मुख्यालय पहुंचकर प्रदर्शनकारियों ने महामहिम राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नाम संबोधित एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

  • संवैधानिक दर्जा: गौमाता को तत्काल 'राष्ट्रमाता' के रूप में संवैधानिक मान्यता दी जाए।

  • पृथक गौ मंत्रालय: केंद्र और राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र 'गौ मंत्रालय' बनाया जाए, जो केवल गौवंश की सेवा और विकास पर केंद्रित हो।

  • गौ-वध पर पूर्ण प्रतिबंध: देशभर में गौ-वध की घटनाओं को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो।

  • नंदी महाराज का संरक्षण: सड़कों पर बेसहारा घूम रहे नंदी और गौवंश के लिए सुरक्षित स्थान और चारे की व्यवस्था की जाए।

"आस्था का सैलाब,न कि राजनीतिक प्रदर्शन"

   मीडिया से चर्चा करते हुए गौ सेवकों ने कहा कि यह कोई राजनीतिक रैली नहीं बल्कि सनातन धर्म की आस्था का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि 1967 से चली आ रही इस मांग को लेकर अब पूरा हिंदू समाज जागरूक हो चुका है। "गौमाता केवल एक पशु नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति का आधार हैं। जब तक उन्हें राष्ट्रमाता का सम्मान नहीं मिल जाता और गौ-हत्या पूरी तरह बंद नहीं होती, यह वैचारिक और सामाजिक संघर्ष जारी रहेगा।" — स्थानीय गौ सेवक 

मातृशक्ति और युवाओं का अभूतपूर्व समर्थन

   आंदोलन में महिलाओं (मातृशक्ति) ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ग्रामीण अंचलों से आए युवाओं ने भी गौ सेवा का संकल्प लिया। प्रशासनिक अधिकारियों ने ज्ञापन स्वीकार करते हुए इसे उचित माध्यम से शासन तक पहुँचाने का आश्वासन दिया है।


Kuno National Park: 57 चीतों के साथ Project Cheetah की बड़ी सफलता,भारत बना ग्लोबल ब्रीडिंग हब

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 भोपाल: कूनो नेशनल पार्क अब सिर्फ चीतों का आश्रय स्थल नहीं,बल्कि दुनिया के उभरते Cheetah Breeding Center के रूप में अपनी अलग पहचान बना रहा है। प्रोजेक्ट चीता के तहत नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीते यहां की जलवायु में पूरी तरह ढल चुके हैं और लगातार नई पीढ़ी को जन्म दे रहे हैं।

57 चीतों के साथ नई ऊंचाई पर कूनो

  कूनो में चीतों की कुल संख्या अप्रैल 2026 तक बढ़कर 57 हो चुकी है। इनमें से 27 से ज्यादा शावक भारत में जन्मे हैं, जो इस परियोजना की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है। हाल ही में मादा चीता गामिनी ने 3 स्वस्थ शावकों को जन्म दिया, जबकि इससे पहले ज्वाला, निर्वा और आशा भी शावकों को जन्म दे चुकी हैं।

चुनौती से सफलता तक का सफर

  शुरुआती दौर में इस परियोजना को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। लेकिन कूनो का प्राकृतिक वातावरण, पर्याप्त शिकार और विशेषज्ञों की निगरानी ने इन चुनौतियों को पार कर लिया। अब मादा चीतों का लगातार प्रजनन इस बात का संकेत है कि वे यहां सुरक्षित और सहज महसूस कर रही हैं।

 इस महत्वाकांक्षी योजना को नरेंद्र मोदी के विजन और मोहन यादव के नेतृत्व में आगे बढ़ाया गया, जिससे वन्यजीव संरक्षण में एक नया इतिहास बन रहा है।

वाइल्डलाइफ टूरिज्म और रोजगार में बढ़ोतरी

 कूनो में चीतों की बढ़ती संख्या का सीधा असर पर्यटन (Wildlife Tourism) पर पड़ा है। श्योपुर और आसपास के इलाकों में पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है, जिससे:

  • स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल रहा है

  • होटल, गाइड और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में ग्रोथ हो रही है

  • क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है

प्रोजेक्ट चीता: अब तक की टाइमलाइन

2022: ऐतिहासिक शुरुआत

17 सितंबर 2022 को नामीबिया से 8 चीतों को कूनो में छोड़ा गया। यह दुनिया का पहला अंतरमहाद्वीपीय बड़े शिकारी का ट्रांसलोकेशन प्रोजेक्ट था।

2023: पहली बड़ी सफलता

दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते आए।
मार्च 2023 में ज्वाला ने 70 साल बाद भारत में पहले शावकों को जन्म दिया।

2024: प्रजनन में तेजी

गामिनी ने 5 शावकों को जन्म देकर रिकॉर्ड बनाया। चीतों को खुले जंगल में छोड़कर उनके प्राकृतिक व्यवहार को पुनर्स्थापित किया गया।

2025–26: विस्तार और नई पीढ़ी

  भारत में जन्मी मादा मुखी ने भी शावकों को जन्म दिया, जो जेनेटिक ब्रीडिंग की बड़ी उपलब्धि मानी गई।
फरवरी 2026 में बोत्सवाना से नए चीते लाए गए।

वैज्ञानिक ट्रैकिंग और नई पहचान प्रणाली

 अब वन विभाग चीतों की पहचान नाम के बजाय कोड सिस्टम (जैसे KP-1, KP-2) से कर रहा है। इससे उनकी वंशावली (Genetic Lineage) को बेहतर तरीके से ट्रैक किया जा सकेगा।

गांधी सागर बनेगा दूसरा घर

 कूनो पर बढ़ते दबाव को देखते हुए अब गांधी सागर अभयारण्य को चीतों के दूसरे आवास के रूप में विकसित करने की योजना है। इससे प्रोजेक्ट को और विस्तार मिलेगा और चीतों की स्थायी वापसी सुनिश्चित होगी। 

 कूनो नेशनल पार्क में चीतों की बढ़ती संख्या और लगातार हो रहा प्रजनन साफ दिखाता है कि ‘प्रोजेक्ट चीता’ अब जमीन पर सफल होता नजर आ रहा है। जिन चीतों को कभी भारत से पूरी तरह खत्म माना गया था, वही अब यहां नई पीढ़ी के साथ बसते दिखाई दे रहे हैं। अगर इसी तरह व्यवस्थाएं मजबूत रहीं, तो आने वाले समय में कूनो देश ही नहीं, दुनिया के लिए एक उदाहरण बन सकता है।