21 अप्रैल विशेष: बड़ी दीक्षा और आचार्य पद के गौरवशाली वर्ष पर विशेष अक्षय भंडारी की रिपोर्ट
विशेष शोधपरक विवरण
इतिहास साक्षी है कि भौतिक प्रासाद समय की गति के साथ लुप्त हो जाते हैं, किंतु ज्ञान की स्याही से अंकित सत्य युग-युगांतर तक मानवता का पथ प्रशस्त करते हैं। मालवा की इस पावन धरा और राजगढ़ की पुण्य भूमि में विहार करने वाले विश्वपूज्य गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी महाराज का जीवन एक अलौकिक आख्यान है। यह वृत्तांत केवल एक यति का नहीं, अपितु उस अजेय संकल्प का है जिसने बिना किसी आधुनिक यंत्र, बिना किसी सहायक और बिना किसी लौकिक संरक्षण के, एकाकी पद-विहार करते हुए विश्व के वृहत्तम शब्दकोश 'अभिधान राजेन्द्र' की रचना कर दी। आज जब हम इस महाग्रंथ के पृष्ठों का अवलोकन करते हैं, तो हमें विश्वपूज्य गुरुदेव के तप और उनकी लेखनी के सामर्थ्य का बोध होता है।
सांसारिक सुखों का परित्याग और संयम पथ का वरण
राजस्थान के भरतपुर में विक्रम संवत 1883 में पौष शुक्ला सप्तमी को सेठ ऋषभदासजी पारख के गृह में बालक 'रत्नराज' का अवतरण हुआ। परिवार रत्नों के वैभव से संपन्न था, किंतु रत्नराज की दृष्टि उन शाश्वत आत्म-रत्नों की खोज में थी जो जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति प्रदान करते हैं। मात्र 20 वर्ष की अल्पायु में संसार की क्षणभंगुरता को पहचानकर उन्होंने वैराग्य मार्ग को चुना। वि.सं. 1904 में वैशाख शुक्ला पंचमी को उदयपुर में उन्होंने जिन-दीक्षा अंगीकार की। नियति का विधान देखिए कि जिस पावन तिथि को उन्होंने संयम मार्ग अपनाया था, ठीक 20 वर्षों की प्रगाढ़ साधना के पश्चात वि.सं. 1924 में उसी तिथि को उन्हें 'आचार्य' पद से अलंकृत किया गया। विश्वपूज्य गुरुदेव ने अपने 80 वर्ष के जीवन काल में 60 ऐतिहासिक चातुर्मास पूर्ण किए।
साहित्य सृजन और ज्ञान की अविरल निर्झरिणी
विश्वपूज्य गुरुदेव केवल एक प्रवचनकार नहीं, अपितु एक प्रखर प्रज्ञावान और अद्भुत शब्द-शिल्पी थे। उनकी साहित्यिक साधना मात्र 22 वर्ष की आयु में ही अंकुरित हो गई थी। वि.सं. 1905 में उन्होंने 'करणकामधेनुसारिणी' नामक ग्रंथ से अपनी साहित्य यात्रा का मंगलारंभ किया। अपने संपूर्ण जीवन में उन्होंने कुल 61 मौलिक ग्रंथों का सृजन किया। उनके द्वारा रचित साहित्य आज जैन दर्शन ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व वाङ्मय की अमिट निधि है। उनके साहित्य सुमनों में 'अभिधान राजेन्द्र कोष' की सुरभि आज भी संपूर्ण जगत को आनंदित कर रही है।
अभिधान राजेन्द्र कोष और चौदह वर्ष की अखंड पद-साधना
विश्वपूज्य गुरुदेव की सर्वोत्कृष्ट और ऐतिहासिक कृति 'अभिधान राजेन्द्र कोष' है जिसे जैन आगमों और दर्शन का 'विश्वकोश' माना जाता है। इसके निर्माण का इतिहास किसी दैवीय चमत्कार से न्यून नहीं है। जहाँ आधुनिक समय में वृहद् शब्दकोशों के निर्माण हेतु विद्वानों की परिषद् और आधुनिक यंत्रों की सहायता ली जाती है, वहीं इस सप्त-खंडीय विराट ग्रंथ को विश्वपूज्य गुरुदेव ने बिना किसी सहायक के, एकाकी अपने कर-कमलों से रचा। इस महाग्रंथ का आलेखन वि.सं. 1946 में सियाणा से प्रारंभ होकर वि.सं. 1960 में सूरत में संपन्न हुआ। अर्थात निरंतर 14 वर्ष, 6 मास और 14 दिवस की अखंड साधना। इस कोष में लगभग साढ़े चार लाख पंक्तियाँ और 80,000 से अधिक शब्द समाहित हैं। सप्त विशाल खंडों में विस्तृत इस ग्रंथ का भार लगभग 35 किलोग्राम है। विश्वपूज्य गुरुदेव निरंतर पद-विहार करते रहे और इस कठिन चर्या के मध्य बिना विराम इस ज्ञान-सिंधु को पत्रकों पर अंकित करते रहे।
सिद्ध पुरुष का तपोबल और प्रकृति का विनीत भाव
विश्वपूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व में आध्यात्मिक ओज का ऐसा पुंज था कि हिंसक जीव भी उनके सान्निध्य में अपनी सहज क्रूरता त्याग देते थे। प्रामाणिक साक्ष्य बताते हैं कि राणकपुर के सघन वनों में एक भीषण सिंह उनके चरणों में विनीत भाव से बैठ गया था। जावरा नरेश के समक्ष अपने तपोबल से अग्नि का उपशमन करना और वि.सं. 1956 के भीषण दुष्काल की एक वर्ष पूर्व ही सटीक भविष्यवाणी करना, विश्वपूज्य गुरुदेव के त्रिकालदर्शी होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उन्होंने अपने महाप्रयाण (निर्वाण) का समय और दिवस भी पूर्व में ही उद्घोषित कर दिया था।
वैश्विक साक्ष्य और अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थानों में महत्ता
विश्वपूज्य गुरुदेव की यह महान कृति आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध का मुख्य आधार है। दिल्ली विश्वविद्यालय (DULS) के आधिकारिक पुस्तकालय अभिलेखों के अनुसार, इस महाग्रंथ को 'कला पुस्तकालय' (Arts Library) के मुख्य संदर्भ अनुभाग में 'नॉट फॉर लोन' (Not for loan) की श्रेणी में अत्यंत सुरक्षित रखा गया है। यह इस तथ्य का वैश्विक प्रमाण है कि अकादमिक जगत में इसे एक अमूल्य और दुर्लभ धरोहर माना जाता है। यह कोष आज भारत के महामहिम राष्ट्रपति के निवास स्थित पुस्तकालय 'ग्रंथ कुटीर' की शोभा बढ़ा रहा है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने इसे 'अद्वितीय सृजन' की संज्ञा दी। जर्मन विद्वान वाल्थर शुब्रिंग ने इसे बीसवीं शताब्दी की असाधारण घटना माना। पी. के. गोडे जैसे विद्वानों ने विश्वपूज्य गुरुदेव को गतिशील साहित्य साधना का स्थायी स्तंभ बताया।
अमर विरासत और राजगढ़ का ऐतिहासिक वैभव
80 वर्ष की आयु में राजगढ़ की इसी पुण्य धरा पर विश्वपूज्य गुरुदेव ने अपनी नश्वर देह का त्याग किया। वि.सं. 1963 में उनके निर्वाण के पश्चात श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ उनकी अमर स्मृतियों और कोटि-कोटि भक्तों की श्रद्धा का मुख्य केंद्र बना। विगत अनेक शताब्दियों के इतिहास में ऐसा कोई दृष्टांत नहीं मिलता जहाँ एक महान साधक ने एकाकी, पद-विहार करते हुए सहस्रों मील की यात्रा के मध्य इतना विशाल साहित्य सृजन किया हो। राजगढ़ का वह ऐतिहासिक पाट और मोहनखेड़ा का कण-कण आज भी विश्वपूज्य गुरुदेव की दिव्य उपस्थिति का उद्घोष कर रहा है। विश्वपूज्य गुरुदेव का यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि दृढ़ संकल्प और आत्म-शक्ति से संसार का दुष्कर से दुष्कर कार्य भी साध्य है। 'अभिधान राजेन्द्र कोष' केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु एक युग की साधना का फल है जो आने वाली शताब्दियों तक ज्ञान का प्रकाश विकीर्ण करता रहेगा।



