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तप-साधना का अमर हिमालय: जब विश्वपूज्य गुरुदेव राजेंद्र सुरीश्वरजी महाराजा साहेब के महासंकल्प ने रचा विश्व का विशालतम शब्दकोश और काल का चक्र भी नतमस्तक हो गया







 




21 अप्रैल विशेष: बड़ी दीक्षा और आचार्य पद के गौरवशाली वर्ष पर विशेष अक्षय भंडारी की रिपोर्ट 
 

 

  
  राजगढ़ (मध्य प्रदेश)। कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, कुछ इतिहास रचते हैं, लेकिन कुछ महापुरुष ऐसे होते हैं जो खुद एक जीवित 'इतिहास' बन जाते हैं। मालवा की पवित्र माटी और राजगढ़ के 'राजेन्द्र भवन' की दीवारें आज भी एक ऐसी ही अमर कहानी की गवाह हैं। यह कहानी है—त्याग, संयम और एक ऐसे अद्वितीय संकल्प की, जिसने दुनिया को 'अभिधान राजेन्द्र कोश' जैसा ज्ञान का हिमालय दिया।
  आइए,आज दिल से महसूस करते हैं 'विश्वपूज्य' श्रीमद् विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी महाराज (जिन्हें भक्त लाड़ से 'दादा गुरुदेव' कहते हैं) के उस जीवन को, जिसने प्रकृति के नियमों को भी प्रेम से झुका दिया।

 जन्म: जब एक जौहरी के घर 'असली रत्न' उतरा

 राजस्थान के भरतपुर में एक साधारण रत्न व्यापारी थे—ऋषभदास जी। उनके घर एक बालक ने जन्म लिया, नाम रखा गया 'रत्नराज'। पिता पत्थरों के रत्न परखते थे, पर बालक की आँखों में वैराग्य की चमक थी।
  कुदरत का करिश्मा देखिए, गुरुदेव का पूरा जीवन 'सप्तमी' के अंक में सिमटा रहा। उनका जन्म पौष शुक्ला सप्तमी को हुआ, उनकी समाधि के बाद अग्नि संस्कार भी सप्तमी को हुआ, और उनका सबसे महान कार्य 'अभिधान राजेन्द्र कोश' भी 7 खंडों में ही बना।

दीक्षा और आचार्य पद: एक ही तिथि का अद्भुत संयोग

  20 साल की उम्र में जब दुनिया सपनें देखती है, रत्नराज ने संसार त्याग कर दीक्षा ले ली (वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् 1904)। ठीक 20 साल बाद, उसी तिथि को उन्हें 'आचार्य' पद मिला। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि उनकी साधना का वो प्रताप था जिसने समय की सुइयों को भी एक ही बिंदु पर रोक दिया।

 'अभिधान राजेन्द्र कोश': 14.5 साल की अखंड कलम-साधना
   
 क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति 63 वर्ष की उम्र में एक ऐसा काम शुरू करे जो अगले 14.5 साल तक चले? और इस दौरान वह एक जगह रुके नहीं, बल्कि तपती धूप और कड़कड़ाती ठंड में हजारों मील पैदल (विहार) चलता रहे?
  गुरुदेव ने 14 वर्ष, 6 माह और 14 दिन तक निरंतर लिखकर 'अभिधान राजेन्द्र कोश' की रचना की।
 विशालता: इसमें 80,000 से अधिक शब्द हैं।
 वजन: इस ग्रंथ का भार लगभग 35 किलोग्राम है।
  पूर्णता: यह प्राकृत भाषा का विश्व का सबसे बड़ा और प्रामाणिक शब्दकोश माना जाता है।

लाहौर से वॉशिंगटन तक: एक वैश्विक धरोहर

  दादा गुरुदेव की यह रचना आज किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की धरोहर बन चुकी है। यही कारण है कि आज 'अभिधान राजेन्द्र कोश' दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में सम्मान के साथ रखा गया है:
 राष्ट्रपति भवन (नई दिल्ली): यहाँ के 'ग्रंथ कुटीर' में इसे सर्वोच्च स्थान प्राप्त है (एक्सेशन संख्या 15897-15899)।
 दिल्ली विश्वविद्यालय (DULS): डीयू के पुस्तकालय में इसे 'नॉट फॉर लोन' (Not for Loan) की श्रेणी में रखा गया है, यानी इसे पढ़ा तो जा सकता है पर बाहर नहीं ले जाया जा सकता—इतना दुर्लभ है यह!

 अंतरराष्ट्रीय स्तर:

 अमेरिका की विस्कॉन्सिन-मैडिसन यूनिवर्सिटी, पाकिस्तान की लाहौर यूनिवर्सिटी, साथ ही जापान और जर्मनी के शोध संस्थानों में इसे 'ज्ञान का अंतिम आधार' माना जाता है।

 जब खूंखार शेर ने झुकाया सिर: प्रकृति के साथ एकाकार

  गुरुदेव की अहिंसा केवल शब्दों में नहीं थी। एक बार राणकपुर के जंगलों में एक खूंखार शेर (वनराज) उनके सामने आ गया। शिष्य भयभीत थे, लेकिन गुरुदेव शांत थे। उन्होंने बस करुणा भरी दृष्टि से शेर को देखा। वह हिंसक पशु शांत होकर बैठ गया, मानो अपने स्वामी की वंदना कर रहा हो, और चुपचाप चला गया।

   जावरा (म.प्र.) में जब अचानक आग लगी, तो गुरुदेव ने अपने तपोबल से उसे शांत कर दिया, लेकिन अपनी इस शक्ति के प्रदर्शन के लिए तुरंत 'तेले' का कठोर उपवास (प्रायश्चित) भी किया। ऐसी थी उनकी विनम्रता।

त्रिकालदर्शी: समय की लकीरों को पढ़ने वाले

  गुरुदेव समय से पहले देख लेते थे। उन्होंने 1955 में ही अगले साल आने वाले भीषण अकाल (छप्पनियां अकाल) की भविष्यवाणी कर दी थी। यहाँ तक कि उन्होंने अपने निर्वाण (देह त्याग) का दिन और समय भी पहले ही बता दिया था।

 अंतिम विश्राम: राजगढ़ की पावन माटी

  80 वर्ष की उम्र में, राजगढ़ (धार) की इसी मिट्टी पर गुरुदेव ने अपनी अंतिम सांस ली। राजगढ़ का 'राजेन्द्र भवन' आज भी उस पावन 'पाट' को सँभाले हुए है जहाँ बैठकर गुरुदेव ने अपना देह त्याग किया था। उनका अंतिम संस्कार **श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ** में हुआ, जो आज करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र है।

  अभिधान राजेन्द्र कोश केवल एक किताब नहीं, एक महापुरुष के 14.5 साल के पसीने और साधना की बूंदें हैं। राजगढ़ की माटी खुशनसीब है कि उसे ऐसे 'विश्वपूज्य' महापुरुष का सान्निध्य मिला।

  अगर आप भी ज्ञान, साधना और चमत्कार की इस त्रिवेणी को महसूस करना चाहते हैं, तो एक बार राजगढ़ के राजेन्द्र भवन और मोहनखेड़ा तीर्थ के दर्शन जरूर करें।

जय श्री राजेन्द्र सूरीश्वर!



  
 

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