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विश्व नवकार दिवस (9 अप्रैल 2026) : णमोकार महामंत्र: श्रद्धा,समता और आत्मशुद्धि का शाश्वत मंत्र - श्रमण डॉ पुष्पेंद्र






 


 
  जैन धर्म की आराधना परंपरा में णमोकार महामंत्र को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, समता और विनय का सार्वभौमिक संदेश है। इसकी महिमा का उल्लेख प्राचीन जैन आगम ग्रंथ भगवती सूत्र के प्रारम्भ में महामंगल वाक्य के रूप में मिलता है.- “णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं।” यह मंत्र अनादि और अविनाशी माना गया है। सभी तीर्थंकरों ने इसकी महत्ता को स्वीकार किया है। इसे जैन धर्म का मूल मंत्र और जिनागम का सार कहा जाता है।

गुण-पूजा का अद्वितीय संदेश

  णमोकार महामंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी व्यक्ति-विशेष या देवता की स्तुति नहीं की गई, बल्कि उनके गुणों को नमन किया गया है। यह व्यक्ति-पूजा नहीं, बल्कि गुण-पूजा का संदेश देता है। इसमें किसी प्रकार की याचना या कामना नहीं है, केवल निस्वार्थ श्रद्धा, समर्पण और आत्मशुद्धि का भाव है। यही कारण है कि यह मंत्र किसी एक संप्रदाय या समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वभौमिक और सर्वग्राह्य है।

    णमोकार महामंत्र में पांच पद है, ३५ अक्षर है। इनमें ११ अक्षर लघु हैं, २४ गुरु हैं, १५ दीर्घ हैं और २० हस्व हैं। ३५ स्वर हैं और ३४ व्यंजन हैं। यह एक अद्वितीय बीज संयोजना है। 'णमो अरिहंताणं' में सात अक्षर है, 'णमो सिद्धाणं' में पांच अक्षर हैं, 'णमो आयरियाणं' में सात अक्षर हैं, 'णमो उवज्झायाणं' में सात अक्षर है, 'णमो लोए सव्व साहूणं' में नौ अक्षर हैं। इस प्रकार इस महामंत्र में कुल ३५ अक्षर हैं। स्वर और व्यंजन का विश्लेषण करने पर 'नमो अरिहंताणं' में ७ स्वर और ६ व्यंजन हैं, 'नमो सिद्धाणं' में ५ स्वर और ६ व्यंजन हैं, 'नमो उवज्झायाणं' में ७ स्वर और ७ ही व्यंजन हैं। 'नमो लोए सव्व साहूणं' में ६ स्वर तथा ६ व्यंजन हैं। इस प्रकार नमोकार महामंत्र में ३५ स्वर और ३४ व्यंजन हैं। यह महामंत्र जैन आराधना और साधना का ध्रुव केन्द्र है, इसकी शक्ति अपरिमेय है। इस महामंत्र के वर्णों के संयोजन पर चिन्तन करें तो यह बड़ा अद्भुत और पूर्ण वैज्ञानिक है। इसके बीजाक्षरों को आधुनिक शब्द विज्ञान की कसौटी पर कसने पर साधक यह पाते हैं कि इसमें विलक्षण ऊर्जा है और शक्ति का भण्डार छिपा हुआ है। प्रत्येक अक्षर का विशिष्ट अर्थ है, प्रयोजन और सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता है।

पंच परमेष्ठियों का वंदन

   इस मंत्र में पंच परमेष्ठियों को नमस्कार किया गया हैकृअरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु। अरिहंत वे हैं जिन्होंने अपने आंतरिक शत्रुओंकृराग, द्वेष, मोह और वासनाओं पर विजय प्राप्त कर सर्वज्ञता को उपलब्ध किया। सिद्ध वे मुक्त आत्माएँ हैं जो जन्म-मृत्यु के चक्र से परे मोक्ष में स्थित हैं।
आचार्य संघ के आध्यात्मिक पथप्रदर्शक हैं। उपाध्याय शास्त्रों के ज्ञाता एवं अध्यापक हैं। साधु वे तपस्वी आत्माएँ हैं जो आत्मकल्याण और लोककल्याण हेतु धर्म का आचरण करती हैं। जैन दर्शन के अनुसार आध्यात्मिक उत्कर्ष में न तो वेष बाधक है और न ही लिंग। स्त्री हो या पुरुष, सभी आत्मिक उन्नति के अधिकारी हैं।

साधना और मानसिक शांति

  श्रद्धा,शुद्ध उच्चारण और एकाग्र भाव से णमोकार महामंत्र का जप मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। शास्त्रों में इसे “सर्व पापों का नाश करने वाला और परम मंगलकारी” कहा गया है। प्रत्येक अक्षर स्वयं में मंत्रस्वरूप है और इसका जप किसी भी क्रम में किया जा सकता है। ध्यानपूर्वक जप करने से चित्त की चंचलता कम होती है और साधक आत्मस्वरूप के निकट पहुँचता है। यह मंत्र हमें भीतर की पवित्र चेतना से जोड़ता है।

भाषिक एवं वैज्ञानिक संरचना

   णमोकार महामंत्र प्राकृत भाषा में रचित है और इसकी रचना आर्या छंद में की गई है। इसके पाँच मुख्य पदों में कुल ३५ अक्षर माने गए हैं। ध्वनि-विज्ञान की दृष्टि से इसमें लघु-गुरु, ह्रस्व-दीर्घ वर्णों का संतुलित संयोजन है। स्वर और व्यंजन की विशिष्ट व्यवस्था इसे अद्वितीय बीज-संरचना प्रदान करती है।
  आधुनिक ध्वनि-विज्ञान के अनुसार, मंत्रोच्चारण से उत्पन्न कंपन मानसिक और शारीरिक संतुलन में सहायक होते हैं। प्रत्येक अक्षर में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मजागरण की क्षमता निहित है।

आत्मजागरण का मार्ग

  णमोकार महामंत्र बाह्य आडंबरों से हटाकर साधक को आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाता है। इसमें भौतिक उपलब्धियों की कामना नहीं, बल्कि आत्मोन्नति का मार्ग निहित है। यह समता, विनय और करुणा का संदेश देता है।
   वास्तव में, णमोकार महामंत्र केवल जैन धर्म का मूल मंत्र नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए आत्मजागरण का शाश्वत उद्घोष है। गुणों की आराधना ही आत्मा को परम शांति और मोक्ष की दिशा में अग्रसर करती है और यही इस महामंत्र का सार है।

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