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सोहराय कला वर्कशॉप में अपनी कलाकृतियों के साथ प्रतिभागी. |
वर्कशॉप की पहल इंजीनियर एवं सामुदायिक आयोजक अमरनाथ योगी ने दृश्य कलाकार अर्नब कुमार कोले, पीपल ऑफ जमशेदपुर और द हाइप एंटरटेनमेंट (THE) के सहयोग से की. इसका उद्देश्य सोहराय कला को केवल चित्रकला तक सीमित न रखते हुए उसके इतिहास, लोकविश्वास, सांस्कृतिक प्रतीकों और पारंपरिक ज्ञान को लोगों तक पहुंचाना था.
प्राकृतिक रंगों और लोककथाओं के जरिए समझी कला की परंपरा
वर्कशॉप में प्रतिभागियों को सोहराय चित्रकला में उपयोग होने वाले प्राकृतिक रंगों, पारंपरिक सामग्रियों और चित्रांकन की तकनीकों से परिचित कराया गया. कलाकार अर्नब कुमार कोले ने विभिन्न आकृतियों के पीछे छिपे अर्थों, लोककथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों को साझा किया. उन्होंने चित्र बनाने की विधियों और पारंपरिक प्रतीकों का प्रदर्शन करते हुए प्रतिभागियों को स्वयं कलाकृतियां तैयार करने के लिए प्रेरित किया. इस व्यावहारिक अनुभव ने प्रतिभागियों को कला को समझने के साथ-साथ उसकी रचनात्मक प्रक्रिया से जुड़ने का अवसर दिया.
सोहराय झारखंड की विशिष्ट लोककलाओं में शामिल है, जिसका गहरा संबंध फसल उत्सव, प्रकृति और ग्रामीण जीवन से है. इस कला में पारंपरिक रूप से मिट्टी की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और प्रकृति से प्रेरित आकृतियां बनाई जाती हैं. इसकी चित्रात्मक शैली स्थानीय समुदायों की जीवनशैली, मान्यताओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को अभिव्यक्त करती है. झारखंड की सोहराय चित्रकला को जीआई टैग भी प्राप्त है, जो इसकी क्षेत्रीय विशिष्टता को मान्यता देता है.
15 वर्षों से अधिक का अनुभव, सोहराय कला के संरक्षण की पहल
वर्कशॉप का संचालन करने वाले अर्नब कुमार कोले इंजीनियर होने के साथ-साथ दृश्य कलाकार भी हैं. उन्हें फाइन आर्ट्स और मिक्स्ड मीडिया के क्षेत्र में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है. हाल ही में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित 'वन स्टेट वन आर्टिस्ट' (OSOA) लोक कला शिखर सम्मेलन में झारखंड की सोहराय कला का प्रतिनिधित्व किया. वे इस कला की पारंपरिक तकनीकों और प्रतीकों का अध्ययन करने के साथ लोगों को इसका प्रशिक्षण भी देते हैं. उनकी पहल का उद्देश्य पारंपरिक लोककला को व्यापक पहचान दिलाना और नई पीढ़ी के बीच इसके प्रति रुचि विकसित करना है.
युवाओं की जिज्ञासा ने कार्यशाला को बनाया खास
आयोजक अमरनाथ योगी ने कहा कि पहली वर्कशॉप को मिली प्रतिक्रिया ने दूसरी बार इस पहल को आगे बढ़ाने का उत्साह दिया. उन्होंने कहा, "हम चाहते थे कि लोग सोहराय कला को केवल देखें नहीं, बल्कि इसे अपने हाथों से बनाकर अनुभव करें. इस बार युवाओं की भागीदारी और उनका उत्साह खास रहा. उन्होंने कला से जुड़ी कहानियों, रंगों और परंपराओं को लेकर कई सवाल पूछे. उनकी जिज्ञासा और सीखने की इच्छा ने इस कार्यशाला को हमारे लिए और भी सार्थक बना दिया."
वर्कशॉप के दौरान प्रतिभागियों ने कुल 25 सोहराय कलाकृतियां तैयार कीं. सभी प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाणपत्र दिए गए और वे अपनी बनाई कलाकृतियां भी अपने साथ ले गए. इस तरह कार्यशाला केवल कला सीखने का अवसर नहीं रही, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को समझने और उससे व्यक्तिगत जुड़ाव विकसित करने का माध्यम भी बनी. भविष्य में भी इस तरह की कार्यशालाएं और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जाएंगी. इन पहलों के माध्यम से युवाओं को झारखंड की कला, संस्कृति और जनजातीय विरासत से जोड़ने के साथ पारंपरिक कलाओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा.

