राजगढ़ में 13 व्यासपीठों पर एक साथ पकता है वेदों का अमृतफल : 19 सितंबर को पोथी स्थापना,20 से कथा वाचन

(तस्वीर: अति प्राचीन माताजी मंदिर पर भागवत कथा के लिए भव्य रूप से सजाया गया व्यासपीठ)




 



 राजगढ़ (धार)। “निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः॥” अर्थात् वेद रूपी कल्पवृक्ष से स्वयं झरा हुआ और शुकदेव के मुख से निकले अमृत से सिक्त फल ही श्रीमद्भागवत है। मालवा अंचल का राजगढ़ नगर इस दिव्य भाव को वर्षों से धरती पर साकार करता आ रहा है। यहाँ श्रीमद्भागवत कथा किसी एक पंडाल या एक व्यासपीठ तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ही नगर में 13 व्यासपीठों से एक साथ अमृतमयी ज्ञानगंगा प्रवाहित होती है। यही अनूठी परंपरा राजगढ़ को अन्य नगरों से अलग पहचान देती है।

परंपरा की जड़ें और संगठित स्वरूप

  कहा जाता है कि श्रीमद्भागवत कथा की यह परंपरा वर्ष 1987 से भी पहले से चली आ रही है। वर्ष 1987 के आसपास यदाकदा कुछ ही मंदिरों में भागवत कथा का आयोजन होता था, लेकिन बाद में श्री चारभुजा युवा मंच और समस्त सनातन समाज के सामूहिक प्रयास से यह परंपरा व्यापक स्वरूप में आई और नगर के सभी 13 मंदिरों में एक साथ श्रीमद्भागवत कथा का वाचन प्रारंभ हुआ। वर्ष 1987 में श्री चारभुजा युवा मंच ने समस्त सनातन समाज को एक सूत्र में पिरोकर इस आयोजन को और अधिक संगठित स्वरूप प्रदान किया। आज भी यह मंच सेवा भाव से धर्मध्वजा थामे हुए है और नगर के सभी 13 मंदिरों में होने वाली श्रीमद्भागवत कथा के अवसर पर सहयोग, डोल यात्रा, जन्म जुलूस तथा ऐतिहासिक धर्मयात्रा के कुशल संचालन के माध्यम से सनातन एकता की अनुपम मिसाल प्रस्तुत कर रहा है।

एक नगर,13 व्यासपीठ और एक ही आस्था

  राजगढ़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ श्रीमद्भागवत कथा किसी एक बड़े आयोजन तक सीमित नहीं रहती। नगर के 13 सनातन मंदिरों में एक ही दिन, एक ही मुहूर्त में पोथी जी विराजमान होती हैं और अगले दिन से एक ही बेला में सभी व्यासपीठों से भागवत कथा की ज्ञानगंगा अविरल प्रवाहित होने लगती है।

इस वर्ष का कार्यक्रम और भव्य तैयारियाँ

  इस वर्ष 19 सितंबर को सभी 13 मंदिरों में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पोथी जी की स्थापना की जाएगी। इसके बाद 20 सितंबर से सात दिनों तक सभी व्यासपीठों से एक साथ श्रीमद्भागवत कथा का वाचन प्रारंभ होगा।

 राजगढ़ के मंदिरों में कथा के आयोजन की तैयारियाँ जोरों पर हैं। मंदिर परिसरों को रंग-बिरंगी लाइटों, आकर्षक फूलों की सजावट और पारंपरिक बंदनवारों से सजाया जा रहा है। तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि कथा स्थल पर भव्य व्यासपीठ विराजमान है, जहाँ से कथावाचक ज्ञानगंगा प्रवाहित करेंगे। पूरा नगर इन पलों के लिए उत्सुक है।

  जिन स्थानों पर यह दिव्य आयोजन होता है, उनमें श्री पांच धाम एक मुकाम माताजी मंदिर, श्री देववंशी मालवीय लौहार समाज श्री राम मंदिर,श्री मुक्तेश्वर महादेव मंदिर कृषि उपज मण्डी,श्री लालबाई–फुलबाई माताजी मंदिर,श्री राधाकृष्ण शेषशायी क्षत्रिय राजपूत समाज मंदिर,श्री शंकर मंदिर मालीपुरा,श्री राम मंदिर तीन बत्ती चौराहा,श्री राधा-कृष्ण गवली समाज मंदिर,श्री सेन समाज राम मंदिर,श्री चारभुजाजी मंदिर, श्री बाबा रामदेव मंदिर चारण समाज,श्री राम मंदिर दलपुरा तथा श्री आईमाताजी मंदिर दलपुरा प्रमुख हैं।

क्यों है यह परंपरा विशेष?

  देशभर में प्रायः किसी नगर में एक ही स्थान पर भागवत कथा का आयोजन होता है, लेकिन राजगढ़ का चिंतन इससे भिन्न है। यहाँ मान्यता है कि कथा केवल एक सभा तक सीमित न रहे, बल्कि घर-घर तक पहुँचे। इसी भावना के कारण हर समाज और हर मोहल्ले के मंदिर में अलग व्यासपीठ सजता है। इससे बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और दूर तक न जा पाने वाले श्रद्धालु भी अपने निकटस्थ मंदिर में बैठकर कथा श्रवण कर पाते हैं। सात दिनों तक पूरा नगर मानो एक विशाल कथा परिसर में परिवर्तित हो जाता है।

  शायद यह नज़ारा दुनिया में कहीं और देखने को न मिले—एक ही शहर या नगर में, एक ही समय,13 अलग-अलग मंदिरों में एक साथ 13 श्रीमद्भागवत कथाओं का आयोजन। राजगढ़ में यह विरल, अद्भुत और अभूतपूर्व दृश्य बनता है। जहाँ अन्य नगरों में भागवत कथा प्रायः एक ही स्थान पर सिमटी रहती है, वहीं राजगढ़ में भक्ति की धारा एक साथ 13 व्यासपीठों से फूटकर पूरे नगर को भागवतमय कर देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह अद्भुत संयोग शायद दुनिया में राजगढ़ में ही देखने को मिलता है।

धर्म,भक्ति और उत्सव का महासंगम

  22 सितंबर को सामूहिक डोल यात्रा निकाली जाएगी। 23 सितंबर को भगवान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का भव्य जुलूस आयोजित होगा। वहीं 26 सितंबर को ऐतिहासिक सनातन धर्मयात्रा निकलेगी, जिसमें सभी 13 मंदिरों के कथावाचक एक ही रथ पर विराजित होंगे। इस दिन सभी 13 मंदिरों के 13 कथावाचक एक ही रथ पर विराजमान होकर नगरवासियों को आशीर्वाद देंगे और उनके पीछे पूरा नगर धर्मयात्रा में सहभागी बनेगा। यह दृश्य राजगढ़ की सामूहिक आस्था, सनातन एकता और भागवत भक्ति का जीवंत उदाहरण होता है।

वेदों का अमृतफल,जो हर घर तक पहुँचता है

 जब एक ही नगर में 13 मुखों से एक साथ श्रीमद्भागवत कथा का गान होता है, तब “निगमकल्पतरोर्गलितं फलं” केवल एक श्लोक नहीं रह जाता, बल्कि जीवंत परंपरा बन जाता है। राजगढ़ ने वर्षों से इस अमृतफल को केवल संभाला ही नहीं, बल्कि उसे 13 व्यासपीठों के माध्यम से हर मोहल्ले और हर घर तक पहुँचाने की अनुपम परंपरा कायम रखी है। यही परंपरा राजगढ़ की सनातन एकता, भागवत भक्ति और सामूहिक श्रद्धा की सच्ची पहचान है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विश्व में विरल सनातन एकता और भागवत भक्ति का जीवंत उदाहरण है।