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कारीगरों की आजीविका को सशक्त बनाने के लिए हैंडलूम को रोज़मर्रा के फैशन से जोड़ रहा 'इंडियन पीकॉक'

हैदराबाद, तेलंगाना, भारत

पीढ़ियों से इस कला में माहिर भारतीय हैंडलूम (हथकरघा) बुनकरों को उन्हीं की अपनी कहानी से बाहर किया जा रहा था। उनके द्वारा बनाए गए कपड़े या तो संग्रहालयों तक सीमित रह गए या उन पर केवल "एथनिक वियर" (ethnic wear) का ठप्पा लगा दिया गया। इस बीच उनकी आजीविका अनिश्चित होती गई और उनका ज्ञान धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया।

 ऐसा इसलिए नहीं है कि इस शिल्प (craft) का कोई मूल्य नहीं बचा, बल्कि इसलिए है क्योंकि करघे (loom) से लेकर रोज़मर्रा के जीवन तक के सफर में बहुत सी बाधाएं हैं।

 इंडियन पीकॉक' सीधी साझेदारी के माध्यम से इन दूरियों को मिटाने का प्रयास कर रहा है।

आर्किटेक्ट प्रीति पथिरेड्डी द्वारा स्थापित, 'द इंडियन पीकॉक' वह जगह है जहाँ वास्तुकला में उनका एक दशक लंबा सफर टेक्सचर, रूप और सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनके गहरे प्रेम से मिलता है। आइवी लीग (Ivy League) की पूर्व छात्रा रहीं प्रीति हमेशा से अपने डिजाइन दृष्टिकोण में सहज रही हैं, जो संरचना (structure) और कोमलता, शिल्प और उपयोगिता के बीच एक संबंध स्थापित करती हैं। भारत की कपड़ा विरासत की एक व्यक्तिगत खोज के रूप में जो शुरू हुआ था, वह जल्द ही 'स्लो फैशन' और 'कॉन्शियस लिविंग' (conscious living) के प्रति प्रतिबद्ध एक ब्रांड के रूप में विकसित हो गया।

 हम पूरे भारत में हैंडलूम कारीगरों के साथ मिलकर काम करते हैं। इनमें पश्चिम बंगाल के जामदानी (Jamdani) बुनकर, तेलंगाना के इकत (Ikat) बुनकर, राजस्थान के हैंडब्लॉक प्रिंट (handblock print) कारीगर और आंध्र प्रदेश के मंगलगिरी (Mangalgiri) बुनकर शामिल हैं। वे हमारे लिए केवल वेंडर नहीं बल्कि भागीदार हैं। हम उनके शिल्प, उनकी प्रक्रियाओं और उनकी कहानियों को समझते हैं। हम उन्हें केवल मौसमी मांग नहीं बल्कि उचित पारिश्रमिक और निरंतर काम के साथ समर्थन देते हैं।

 यह पारंपरिक शिल्प के "आधुनिकीकरण" (modernizing) के बारे में नहीं है। हम कुछ बहुत ही सरल करते हैं: हम उनके काम को रोज़मर्रा के जीवन में पहनने योग्य (wearable) बनाते हैं।

 हम रोज़ पहनने के लिए स्ट्रक्चर्ड शर्ट, विभिन्न किस्म के कुर्ते और सोच-समझकर तैयार किए गए को-ऑर्ड सेट डिज़ाइन करते हैं। हम शिल्प को 'फ्यूज़न' या केवल 'अवसर विशेष' (occasionwear) के परिधान के रूप में नहीं देखते हैं। हमारा उद्देश्य हथकरघा वस्त्रों को जीवन की लय में लाना है, ताकि उन्हें बार-बार पहना जा सके, उन्हें जिया जा सके और उन पर भरोसा किया जा सके। क्योंकि कोई भी शिल्प केवल कभी-कभार की जाने वाली प्रशंसा से जीवित नहीं रहता बल्कि अपनी प्रासंगिकता और निरंतर उपयोग से जीवित रहता है।

एक हाथ से बुना हुआ परिधान ऐसा बन जाता है जिसे आप हफ्ते दर हफ्ते पहनना पसंद करते हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादित विकल्पों (mass-produced alternatives) के बजाय, यह एक शांत निरंतरता पैदा करता है। यह करघों को सक्रिय रखता है, कौशल को प्रासंगिक बनाता है और आजीविका को स्थिर रखता है। हैंडलूम केवल प्रशंसा या कभी-कभार पहनने से जीवित नहीं रहता, बल्कि उन रोज़मर्रा के विकल्पों से जीवित रहता है जो इस शिल्प को प्रासंगिक और गतिमान बनाए रखते हैं।

इस तरह हम अपनी कहानी को वापस हासिल करते हैं: कारीगरों के शिल्प को वापस उसी जगह रखकर जहाँ का वह हमेशा से हकदार रहा है।

'इंडियन पीकॉक' कारीगरों को 'बचा' नहीं रहा है; उन्हें बाज़ार, सम्मान और उचित अनुदान की आवश्यकता है, और हम वही प्रदान कर रहे हैं। हम परंपरा को किसी संग्रहालय में सहेज कर नहीं रख रहे हैं, बल्कि हम यह साबित कर रहे हैं कि यह कला जीवित है और आवश्यक है।

 हर परिधान में उसे बनाने वाले की उपस्थिति झलकती है। हर कलेक्शन की शुरुआत कपड़े से होती है, न कि किसी ट्रेंड से। हमारा हर फैसला यह पूछता है: क्या यह शिल्प और शिल्पकार के हित में है? क्योंकि जब भारतीय परिधान विरासत वाले करघों से निकलकर आधुनिक सड़कों तक पहुंचते हैं, तो वे अपनी बुनाई के साथ कारीगर की गरिमा को भी पहनते हैं, और तब यह कहानी फिर से उनकी हो जाती है।

 यह काम करघे से कहीं आगे तक फैला हुआ है। हमारे हैदराबाद स्थित स्टूडियो में हर परिधान एक ऐसी टीम के हाथों से होकर गुजरता है जो कपड़े को उसी बारीकी से काटती, सिलती और फिनिश करती है, जिस बारीकी के साथ उसे बुना गया था। शिल्प कभी भी अलगाव में मौजूद नहीं होता और न ही हम। उचित पारिश्रमिक, निरंतर काम और एक सहायक वातावरण वे सिद्धांत हैं जिन्हें हम इस प्रक्रिया में शामिल सभी लोगों पर लागू करते हैं। न केवल विचारों में, बल्कि व्यवहार में भी।

हम यहां सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि यह कहानी सोची-समझी रणनीति, निरंतरता और उस पर विश्वास करने वाली एक टीम के साथ दुनिया को बताई जाए।

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