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पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के द्वितीय दिवस,सामायिक में आत्मा की अनुभूति: मुनि पीयूषचन्द्रविजय

 


  राजगढ़ (धार)। पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के दूसरे दिन मुनिश्री कहा कि लोकिक पर्व से कर्मो के बंधन होते है और लौकोत्तर पर्व कर्मो से छुटकारा दिलाते है । मानव ही नहीं देवता भी इस लौकोत्तर पर्व को मनाते है और नन्दीश्वर द्वीप जाकर लौकोत्तर पर्व मनाते है । इस पर्व के दिनांे का पूरा फायदा समझदार व्यक्ति उठा लेता है । जिस प्रकार एक मासूम बच्चा भी पहचानकर नोट को तो उठा लेता है मगर कागज को नहीं उठाता है । पर्व के दिनों में हमें उत्तरोत्तर प्रगति की श्रेष्ठ भावना रखना चाहिये । पर्व के आठ दिनों में पूजा, प्रतिक्रमण, सामायिक आदि करना चाहिये । भौतिक अलंकार शरीर को सुसज्जित करके आपकी समृद्धि का प्रदर्शन तो कर सकते है पर आत्मा का गहना, सामायिक, प्रतिक्रमण, पौषध, पूजा, स्नात्र पूजा, ब्रम्हचर्य, दान, तप है । ये धर्म के 9 अलंकार आत्मा को सुसज्जित करते है । पर्व के दिनों में सौन्दर्य सामग्री का उपयोग नहीं करें । यदि सजने धजने का शौक है तो आत्मा को धर्म के अलंकारों से सजाना ही आत्मा के कल्याण के लिये उपयुक्त होगा । उक्त उपदेश गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्यरत्न मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. ने अपने प्रवचन में दिये । आपने कहा कि सामायिक की महिमा अनन्त है । एक लाख स्वर्ण खण्डी मुद्रा प्रतिदिन सौ वर्षो तक दान भी दे तो भी एक सामायिक का मूल्य नहीं चूकाया जा सकता है यानी प्रतिदिन 400 किलोग्राम स्वर्ण मुद्रा का दान । प्रतिदिन एक सामायिक पूरे एकाग्र भाव से पूर्ण श्रद्धा के साथ पुनीया श्रावक की तरह होनी चाहिये । समवशरण में प्रभु की जिन वाणी का श्रवण 12 प्रसदा करती है । हमेशा समता के भावों के साथ जीने का प्रयास होना चाहिये । हम 7 नरक का वर्णन सुनने के बाद भी अपनी आत्मा के कल्याण के बारे में बिलकुल भी विचार नहीं कर रहे है । सामायिक में आत्मा की अनुभूति होती है इसमें भावों की पूजा होती है और भावों से ही व्यक्ति मोक्ष तक की यात्रा कर सकता है । एक सामायिक का असर मात्र 48 मिनिट तक नहीं वरन पूरे दिन रहना चाहिये । प्रतिक्रमण पूरे योग शास्त्र पर आधारित है । जीवन में छोटे से छोटे तप का भी नियम जरुर होना चाहिये । चौविहार का नियम लेने से व्यक्ति को रात्रि भोजन का दोष नहीं लगता है । जिन शासन में ऐसे अनेक नियम है जिससे आत्मा अपना कल्याण कर सकती है । जिनशासन हमेशा सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यकचारित्र की बात करता है । बिना ज्ञान के लक्ष्मी की प्राप्ति भी असम्भव है ।

श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वे. पेढ़ी ट्रस्ट श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ के तत्वाधान में गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के आज्ञानुवर्ती मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज वैराग्ययशविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जिनचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जनकचन्द्रविजयजी म.सा. एवं साध्वी श्री सद्गुणाश्रीजी म.सा., साध्वी श्री संघवणश्रीजी म.सा., साध्वी श्री विमलयशाश्रीजी म.सा. आदि ठाणा की निश्रा में पर्युषण महापर्व की आराधना चल रही है ।

आज पर्युषण महापर्व के द्वितीय दिन अष्टान्हिका प्रवचन की गहुंली का लाभ श्री अशोककुमारजी पारसमलजी रांका भीनमाल और दोपहर के प्रवचन में गहुंली का लाभ श्रीमती पारसमणी महेन्द्रजी भण्डारी राजगढ़ वालों को प्राप्त हुआ । जिन मंदिर एवं दादा गुरुदेव के समाधि मंदिर में मनमोहक अंगरचना की गयी ।

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