बेज़ुबान जानवरों पर प्रयोग आसान होने की आशंका! केंद्र के ड्राफ्ट पर श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने उठाए सवाल

पशुओं पर वैज्ञानिक प्रयोगों के प्रस्तावित नियमों को लेकर श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने जताई चिंता



 


 आवारा कुत्तों-बिल्लियों और वन्यजीवों पर प्रयोग की संभावनाओं को लेकर जताई चिंता, 5 नवंबर से पहले आपत्तियां दर्ज कराने की अपील

 नई दिल्ली। पशुओं पर वैज्ञानिक प्रयोगों से जुड़े नियमों में प्रस्तावित बदलाव को लेकर पशु-कल्याण और जीवदया से जुड़े लोगों के बीच चिंता बढ़ रही है। श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित ड्राफ्ट पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यदि पशु संरक्षण के पर्याप्त प्रावधान नहीं रखे गए, तो प्रयोगशालाओं में बेज़ुबान जीवों की सुरक्षा और स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उन्होंने सरकार से प्रस्ताव की समीक्षा कर पशु हितों को प्राथमिकता देने की मांग की है।

 ड्राफ्ट का नाम Prevention of Cruelty to Animals (Control and Supervision of Experiment, Breeding and Trading of Laboratory Animals) Rules, 2026 है। यह प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले पशुओं के प्रजनन, व्यापार और वैज्ञानिक प्रयोगों से संबंधित नियमों में बदलाव का प्रस्ताव है। केंद्र सरकार ने इस पर आम लोगों से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुझाव भेजने की अंतिम तारीख 5 नवंबर 2026 है। ये अभी प्रस्तावित नियम हैं, इन्हें अंतिम रूप से लागू नियम नहीं माना जाना चाहिए।

प्रयोगों की मंजूरी को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?

 श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने चिंता जताई कि प्रस्तावित व्यवस्था में प्रयोगों की गंभीरता के आधार पर मंजूरी देने की प्रक्रिया में बदलाव हो सकता है। उनके अनुसार, यदि कुछ श्रेणियों के प्रयोगों को संबंधित संस्थान की अपनी पशु नैतिकता समिति से मंजूरी मिलने लगे और केंद्रीय स्तर की निगरानी सीमित हो जाए, तो निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ सकते हैं।

 सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि किसी प्रयोग में पशु को कितना दर्द या कष्ट हो सकता है, इसका आकलन कौन करेगा और यह सुनिश्चित कैसे होगा कि प्रयोगशाला के व्यावसायिक हित पशु कल्याण पर हावी न हों। डॉ. पुष्पेन्द्र का कहना है कि पशुओं की पीड़ा का आकलन और प्रयोगों की मंजूरी ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत होनी चाहिए, जिसमें स्वतंत्र निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित हो।

आवारा कुत्तों-बिल्लियों और वन्यजीवों को लेकर चिंता

 प्रस्तावित नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर आवारा या स्वतंत्र रूप से रहने वाले पशुओं तथा वन्यजीवों के संभावित उपयोग पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। डॉ. पुष्पेन्द्र ने आशंका जताई कि यदि अपवादों और अनुमति की शर्तों को स्पष्ट तथा सख्त नहीं बनाया गया, तो आवारा कुत्तों, बिल्लियों और कुछ वन्यजीवों के प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल का जोखिम बढ़ सकता है।

 उनका कहना है कि सड़कों पर रहने वाले पशु पहले से ही कई चुनौतियों का सामना करते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा, स्रोत की वैधता और प्रयोगों में इस्तेमाल की अनुमति को लेकर कोई अस्पष्टता नहीं रहनी चाहिए। वन्यजीवों के मामले में वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानूनों और आवश्यक अनुमतियों का पालन भी बेहद महत्वपूर्ण है।

 हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ड्राफ्ट में कुछ परिस्थितियों के लिए अपवाद या अनुमति संबंधी प्रावधान होने का अर्थ यह नहीं है कि अब सभी आवारा पशुओं या वन्यजीवों को पकड़कर प्रयोग करने की सामान्य छूट मिल गई है। वास्तविक स्थिति संबंधित नियमों की भाषा, लागू कानूनों और आवश्यक अनुमतियों पर निर्भर करेगी।

कॉस्मेटिक टेस्टिंग पर भी चर्चा,लेकिन क्या प्रतिबंध हट गया है?

 पशुओं पर प्रयोगों से जुड़ी बहस में कॉस्मेटिक उत्पादों की टेस्टिंग का मुद्दा भी सामने आ रहा है। भारत में कॉस्मेटिक उत्पादों के पशु-परीक्षण को लेकर पहले से नियामकीय प्रतिबंध हैं। ऐसे में प्रयोगशाला पशुओं से जुड़े व्यापक ड्राफ्ट को देखकर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि कॉस्मेटिक टेस्टिंग पर लगा प्रतिबंध अपने-आप समाप्त हो गया है।

 इस विषय पर डॉ. पुष्पेन्द्र की चिंता यह है कि नियमों में बदलाव करते समय ऐसी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे किसी भी प्रावधान की आड़ में पशुओं के प्रति क्रूरता को बढ़ावा न मिले। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कॉस्मेटिक परीक्षण सहित अलग-अलग प्रकार के प्रयोगों पर लागू प्रतिबंधों और सुरक्षा मानकों की स्थिति स्पष्ट रहे।

विज्ञान की प्रगति में पशु-विहीन तकनीकों को मिले प्राथमिकता

  श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने कहा कि विज्ञान और तकनीक तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कंप्यूटर आधारित मॉडल, प्रयोगशाला में विकसित मानव कोशिकाओं और ऊतकों तथा ऑर्गन-ऑन-चिप जैसी विधियों पर काम हो रहा है। ऐसी तकनीकें कई परिस्थितियों में पशुओं पर निर्भरता कम करने के विकल्प उपलब्ध करा सकती हैं।

 उनका मानना है कि जहां वैज्ञानिक रूप से मान्य और सुरक्षित पशु-विहीन विधियां उपलब्ध हों, वहां उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इससे पशुओं की पीड़ा कम करने के साथ-साथ शोध को अधिक आधुनिक और मानव-प्रासंगिक बनाया जा सकता है। हालांकि, हर परीक्षण में एक ही विकल्प उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है; इसलिए वैकल्पिक विधियों का उपयोग वैज्ञानिक प्रमाणों और संबंधित नियामकीय मानकों के आधार पर किया जाना चाहिए।

सरकार से पुनर्विचार और मजबूत निगरानी की मांग

 डॉ. पुष्पेन्द्र ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित ड्राफ्ट की समीक्षा करने और पशु कल्याण से जुड़े प्रावधानों को मजबूत बनाने की मांग की है। उनकी प्रमुख चिंताएं हैं कि प्रयोगों की मंजूरी में स्वतंत्र निगरानी बनी रहे, पशुओं की पीड़ा का निष्पक्ष आकलन हो, आवारा पशुओं और वन्यजीवों के स्रोत तथा उपयोग को लेकर स्पष्ट नियम हों और पशु-विहीन वैज्ञानिक विकल्पों को प्रोत्साहन दिया जाए।

 उन्होंने पशुप्रेमियों, संत समाज और अहिंसा में विश्वास रखने वाले नागरिकों से भी अपील की कि वे 5 नवंबर 2026 से पहले प्रस्तावित नियमों पर अपनी आपत्तियां और सुझाव केंद्र सरकार के समक्ष दर्ज कराएं।

अब आगे क्या?

 प्रस्तावित ड्राफ्ट पर आम लोगों और संबंधित पक्षों से प्राप्त सुझावों के बाद सरकार नियमों पर आगे निर्णय ले सकती है। इसलिए इस समय नागरिकों के लिए जरूरी है कि वे प्रस्तावित प्रावधानों को पढ़ें, अपनी आपत्तियां तथ्यों और संबंधित नियमों के आधार पर दर्ज कराएं और पशु कल्याण से जुड़े मुद्दों पर जिम्मेदारीपूर्वक अपनी बात रखें।

 डॉ. पुष्पेन्द्र की मांग है कि वैज्ञानिक शोध और पशु संरक्षण के बीच संतुलन कायम किया जाए, ताकि विज्ञान की प्रगति के साथ बेज़ुबान जीवों के प्रति संवेदनशीलता और अहिंसा का सिद्धांत भी सुरक्षित रह सके।

  नोट: यह समाचार श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र द्वारा व्यक्त चिंताओं और उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। प्रस्तावित नियमों की अंतिम स्थिति के लिए केंद्र सरकार की आधिकारिक अधिसूचना और संबंधित प्राधिकरण की जानकारी देखें।