वंदे मातरम् के संगीत का रोचक इतिहास जानिए। रवीन्द्रनाथ टैगोर,पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर,दिलीप कुमार राय, ओंकारनाथ ठाकुर और अन्य संगीतकारों ने इसे अलग-अलग रागों और धुनों में प्रस्तुत किया।
देश वंदे मातरम् की 150वीं जयंती के अवसर पर इस ऐतिहासिक राष्ट्रगीत को याद कर रहा है। वंदे मातरम् केवल स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणादायी गीत नहीं रहा, बल्कि भारतीय संगीत परंपरा के अनेक महान कलाकारों ने अपनी प्रतिभा से इसे अलग-अलग धुनों और रागों में प्रस्तुत किया। इसकी संस्कृतनिष्ठ भाषा को सामूहिक गायन के अनुरूप संगीत देना अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य था।
वंदे मातरम् की पहली प्रसिद्ध धुन रवीन्द्रनाथ टैगोर से जुड़ी मानी जाती है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बारहवें अधिवेशन में स्वयं वंदे मातरम् प्रस्तुत किया था। वर्ष 1904 में उनकी आवाज में वंदे मातरम् का ग्रामोफोन रिकॉर्ड भी बाजार में आया। फ्रांस की रिकॉर्ड कंपनी पाथे ने इसका प्रकाशन किया था।
वर्ष 1901 में दक्षिणराजन सेन ने भी अपनी बनाई धुन में वंदे मातरम् प्रस्तुत किया था। इसके बाद इस गीत को लोकप्रिय बनाने में पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने लाहौर से इसकी सार्वजनिक प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू किया और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े विभिन्न अवसरों पर इसे गाया। उनकी प्रस्तुति में गीत के मूल भाव, शब्दों की गंभीरता और राष्ट्रभक्ति की भावना को विशेष महत्व दिया गया।
वंदे मातरम् की संगीत यात्रा में दिलीप कुमार राय का नाम भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इसकी एक नई संगीत रचना तैयार की और 29 अगस्त 1927 को महात्मा गांधी की उपस्थिति में इसे प्रस्तुत किया। गांधी जी ने उनकी प्रस्तुति की सराहना की थी। दिलीप कुमार राय के वंदे मातरम् के दो रिकॉर्ड भी उपलब्ध रहे हैं। इनमें एक प्रस्तुति असम की लोकगीत शैली से प्रभावित थी, जबकि दूसरी प्रस्तुति उन्होंने कर्नाटक संगीत की महान गायिका एम.एस. सुब्बलक्ष्मी के साथ की थी। इस रचना में राग बिलावल और राग बागेश्री का समन्वय बताया जाता है।
वंदे मातरम् को लोकप्रिय और सामूहिक गायन के लिए उपयुक्त बनाने में मास्टर कृष्णराव का योगदान भी उल्लेखनीय रहा। पुणे में जन्मे मास्टर कृष्णराव गायक और अभिनेता थे। उन्होंने राग झिंझोटी में वंदे मातरम् की धुन तैयार की और इसे सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया। वे चाहते थे कि वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में व्यापक सम्मान मिले।
पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने वंदे मातरम् को राग काफी में भी प्रस्तुत किया। इसी राग में पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की प्रस्तुति को भी खूब सराहना मिली। ओंकारनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम् का संपूर्ण गीत गाया था। स्वतंत्रता के बाद 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता दिवस की सुबह आकाशवाणी से वंदे मातरम् प्रस्तुत करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया। इस अवसर पर ओंकारनाथ ठाकुर ने सावधान की मुद्रा में पूरा गीत प्रस्तुत किया।
वर्ष 1935 से 1952 के बीच अनेक प्रसिद्ध संगीतकारों ने वंदे मातरम् को अपनी-अपनी शैली में संगीतबद्ध किया। इनमें मराठी रंगमंच से जुड़े अभिनेता केशवराव भोले,विष्णुपंत फगणीस,वी.डी. अभ्यंकर,मास्टर कृष्णराव और दिलीप कुमार राय जैसे नाम शामिल हैं।
विष्णुपंत फगणीस ने वंदे मातरम् को राग सारंग में प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति के अवसर पर गोविंद वल्लभ पंत, डॉ. पट्टाभि सीतारमैया और दादा धर्माधिकारी जैसे प्रमुख लोग उपस्थित थे। इसके बाद मोगूबाई कुर्डीकर ने भी वंदे मातरम् को राग मिश्र खंबावती में प्रस्तुत किया।
वंदे मातरम् की एक अन्य महत्वपूर्ण धुन तिमिरबरन भट्टाचार्य ने राग दुर्गा में तैयार की। इस धुन की विशेषता यह थी कि इसकी प्रकृति मार्च पास्ट के लिए उपयुक्त मानी गई। यही धुन ब्रिटिश बैंड पर भी बजाई गई थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के दौर में इस धुन को सिंगापुर रेडियो से प्रसारित करवाया था।
समय के साथ वंदे मातरम् की कई लोकप्रिय धुनें सामने आती रहीं। संगीतकार हेमंत कुमार की बनाई धुन भी लोगों के बीच लोकप्रिय हुई। मास्टर कृष्णराव ने वंदे मातरम् की संगीत रचनाओं से जुड़े विचारों और प्रस्तुतियों को स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न नेताओं के सामने रखा। बाद के दौर में ए.आर. रहमान सहित आधुनिक संगीतकारों ने भी वंदे मातरम् को अपनी संगीत शैली में प्रस्तुत किया।
वंदे मातरम् और स्वतंत्रता आंदोलन
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इस गीत ने लोगों के भीतर देशप्रेम, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करने में योगदान दिया। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसका गायन लोगों को एकजुट करने और उनमें राष्ट्रीय चेतना पैदा करने का माध्यम बना।
वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं था, बल्कि उस दौर में यह अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीयों की भावनाओं और स्वतंत्रता की आकांक्षा की अभिव्यक्ति बन गया था। इसके माध्यम से लोगों में देश के सम्मान और स्वाभिमान के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा पैदा हुई।
राष्ट्रगान के चयन के समय वंदे मातरम् पर चर्चा
भारत के गणतंत्र बनने की प्रक्रिया के दौरान राष्ट्रगान के चयन का विषय भी सामने आया। 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र की स्थापना से पहले राष्ट्रगान के संबंध में विचार-विमर्श हुआ। उस समय वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका और लोकप्रियता निर्विवाद थी, लेकिन यह सवाल भी सामने आया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैंड और ऑर्केस्ट्रा के माध्यम से इसकी धुन को प्रस्तुत करना कितना सुविधाजनक होगा।
राष्ट्रगान के लिए ऐसी धुन को उपयुक्त माना गया जो भारतीय संगीत की विशेषताओं को प्रदर्शित करने के साथ-साथ बैंड और ऑर्केस्ट्रा पर भी आसानी से प्रस्तुत की जा सके। इस दृष्टि से जन गण मन की धुन को अधिक सुविधाजनक माना गया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रगान और वंदे मातरम् के संबंध में महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा कि जन गण मन भारत का राष्ट्रगान रहेगा और स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक योगदान देने वाले वंदे मातरम् को भी समान सम्मान प्राप्त होगा।
इस प्रकार जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में सम्मान मिला। दोनों ही रचनाएं भारत के राष्ट्रीय जीवन और स्वतंत्रता संघर्ष की महत्वपूर्ण विरासत का हिस्सा हैं।
शासकीय कार्यालयों में वंदे मातरम् का गायन
वंदे मातरम् का गायन संसद और विधानसभाओं सहित विभिन्न सार्वजनिक अवसरों पर किया जाता है। शासकीय कार्यालयों में भी इसके गायन को चरणबद्ध रूप से लागू करने की पहल की गई है। कार्यालयों में सामान्यतः वंदे मातरम् के पहले दो छंदों के सामूहिक गायन की व्यवस्था की जा रही है।
इसका उद्देश्य शासकीय कर्मचारियों में राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रसेवा और अनुशासन की भावना को मजबूत करना है। सामूहिक रूप से राष्ट्रगीत का गायन कर्मचारियों को अपने दायित्वों और देश के प्रति जिम्मेदारी का स्मरण कराने का माध्यम भी बन सकता है।
वंदे मातरम् का संगीत इतिहास भारतीय संगीत और स्वतंत्रता आंदोलन के बीच गहरे संबंध को सामने लाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर से लेकर पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर, दिलीप कुमार राय, मास्टर कृष्णराव, पंडित ओंकारनाथ ठाकुर और अनेक अन्य संगीतकारों ने अपनी कला के माध्यम से इस राष्ट्रगीत को नई पहचान दी। अलग-अलग रागों और संगीत शैलियों में प्रस्तुत होने के बावजूद वंदे मातरम् की मूल भावना देशप्रेम और मातृभूमि के प्रति सम्मान की रही है।

