वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक रहा है। जानिए इसकी रचना, ऐतिहासिक यात्रा और राष्ट्रगीत के रूप में मिले सम्मान से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य।
भारत में वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में विशेष सम्मान प्राप्त है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस गीत ने देशवासियों में राष्ट्रप्रेम और स्वाधीनता की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वंदे मातरम् की 150वीं जयंती के अवसर पर इसके इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को जानना नई पीढ़ी के लिए भी उपयोगी है।
वंदे मातरम् की रचना और आनंदमठ
वंदे मातरम् की रचना प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने की थी। इसका संबंध बंगाल के कांतलपाड़ा क्षेत्र और गंगा तट से जोड़ा जाता है। बाद में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस रचना को अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।
आनंदमठ का प्रकाशन पहले बंग दर्शन पत्रिका में धारावाहिक रूप से हुआ और वर्ष 1882 में यह पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। वंदे मातरम् में मातृभूमि के प्रति सम्मान और समर्पण की भावना दिखाई देती है। यही कारण रहा कि आगे चलकर यह गीत भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की भूमिका
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् धीरे-धीरे देशभर में लोकप्रिय होता गया। आंदोलनकारियों और राष्ट्रभक्तों के बीच यह गीत उत्साह और देशभक्ति का संदेश देने वाला प्रमुख माध्यम बन गया।
वंदे मातरम् के माध्यम से लोगों में अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान और स्वतंत्रता प्राप्त करने की भावना मजबूत हुई। स्वतंत्रता आंदोलन के कई चरणों में इसके उद्घोष और सामूहिक गायन ने लोगों को एकजुट करने का काम किया।
विष्णु दिगंबर पलुस्कर का योगदान
प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने भी वंदे मातरम् को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में इसकी प्रस्तुति दी।
उनकी प्रभावशाली गायन शैली के कारण श्रोताओं में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय गौरव की भावना जागृत होती थी। लाहौर से शुरू हुई उनकी प्रस्तुतियों ने वंदे मातरम् को व्यापक पहचान दिलाने में योगदान दिया।
1896 के कांग्रेस अधिवेशन में वंदे मातरम्
वर्ष 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में वंदे मातरम् का सामूहिक राजनीतिक मंच पर गायन हुआ। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं इसका गायन किया था। इसे वंदे मातरम् के सार्वजनिक राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में माना जाता है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर का इस गीत से जुड़ाव केवल गायन तक सीमित नहीं था। उन्होंने इसके संगीत संयोजन में भी योगदान दिया था।
1901 और 1905 का दौर
वर्ष 1901 में कांग्रेस के अधिवेशन के लिए वंदे मातरम् के गायन की तैयारी की गई थी। इसके संगीत संयोजन से जुड़े प्रयासों ने कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रमों में इस गीत की उपस्थिति को मजबूत किया।
वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन ने व्यापक रूप लिया। 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता में स्वदेशी आंदोलन से जुड़ी महत्वपूर्ण घोषणा हुई और 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन लागू किया गया।
इस दौर में वंदे मातरम् का उद्घोष आंदोलन का प्रमुख स्वर बन गया। स्कूलों, सार्वजनिक स्थानों और विभिन्न आंदोलनों में इसके माध्यम से देशभक्ति की भावना व्यक्त की जाने लगी।
वंदे मातरम् और राष्ट्रीय आंदोलन
1905 के बाद वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं रहा, बल्कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया। इसके प्रभाव से जुड़े अनेक आंदोलन और घटनाएं स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दर्ज हैं।
इसी दौर से संबंधित एक प्रसिद्ध घटना में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के नागपुर के स्कूल से निष्कासन का उल्लेख मिलता है। बाद में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक बने।
कांग्रेस अधिवेशनों में वंदे मातरम्
वंदे मातरम् का कांग्रेस के अधिवेशनों से भी गहरा संबंध रहा। 1915 के बाद कांग्रेस के अधिवेशनों की शुरुआत वंदे मातरम् के गायन से किए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
आज भी भारतीय सार्वजनिक जीवन में यह गीत राष्ट्रीय भावना के महत्वपूर्ण प्रतीकों में शामिल है।
सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज
वंदे मातरम् का संबंध नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद आंदोलन से भी रहा। भारतीय राष्ट्रीय सेना यानी इंडियन नेशनल आर्मी के दौर में भी इस गीत का उपयोग राष्ट्रवादी भावना को मजबूत करने के लिए किया गया।
सिंगापुर से प्रसारित होने वाले रेडियो कार्यक्रमों में भी वंदे मातरम् का प्रसारण किए जाने का उल्लेख मिलता है।
1906 में आंदोलन और लाठीचार्ज
14 अप्रैल 1906 को कलकत्ता में वंदे मातरम् से जुड़े एक जुलूस पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किए जाने की घटना का भी इतिहास में उल्लेख मिलता है। इस घटना में अरविंद घोष के घायल होने की बात कही जाती है।
अरविंद घोष ने वंदे मातरम् को राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में देखा। उन्होंने इसके महत्व को अपने लेखन में भी रेखांकित किया और इसके अंग्रेजी अनुवाद से भी जुड़े रहे।
1937 में वंदे मातरम् पर विचार
वर्ष 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के गायन से जुड़े विषयों पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की थी। इसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और आचार्य नरेंद्र देव शामिल थे।
रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी इस विषय में मार्गदर्शन लिया जाना था। इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने अधिवेशनों में वंदे मातरम् के पहले दो छंदों के गायन का निर्णय लिया।
वर्ष 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में पहले दो छंदों के गायन की व्यवस्था किए जाने का उल्लेख मिलता है।
वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान
भारत की स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रगान के चयन का विषय सामने आया। वंदे मातरम् का स्वतंत्रता आंदोलन में ऐतिहासिक योगदान निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण था, लेकिन राष्ट्रगान के लिए धुन और औपचारिक प्रस्तुतियों से जुड़े कुछ व्यावहारिक पहलुओं पर भी विचार किया गया।
विशेष रूप से बैंड और ऑर्केस्ट्रा पर प्रस्तुति की सुविधा को ध्यान में रखते हुए जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रगान और वंदे मातरम् के संबंध में महत्वपूर्ण घोषणा की। इसमें जन गण मन को राष्ट्रगान स्वीकार किए जाने के साथ स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले वंदे मातरम् को भी समान सम्मान दिए जाने की बात कही गई।
इस प्रकार जन गण मन भारत का राष्ट्रगान बना और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में विशेष राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ।
शासकीय कार्यालयों में वंदे मातरम्
वंदे मातरम् का गायन संसद और विधानसभाओं जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में भी किया जाता है। शासकीय कार्यालयों में इसके गायन को लेकर भी समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
इसके पहले दो छंदों के सामूहिक गायन का उद्देश्य कर्मचारियों में राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रीय कर्तव्य और राष्ट्र सेवा की भावना को मजबूत करना बताया गया है।
वंदे मातरम् का राष्ट्रीय महत्व
वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ा हुआ गीत है। इसने ब्रिटिश शासन के दौर में लोगों को एकजुट करने, राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने और स्वतंत्रता की आकांक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बंकिम चंद्र चटर्जी की यह रचना आज भी भारत की राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वंदे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम्।
शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित दुमदल शोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम्।
वन्दे मातरम्।
बंकिम चंद्र चटर्जी
(1838-1894)
संदर्भ: मध्यप्रदेश संदेश में प्रकाशित ऐतिहासिक सामग्री

