राजगढ़ (धार) । राजगढ़ नगर में 16 अगस्त रविवार को श्रावण मास के तीसरे सोमवार की पूर्व संध्या पर चारभुजा नाथ मंदिर में सात दिवसीय शिवमहापुराण कथा का शुभारंभ हुआ। कथा के प्रथम दिवस पं. सुभाषचंद्र शर्मा ने शिवमहापुराण की महिमा, गुरु की आवश्यकता, अहंकार, माया और मानव जीवन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
पं. सुभाषचंद्र शर्मा ने कहा कि शिवमहापुराण कथा श्रवण के लिए मन का एकाग्र होना आवश्यक है। मन इधर-उधर भटकता रहे तो कथा का वास्तविक आनंद और आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त नहीं हो सकती। उन्होंने नैमिषारण्य वन की महिमा बताते हुए कहा कि यह पवित्र भूमि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से संबंधित मानी गई है और ऋषियों ने यहां यज्ञ एवं धर्म साधना की।
उन्होंने कहा कि भगवान के दर्शन कथा के माध्यम से भी प्राप्त किए जा सकते हैं। शिवमहापुराण में शिव का स्वरूप, भागवत कथा में कृष्ण का स्वरूप और रामकथा में भगवान राम का स्वरूप समझने का अवसर मिलता है। कथा केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का माध्यम है।
मानव जीवन को दुर्लभ बताते हुए पं. शर्मा ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। गलत कर्मों का फल भोगना पड़ता है। उन्होंने विदुर जी के प्रसंग के माध्यम से कर्म और धर्म की महत्ता समझाई तथा कहा कि जीवन में सच्चे गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। गुरु के मार्गदर्शन के बिना जप, तप, दान और पुण्य का वास्तविक उद्देश्य समझना कठिन हो जाता है।
चंचुला की कथा का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि जीवन में परिवर्तन कभी भी संभव है। गुरु की शरण और शिवमहापुराण कथा के श्रवण से मनुष्य अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति मनुष्य को भीतर से बदलने की शक्ति रखती है।
अहंकार को वर्तमान युग का सबसे बड़ा राक्षस बताते हुए पं. सुभाषचंद्र शर्मा ने कहा कि अहंकार मनुष्य को पल-पल पतन की ओर ले जाता है, लेकिन व्यक्ति को इसका एहसास तक नहीं होता। ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर हुए विवाद तथा भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग स्वरूप में प्रकट होने का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने विनम्रता का संदेश दिया।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान से केवल सांसारिक वस्तुएं मांगने के बजाय भक्ति मांगनी चाहिए। धन,संपत्ति,नौकरी और अन्य सांसारिक सुख मिलने के साथ उनकी चिंताएं भी आती हैं, जबकि सच्ची भक्ति मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है।
दुख के समय घबराने के बजाय भगवान का स्मरण करने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि सुख और दुख दोनों जीवन का हिस्सा हैं। कठिन परिस्थितियों में भी निरंतर भगवान का जाप और विश्वास मनुष्य को आगे बढ़ने की शक्ति देता है।
नारद जी के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अहंकार के परिणामों को समझाया। वहीं सुदामा जी की कथा के माध्यम से माया के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसार की सभी वस्तुएं अस्थायी हैं। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि शरीर, संपत्ति और सांसारिक वैभव स्थायी नहीं हैं।
पं.शर्मा ने कहा कि मीरा,नरसी मेहता,नामदेव और चैतन्य महाप्रभु जैसे भक्तों ने सांसारिक माया से ऊपर उठकर भक्ति का मार्ग अपनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं से सच्ची भाषा बोलने, सेवा करने और अच्छे कर्म करने का आह्वान किया।
कथा के दौरान उन्होंने पार्थिव शिवलिंग पूजा की महिमा भी बताई। उन्होंने कहा कि श्रद्धा और विधि-विधान से पार्थिव शिवलिंग का पूजन शिवभक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम है। मिट्टी से शिवलिंग बनाकर चंदन और अक्षत से पूजा करने तथा संध्या से पूर्व पूजन कर विसर्जन करने की परंपरा का उल्लेख किया गया। उन्होंने बताया कि श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार 11, 21, 51 या 108 पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन कर सकते हैं।
रुद्राक्ष की महत्ता बताते हुए उन्होंने शिवभक्ति में रुद्राक्ष धारण करने की परंपरा का उल्लेख किया। साथ ही बच्चों के लिए भी रुद्राक्ष धारण करने की धार्मिक मान्यता के बारे में श्रद्धालुओं को जानकारी दी।
कथा के दौरान 'ॐ नमः शिवाय' के जयघोष और शिव भक्ति गीतों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। पं. सुभाषचंद्र शर्मा ने कहा कि मनुष्य का जीवन सीमित है और इस बहुमूल्य अवसर का उपयोग भक्ति, सेवा, सदाचार और अच्छे कर्मों में करना चाहिए। केवल दिखावे के बजाय जरूरतमंद की वास्तविक मदद करना भी ईश्वर की सच्ची सेवा है।
चारभुजा नाथ मंदिर में आयोजित यह सात दिवसीय शिवमहापुराण कथा श्रावण मास में श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर शिवमहापुराण का श्रवण कर रहे हैं और भक्ति के वातावरण में आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

