राजगढ़ में शिवमहापुराण कथा का भव्य समापन : ज्योतिर्लिंगों की दिव्य कथाओं से गूंजा चारभुजानाथ मंदिर

राजगढ़ चारभुजानाथ मंदिर में शिवमहापुराण कथा के सातवें दिन कथा सुनाते पं. सुभाषचंद्र शर्मा





 



 राजगढ़ (धार) । नगर में सावन मास के पावन अवसर पर चारभुजानाथ मंदिर में आयोजित शिवमहापुराण कथा के सातवें दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कथा व्यास पं. पू. सुभाषचंद्र शर्मा ने भगवान शिव की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए नागेश्वर,रामेश्वर और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रेरणादायक कथाएं सुनाईं। कथा के दौरान पूरा मंदिर परिसर "हर हर महादेव" और "ॐ नमः शिवाय" के जयघोष से गूंज उठा।

  कथा प्रारंभ होने से पहले भगवान शिव की भव्य आरती हुई,जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने दीप प्रज्वलित कर आरती में भाग लिया। इसके बाद भजन-कीर्तन के माध्यम से भक्तिमय वातावरण बन गया।

 कथा सौभाग्य से मिलती है,मन लगाकर सुनना ही सच्ची साधना

  कथावाचक पं. सुभाषचंद्र शर्मा ने कहा कि कथा केवल सौभाग्य से प्राप्त होती है और उसका वास्तविक आनंद तभी मिलता है जब श्रोता पूरे मन से उसे सुनें। उन्होंने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि दो सच्चे श्रोता भी हजारों की भीड़ से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि श्रद्धा और एकाग्रता ही कथा को सार्थक बनाती है।

  उन्होंने अपने परिवार,माता और दादी से मिली शिक्षा का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान घर के संस्कारों से मिलता है।

जगन्नाथ भगवान की कथा ने भावविभोर किया

  कथा के दौरान पं. शर्मा ने भगवान जगन्नाथ की उत्पत्ति से जुड़ी कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे भगवान कृष्ण,बलराम और सुभद्रा वृंदावन की लीलाओं को सुनते-सुनते भावविभोर होकर उस दिव्य स्वरूप में प्रकट हुए, जिसे आज जगन्नाथ,बलभद्र और सुभद्रा के रूप में पूजा जाता है। उन्होंने कहा कि कलयुग में जगन्नाथ भगवान की भक्ति विशेष फलदायी मानी गई है।

 नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा सुनाई

  कथावाचक ने गुजरात स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा सुनाते हुए बताया कि भगवान शिव के एक अनन्य भक्त ने कारागार में बंद रहने के बावजूद मानसी पूजा नहीं छोड़ी। उसकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए।

 रामेश्वरम की कथा और राम की शिवभक्ति

  रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का महत्व बताते हुए पं. शर्मा ने भगवान राम द्वारा लंका विजय से पूर्व भगवान शिव की आराधना का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि राम ने शिवलिंग की स्थापना कर पूजा की, जिसके बाद भगवान शिव ने विजय का आशीर्वाद दिया और वहीं रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। उन्होंने हनुमान द्वारा कैलाश से शिवलिंग लाने तथा हनुमतेश्वर की स्थापना की कथा भी सुनाई।

 घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की प्रेरणादायक कथा

  सातवें दिन की कथा में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा भी प्रमुख रही। उन्होंने बताया कि घुश्मा नामक शिवभक्त प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजा करती थीं। ईर्ष्या के कारण उनके पुत्र की हत्या कर दी गई, लेकिन उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पुत्र को जीवित कर दिया और घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

 कावड़ यात्रा और शिवभक्ति का महत्व बताया

  कथा के दौरान कावड़ यात्रा का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान शिव की ओर बढ़ाया गया प्रत्येक कदम भक्त के संकल्प को पूर्ण करने वाला माना गया है। उन्होंने श्रद्धालुओं से भगवान से धन-संपत्ति नहीं,बल्कि भक्ति मांगने का संदेश दिया।

सरदारपुर क्षेत्र के धार्मिक महत्व का उल्लेख

  कथावाचक ने सरदारपुर क्षेत्र को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पावन बताते हुए झिरणेश्वर धाम,भीमकुंड,हिडिंबा वन और अन्य पौराणिक स्थलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र का भगवान कृष्ण और पांडवों की कथाओं से विशेष संबंध माना जाता है।









  सातवें दिन की कथा में क्षेत्र के विधायक प्रताप ग्रेवाल तथा नगर परिषद अध्यक्ष प्रतिनिधि महेश जायसवाल सहित कई जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक पहुंचे। कथावाचक ने उनके सरल स्वभाव और गौसेवा के प्रति समर्पण की सराहना की।

अगले वर्ष देवी भागवत कथा का ऐलान

  कथा के समापन अवसर पर घोषणा की गई कि अगले वर्ष चारभुजानाथ मंदिर में देवी भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा। साथ ही जन्माष्टमी पर भव्य भजन संध्या और आगामी भागवत सप्ताह में श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने का आह्वान किया गया।

 भव्य आरती के साथ हुआ सातवें दिन का समापन

  सातवें दिन का समापन "ॐ जय शिव ओंकारा", "कर्पूर गौरम् करुणावतारम्" और "हर हर महादेव" के जयघोष के बीच सामूहिक आरती और मंत्र पुष्पांजलि के साथ हुआ। इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई।