राजगढ़ के चारभुजा नाथ मंदिर में शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन सुभाषचंद्र शर्मा ने सती के देह त्याग,वीरभद्र,भक्तों की महिमा,पारिवारिक संस्कार और शिव विवाह के प्रसंग सुनाए।
राजगढ़ (धार)। नगर के चारभुजा नाथ मंदिर में 16 अगस्त से प्रारंभ हुई सप्त दिवसीय संगीतमय शिव महापुराण कथा के तीसरे दिन 18 अगस्त को कथा का श्रद्धापूर्ण आयोजन हुआ। परम पूज्य सुभाषचंद्र शर्मा ने शिव महापुराण के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन करते हुए सती के त्याग,भगवान शिव के क्रोध,भक्तों की महिमा,पारिवारिक संस्कार,शिव विवाह की तैयारियों और जीवन में सच्चाई एवं विनम्रता के महत्व पर प्रकाश डाला।
कथा के दौरान उन्होंने कहा कि श्रावण मास भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष पावन माना जाता है। इस दौरान मनुष्य को अपना समय सत्संग,भजन,ध्यान और कथा श्रवण में लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में दिखावे के बजाय सत्य, संस्कार और विनम्रता को महत्व देना चाहिए।
सती ने सुना शिव का अपमान,यज्ञ कुंड में किया देह त्याग
कथा में सती और भगवान शिव के संवाद का प्रसंग सुनाते हुए सुभाषचंद्र शर्मा ने बताया कि सती अपने पिता दक्ष के यज्ञ में जाने की इच्छा व्यक्त करती हैं, लेकिन भगवान शिव उन्हें बिना निमंत्रण किसी गृहस्थ के यहां जाने से होने वाले अपमान के बारे में समझाते हैं। उन्होंने कहा कि हरि भजन और कथा सुनने के लिए बिना बुलाए भी जाया जा सकता है, लेकिन सांसारिक आयोजन में बिना निमंत्रण जाना उचित नहीं माना गया है।
इसके बाद सती दक्ष के यज्ञ में पहुंचती हैं,जहां दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किया जाता है। पति का अपमान सहन नहीं कर पाने पर सती यज्ञ कुंड में अपना शरीर स्वाहा कर देती हैं। सती के देह त्याग का प्रसंग सुनकर कथा पंडाल में श्रद्धालु भावुक हो गए।
वीरभद्र ने किया दक्ष यज्ञ का विध्वंस
सुभाषचंद्र शर्मा ने आगे बताया कि सती के देह त्याग और गणों पर हुए अत्याचार की जानकारी मिलने पर भगवान शिव क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को प्रकट किया। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद देवताओं ने भगवान शिव को प्रसन्न करने और स्थिति को शांत करने के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की।
भक्तों का जीवन सत्संग और भक्ति से होता है सार्थक
कथा वाचक ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय सत्संग,भजन,ध्यान और भगवान की भक्ति में लगाना चाहिए। उन्होंने ध्रुव,प्रह्लाद,नरसी मेहता और मीराबाई जैसे भक्तों के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए भक्ति की शक्ति को समझाया।
उन्होंने मीराबाई के द्वारिका जाने का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सच्ची भक्ति में भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव होना चाहिए। हिमालय राजा और मैना देवी की तपस्या से मां पार्वती के प्राकट्य का प्रसंग भी कथा में सुनाया गया।
बुजुर्गों का सम्मान ही परिवार की सबसे बड़ी ताकत
पारिवारिक रिश्तों पर प्रकाश डालते हुए सुभाषचंद्र शर्मा ने कहा कि पहले परिवारों में बड़ों के प्रति सम्मान और संस्कार का विशेष महत्व था। दादा-दादी और माता-पिता के अनुभव को परिवार की पूंजी माना जाता था। आज धन और दिखावे की दौड़ में कई बार प्रेम,सम्मान और पारिवारिक संस्कार पीछे छूटते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जिस घर में दादा-दादी और माता-पिता का आशीर्वाद मौजूद हो, वह घर सौभाग्यशाली होता है। बड़ों के पास बैठने से यश,बल,कीर्ति और आयु की प्राप्ति होती है। उन्होंने सास-बहू के एक प्रसंग के माध्यम से अनुभव और पारिवारिक ज्ञान के महत्व को भी समझाया।
शिव विवाह में अनूठा था भोलेनाथ का श्रृंगार
कथा के दौरान भगवान शिव के विवाह की तैयारियों का भी रोचक वर्णन किया गया। उन्होंने बताया कि शिव के गणों ने उन्हें सांपों से सजाया। सांपों को आभूषण के रूप में धारण कर भगवान शिव ने संसार को यह संदेश दिया कि वे काल के भी काल हैं। इसी भाव से भगवान शिव महाकाल कहलाते हैं।
शिव विवाह की बारात में बड़ी संख्या में गणों के शामिल होने का प्रसंग भी कथा में सुनाया गया। भगवान शिव का स्वरूप सामान्य देवताओं से अलग और अनूठा था,यही उनकी विशेषता भी थी।
विवाह में दिखावे से ज्यादा जरूरी हैं संस्कार
सुभाषचंद्र शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में विवाह जैसे संस्कारों में भी दिखावे का चलन बढ़ता जा रहा है। कई लोग अपनी क्षमता से अधिक खर्च कर केवल प्रतिष्ठा और दिखावे के लिए आयोजन करते हैं। उन्होंने कहा कि विवाह का वास्तविक उद्देश्य संस्कारों और परिवारों का जुड़ना है।
उन्होंने विवाह में गणपति पूजन,सोलह मात्रिकाओं का पूजन, कुलदेवता पूजन, मंगल अष्टक और ग्रह शांति जैसे धार्मिक संस्कारों के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि विवाह को केवल आयोजन नहीं बल्कि जीवन की नई जिम्मेदारी के रूप में समझना चाहिए।
बेटी को विदाई के समय दें संस्कारों की सीख
कथा में बेटी की विदाई का भावपूर्ण संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि बेटी जिस घर को अपने प्रेम और संस्कारों से महकाती है, उसी तरह उसे अपने नए परिवार को भी प्रेम और सम्मान से जोड़ना चाहिए। किसी को दुख न देना और परिवार में प्रेम बनाए रखना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।
कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से भगवान शिव का स्मरण किया। चारभुजा नाथ मंदिर में चल रही सप्त दिवसीय शिव महापुराण कथा को लेकर नगर एवं आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।

