मुख्यमंत्री मोहन यादव का भँवर मृत्युंजय सिंह दत्तीगांव के नेतृत्व में भव्य स्वागत,राजगढ़ के शनि मंदिर को मिले वर्ल्ड रिकॉर्ड्स संस्थाओं के सम्मान पत्रों का किया विमोचन
राजगढ़ (धार,मध्यप्रदेश)। धार जिले के राजगढ़ नगर स्थित अति प्राचीन श्री बरगद वाले शनिदेव मंदिर ने आस्था, पर्यावरण संरक्षण एवं सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त करते हुए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। मंदिर परिसर में स्थित ऐतिहासिक विशाल वटवृक्ष (बरगद) के संरक्षण तथा धार्मिक एवं पर्यावरणीय चेतना के उत्कृष्ट प्रयासों को विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं ने सम्मानित एवं मान्यता प्रदान की है।
मुख्यमंत्री मोहन यादव के भाबरा प्रवास के दौरान दत्तीगांव बंगले पर भँवर मृत्युंजयसिंह दत्तीगांव के नेतृत्व में भव्य स्वागत किया गया।
इस दौरान मुख्यमंत्री को श्री शनि शीतला माता मंदिर का चित्र भेंट किया गया। 51 किलो की पुष्पमाला द्वारा स्वागत किया गया। जान्हवीसिंह दत्तीगांव द्वारा गुलदस्ता भेंटकर अभिनंदन किया गया। अति प्राचीन श्री शनि मंदिर को सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय भंडारी के प्रयासों से विश्व की 11 संस्थाओं द्वारा वर्ड रिकॉर्ड्स प्रमाण पत्र का विमोचन मुख्यमंत्रीजी द्वारा किया गया। भँवर मृत्युंजयसिंह समिति सदस्य निलेश सोनी व अक्षय भंडारी द्वारा मुख्यमंत्री को मंदिर की प्राचीनता व विशेषताओं से अवगत करवाया गया।
लगभग तीन माह तक चले मूल्यांकन, दस्तावेजी अध्ययन एवं परीक्षण के उपरांत मंदिर को देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित रिकॉर्ड एवं सम्मान प्रदान करने वाली संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। यह उपलब्धि न केवल राजगढ़ नगर, बल्कि पूरे धार जिले एवं मध्यप्रदेश के लिए गर्व का विषय है।
श्री शनि-शीतला माता मंदिर समिति के सदस्य श्री निलेश सोनी ने बताया कि मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन विशाल वटवृक्ष और स्वयंभू शनिदेव महाराज की प्रतिमा सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रही है। अब इस धार्मिक एवं प्राकृतिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर मिली पहचान हम सभी के लिए अत्यंत गौरव एवं प्रसन्नता का विषय है।
उन्होंने बताया कि सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पित अक्षय भंडारी के सतत प्रयासों, दस्तावेजीकरण एवं समन्वय के परिणामस्वरूप मंदिर की इस विशिष्ट पहचान को विश्व स्तर तक पहुँचाने में सफलता मिली।
मंदिर की प्रमुख विशेषताएँ
- प्राकृतिक चमत्कार:
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ विराजमान शनिदेव की प्रतिमा मानव-निर्मित नहीं है। यह एक जीवित एवं प्राचीन बरगद वृक्ष की जड़ों के भीतर स्वयंभू स्वरूप में प्रकट हुई मानी जाती है। आस्था और प्रकृति का यह अद्भुत संगम इसे विश्व के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में स्थान दिलाता है।
- दुर्लभ सिंदूरी स्वरूप:
विश्व के अधिकांश शनिदेव मंदिरों में प्रतिमाएँ काले पत्थर की होती हैं, जबकि राजगढ़ स्थित इस मंदिर में शनिदेव का स्वरूप सिंदूरी रंग में पूजित है। यह विशेषता इसे अत्यंत दुर्लभ एवं विशिष्ट बनाती है।
- शनि–सूर्य का अद्वितीय संयोग:
मंदिर में विराजमान स्वयंभू प्रतिमा पूर्व दिशा अर्थात सूर्योदय की ओर स्थित है। धार्मिक मान्यताओं एवं ज्योतिषीय दृष्टि से यह शनि और सूर्य के अद्वितीय संयोग का प्रतीक माना जाता है, जो इस मंदिर की विशिष्ट पहचान है।
- प्रकृति-सम्मिलित वास्तुकला:
मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि प्राचीन बरगद वृक्ष को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुँची। संपूर्ण मंदिर वृक्ष के संरक्षण को केंद्र में रखकर विकसित किया गया है। यह भारतीय संस्कृति के "प्रकृति देवो भवः" के सनातन संदेश का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
मंदिर को वर्ल्ड वाइड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, अमेजिंग वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, ओएमजी बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, आईईए बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, एशिया कालिंग एक्सीलेंस बुक ऑफ रिकार्ड्स, लिंकन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, कर्नाटक अचीवर्स बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, असम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, आंध्र बुक ऑफ रिकॉर्ड्स तथा भारत टैलेंट्स बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सहित अनेक प्रतिष्ठित रिकॉर्ड संस्थाओं द्वारा सम्मान एवं मान्यता प्रदान की गई है।
इसके अतिरिक्त मंदिर की यह उपलब्धि केवल रिकॉर्ड संस्थाओं तक सीमित नहीं है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत प्रतिष्ठित संस्था एप्लाइड एनवायरनमेंटल रिसर्च फाउंडेशन (AERF) ने श्री शनि-शीतला माता मंदिर समिति को मंदिर परिसर में स्थित ऐतिहासिक विशाल बरगद (महावृक्ष) के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अपने "सेव गायंट ट्रीज़" कार्यक्रम के अंतर्गत "सर्टिफिकेट ऑफ ऑनर" प्रदान कर सम्मानित किया है।
एप्लाइड एनवायरनमेंटल रिसर्च फाउंडेशन (AERF) की स्थापना वर्ष 1995 में पुणे (महाराष्ट्र) में हुई थी। यह संस्था भारत में विशाल एवं ऐतिहासिक वृक्षों तथा निजी वनों के संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही है। अब तक संस्था 1,200 से अधिक विशाल वृक्षों को संरक्षण समझौतों के अंतर्गत शामिल कर चुकी है तथा 15,000 एकड़ से अधिक निजी वन क्षेत्र के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दे चुकी है।
AERF का कार्य राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा जाता है। संस्था Conservation International (Japan) तथा IUCN (International Union for Conservation of Nature) जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संस्थाओं के साथ समन्वय एवं सहयोग के माध्यम से जैव विविधता, प्राकृतिक धरोहरों और विशाल वृक्षों के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
श्री बरगद वाले शनिदेव मंदिर को मिला यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण का समन्वय न केवल स्थानीय समाज, बल्कि वैश्विक संरक्षण संस्थाओं द्वारा भी सराहा जा रहा है। मंदिर परिसर में स्थित ऐतिहासिक बरगद का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में एक प्रेरणादायी पहल है।
मंदिर द्वारा "एक मंदिर – एक संदेश" की अवधारणा को अपनाते हुए धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी संदेश समाज तक पहुँचाया जा रहा है। यह पहल यह सिद्ध करती है कि धार्मिक स्थल केवल पूजा-अर्चना के केंद्र ही नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और सामाजिक जागरूकता के भी सशक्त माध्यम बन सकते हैं।
इस अवसर पर अक्षय भंडारी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वटवृक्ष जीवन, आस्था और पर्यावरण का प्रतीक है। यदि समाज अपनी प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का सामूहिक संकल्प ले, तो स्थानीय विरासत भी वैश्विक पहचान प्राप्त कर सकती है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल मंदिर समिति का नहीं, बल्कि पूरे राजगढ़ नगर, धार जिले एवं मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का सम्मान है।
आज श्री बरगद वाले शनिदेव मंदिर आस्था, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के अद्वितीय समन्वय का प्रेरणास्रोत बन चुका है। यह स्थल भविष्य में आध्यात्मिक पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण तथा सांस्कृतिक धरोहर के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है।


