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अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस विशेष: राजगढ़ में लगभग 200 वर्ष प्राचीन वटवृक्ष का अनोखा रहस्य; तने में नहीं, सीधे 'जड़ों' से समाहित है यह प्राचीन प्रतिमा !







 



विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: अक्षय भंडारी, राजगढ़ (धार)

  राजगढ़ (धार)। आज 22 मई को देश और दुनिया में 'अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस' मनाया जा रहा है। इस विशेष अवसर पर, धार जिले का राजगढ़ नगर एक ऐसी विस्मयकारी और ऐतिहासिक धरोहर को सामने लाता है, जो प्राचीन इतिहास और पर्यावरण के बेजोड़ तालमेल का जीवंत उदाहरण है। नगर के वार्ड क्रमांक 9 में स्थित परिसर में एक विशालकाय वटवृक्ष (बरगद का पेड़) पिछले दो सौ से अधिक वर्षों से इतिहास का मूक गवाह बनकर खड़ा है, जो अपनी अनोखी बनावट और एक अनसुलझे रहस्य के कारण पूरे अंचल में गहरी जिज्ञासा और आस्था का केंद्र बना हुआ है।

वटवृक्ष के भीतर का गहरा राज: जड़ों से ही एकाकार है प्राचीन विग्रह

  इस ऐतिहासिक स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का कौतूहल पैदा करने वाला स्वरूप है। लगभग 200 वर्ष से भी अधिक पुराने इस विशाल वटवृक्ष के मुख्य हिस्से में एक प्राचीन सिंदूरी प्रतिमा मौजूद है, जो सदियों से अंचल के नागरिकों के लिए भगवान श्री शनिदेव के स्वरूप में पूजनीय और अगाध श्रद्धा का केंद्र है।
  स्थानीय जानकारों और मंदिर परंपरा से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, यह प्राचीन प्रतिमा किसी बाहरी माध्यम से लाकर यहाँ स्थापित नहीं की गई है, बल्कि यह शुरू से ही इस विशाल पेड़ के भीतर बसी हुई है। विस्मय की बात यह है कि इस विग्रह का आधार सीधे वटवृक्ष की मुख्य जड़ों के साथ अंदर तक गहराई से जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह आज भी एक अनसुलझा सवाल है कि प्राचीन काल में यह विशिष्ट प्रतिमा मूल रूप से किसकी स्वरूप में प्रकट हुई थी और यह सदियों पुराने जीवित पेड़ के साथ इस कदर कैसे समाहित हो गई। बिना किसी इंसानी छेड़छाड़ के, पेड़ और इस विग्रह का यह प्राकृतिक जुड़ाव वनस्पति शास्त्रियों और पुरातत्व के जानकारों के लिए भी बेहद दिलचस्प विषय है।

जैव विविधता का मूक प्रहरी

  यह विशालकाय बरगद का पेड़ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ दो सदियों से अधिक समय से इस क्षेत्र की माटी को निरंतर प्राणवायु (ऑक्सीजन) दे रहा है। आज अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के मौके पर, धर्म और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को दर्शाती यह अनूठी धरोहर राजगढ़ की ऐतिहासिक और पर्यावरणीय पहचान को और मजबूत करती है।




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