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युद्धग्रस्त विश्व में महावीर की अहिंसा: शांति की एकमात्र राह : श्रमण डॉ पुष्पेंद्र




 


  आज का विश्व एक विचित्र विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर विज्ञान, तकनीक और वैश्वीकरण ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएं दी हैं, वहीं दूसरी ओर युद्ध, हिंसा और असहिष्णुता ने मानवता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। विश्व के अनेक क्षेत्रों में चल रहे संघर्ष, आतंकवाद, सामरिक प्रतिस्पर्धा और आंतरिक कलह यह संकेत देते हैं कि भौतिक प्रगति के बावजूद मनुष्य अभी भी मानसिक और नैतिक रूप से अस्थिर है।
   ऐसे समय में जब राष्ट्र अपनी शक्ति का प्रदर्शन हथियारों और युद्ध के माध्यम से कर रहे हैं, मानव जीवन का मूल्य कहीं पीछे छूटता जा रहा है। युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह समाज, परिवार और व्यक्ति के मनोविज्ञान को भी प्रभावित करता है। हिंसा का यह वातावरण भय, असुरक्षा और अविश्वास को जन्म देता है, जिससे शांति और सह-अस्तित्व की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं।
   वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि हिंसा कभी भी स्थायी समाधान नहीं दे सकती। युद्ध भले ही किसी समस्या का तात्कालिक समाधान प्रतीत हो, लेकिन वह दीर्घकाल में और अधिक संघर्षों को जन्म देता है। आज आवश्यकता है एक ऐसे दृष्टिकोण की, जो केवल शक्ति और प्रभुत्व पर नहीं, बल्कि संवेदना, सह-अस्तित्व और नैतिकता पर आधारित हो।
   यहीं पर तीर्थंकर भगवान महावीर के अहिंसा के सिद्धांत की प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भगवान महावीर ने अहिंसा को केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे विचार, वचन और कर्म—तीनों स्तरों पर लागू किया। उनके अनुसार किसी भी प्राणी को पीड़ा पहुंचाना हिंसा है, चाहे वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष।
   प्रभु महावीर का अहिंसा का सिद्धांत आज के युद्धग्रस्त विश्व के लिए एक नैतिक दिशा प्रदान करता है। यदि हम उनके विचारों को गहराई से समझें, तो यह स्पष्ट होता है कि युद्ध की जड़ें बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले राग, द्वेष, अहंकार और लालच में निहित हैं। जब तक इन मानसिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण नहीं किया जाएगा, तब तक बाहरी शांति स्थापित नहीं हो सकती।
   आज के समय में हिंसा केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है। यह हमारे दैनिक जीवन में भी विभिन्न रूपों में उपस्थित है—विचारों की कट्टरता, शब्दों की कठोरता, सामाजिक विभाजन और डिजिटल माध्यमों पर फैलती नफरत के रूप में। महावीर का संदेश हमें यह सिखाता है कि वास्तविक अहिंसा का पालन तभी संभव है, जब हम अपने भीतर की नकारात्मकता को पहचानकर उसे नियंत्रित करें।
विशेष रूप से वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में, जहां राष्ट्रों के बीच अविश्वास और प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है, ऐसे वक्त पर तीर्थंकर महावीर का “जियो और जीने दो” का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है। यह सिद्धांत केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक नीतियों के लिए भी मार्गदर्शक बन सकता है। यदि राष्ट्र एक-दूसरे के अस्तित्व, संप्रभुता और हितों का सम्मान करें, तो संघर्ष की संभावनाएं स्वतः कम हो सकती हैं।
  इसके साथ ही,महावीर का अपरिग्रह का सिद्धांत भी वर्तमान युद्ध और हिंसा के मूल कारणों को समझने में सहायक है। संसाधनों की अंधाधुंध होड़, विस्तारवादी नीतियां और आर्थिक लालसा ही कई संघर्षों का आधार हैं। यदि सीमित इच्छाओं और संतुलित उपभोग को अपनाया जाए, तो न केवल सामाजिक असमानताएं कम होंगी, बल्कि युद्ध के कारण भी कमजोर पड़ेंगे।
महावीर द्वारा प्रतिपादित रत्नत्रय—सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र—आज के समय में एक समग्र समाधान प्रस्तुत करता है। सम्यक दर्शन हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर वस्तुस्थिति को समझने की प्रेरणा देता है। सम्यक ज्ञान हमें सत्य और असत्य में भेद करने की क्षमता प्रदान करता है, जिससे हम गलत सूचनाओं और भ्रामक विचारों से बच सकते हैं। और सम्यक चरित्र इन दोनों का व्यावहारिक रूप है, जो हमारे आचरण को नैतिक और संतुलित बनाता है।
  अतः यह स्पष्ट है कि वर्तमान समय में जब विश्व हिंसा और युद्ध की आग में झुलस रहा है, भगवान महावीर का अहिंसा का सिद्धांत केवल एक आध्यात्मिक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक आवश्यकता बन चुका है। यदि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र इस सिद्धांत को अपने जीवन और नीतियों में स्थान दें, तो न केवल संघर्षों को कम किया जा सकता है, बल्कि एक स्थायी और समरस विश्व की स्थापना भी संभव है।
  अंततः, शांति किसी बाहरी व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना का प्रतिबिंब है। जब मनुष्य अपने भीतर अहिंसा, करुणा और संतुलन को विकसित करेगा, तभी वह बाहरी दुनिया में भी शांति स्थापित कर सकेगा। यही तीर्थंकर महावीर का संदेश है—और यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता। 
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