स्पेशल स्टोरी : नारियल पानी को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि आखिर पेड़ के सबसे ऊपर लगे इस फल के मजबूत कवर के अंदर पानी भरता कैसे है? सोशल मीडिया पर इसे लेकर कई तरह की बातें होती हैं, लेकिन इसकी असलियत पूरी तरह वैज्ञानिक है। यह कोई बाहरी पानी नहीं है जो बारिश या नमी के जरिए अंदर घुसता हो, क्योंकि नारियल का बाहरी खोल पूरी तरह वाटरप्रूफ होता है।
इसकी असली प्रक्रिया पेड़ के संवहन तंत्र यानी Vascular System से जुड़ी है। दरअसल, नारियल का पेड़ अपनी जड़ों के जरिए जमीन से पानी और जरूरी मिनरल्स सोखता है। यह पानी ऑस्मोसिस की प्रक्रिया के जरिए पेड़ के तने से होता हुआ ऊपर फल तक पहुँचता है। नारियल के अंदर जो तरल हमें मिलता है, उसे वैज्ञानिक भाषा में लिक्विड एंडोस्पर्म (Liquid Endosperm) यानी तरल भ्रूणपोष कहा जाता है। यह एक तरह का रिजर्व फूड होता है जो फल के विकास और उसके भ्रूण को पोषण देने के लिए इकट्ठा होता है।
शुरुआती दौर में यह एंडोस्पर्म पूरी तरह लिक्विड फॉर्म में होता है, जो प्राकृतिक रूप से स्टेराइल और शुद्ध होता है। जैसे-जैसे नारियल पकने लगता है, यही तरल धीरे-धीरे ठोस होने लगता है और किनारे की दीवारों पर जमने लगता है, जिसे हम नारियल की गरी या गूदा कहते हैं। यहाँ यह समझना भी जरूरी है कि नारियल पानी और नारियल का दूध दो अलग-अलग चीजें हैं। नारियल पानी कुदरती तौर पर फल के अंदर मौजूद होता है, जबकि नारियल दूध पके हुए गूदे को पीसकर निकाला जाता है।
कुल मिलाकर, नारियल के अंदर का पानी असल में पेड़ द्वारा इकट्ठा किया गया वह पोषण है जो फल को बड़ा करने के लिए जरूरी है। यह इलेक्ट्रोलाइट्स और पोटैशियम का सबसे शुद्ध भंडार इसीलिए होता है क्योंकि यह पेड़ की जड़ों से लेकर फल तक एक लंबी और जटिल फिल्टर प्रक्रिया से होकर गुजरता है।



