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नए श्रम कोड से आसान हुई छंटनी, 60-70% उद्योग इकाइयाँ अब बिना सरकारी अनुमति कर्मचारियों को हटा सकेंगी

 

नए श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद देश के औद्योगिक ढांचे में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर के अनुसार, अब देश के लगभग 60-70 प्रतिशत उद्योग इकाइयों में कर्मचारियों की छंटनी के लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा इन बदलावों को “कर्मचारी हितैषी” बताने का आधार ही स्पष्ट नहीं है, क्योंकि संशोधन वास्तव में कर्मचारियों की सुरक्षा को कमजोर करते हैं।

कौर ने कहा कि इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड (IRC) में किए गए बदलावों ने छंटनी को बेहद आसान बना दिया है। अब केवल उन इकाइयों को सरकारी अनुमति लेनी होगी, जिनमें 300 या उससे अधिक कर्मचारी हैं, जबकि पहले यह सीमा 100 कर्मचारियों की थी। चूंकि देश की अधिकांश इकाइयों में 300 से कम कर्मचारी काम करते हैं, इसलिए वे अब बिना सरकारी दखल के कर्मचारियों को हटाने में सक्षम होंगी, बस नोटिस अवधि और मुआवजा देने की औपचारिकताएँ पूरी करनी होंगी।

इसी तरह, ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस (OSH) कोड, 2020 में “फैक्ट्री” की परिभाषा में किए गए बदलावों से छोटे कारखानों का एक बड़ा वर्ग अब बुनियादी सुरक्षा प्रावधानों के दायरे से बाहर हो गया है। पहले बिजली से चलने वाले 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान तथा बिना बिजली वाले 20 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान को फैक्ट्री माना जाता था, लेकिन नई संहिता में यह सीमा क्रमशः 20 और 40 कर्मचारियों कर दी गई है। इससे कई इकाइयाँ अब लाइसेंस, स्वास्थ्य-सुरक्षा प्रावधान, काम के घंटे और ओवरटाइम जैसी अनिवार्य शर्तों से मुक्त हो जाएंगी।

कौर ने चिंता जताई कि इंटर-स्टेट माइग्रेंट वर्कर्स एक्ट, 1979 की कई महत्वपूर्ण धाराएँ OSH कोड में पूरी तरह शामिल ही नहीं की गई हैं। उदाहरण के तौर पर, पहले प्रवासी मजदूरों को भर्ती के समय मिलने वाला डिस्प्लेसमेंट अलाउंस, और उनके लिए जरूरी पासबुक की अनिवार्यता-दोनों प्रावधान नए कोड में गायब हैं। इससे प्रवासी कामगारों के हितों को गंभीर क्षति होगी।

ट्रेड यूनियनों को लेकर भी उन्होंने नए नियमों को “अलोकतांत्रिक और श्रमिक-विरोधी” बताया। पहले केवल 7 सदस्य मिलकर यूनियन बना सकते थे, लेकिन अब इसके लिए कम से कम 100 सदस्य या कुल कार्यबल का 10% सदस्यता चाहिए। इससे छोटे समूहों के लिए यूनियन बनाना और आवाज उठाना कठिन हो जाएगा, जबकि मान्यता रद्द कराना पहले से आसान कर दिया गया है। अमरजीत कौर ने न्यूनतम वेतन निर्धारण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर 60-70 प्रतिशत इकाइयाँ बिना सरकारी मंजूरी के बंद हो सकती हैं या छंटनी कर सकती हैं, तो मजदूरों को समय पर वेतन दिलाने की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा?

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