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आलेख - "आदिवासी समाज" और "एमपी पीएससी" का सवाल...



  "आदिवासी" (भील) यह शब्द सुनकर ही मन में एक ऐसे समुदाय का चित्र बन जाता हैं, जिसमें महिलाएं अपने शरीर पर भारतीय संकृति से सुसज्जित आभूषणों के साथ भारतीय संस्कृति निर्माण की कल्पना को मूर्त रूप देती हैं, साथ ही इस समुदाय के पुरुषों का जहन में जिक्र उस समय की याद दिलाता हैं जब अयोध्या के राजा भगवान श्रीराम अपने हाथों में धनुष लिए बुराई का अंत करने वन में निकले थे। लेकिन कलयुगीन समस्याओं में उच-नीच के भेदभाव सहित अनेक समस्याओं से यह समुदाय कई दफा आहत हुआ हैं। सरकारे बनने से पहले इनके उत्थान की बाते करती हैं और उस पर खरा उतरने का प्रयास भी करती हैं। वर्तमान में आदिवासी समुदाय काफी शसक्त और शिक्षित हुआ हैं। लेकिन हाल ही में हुई मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परिक्षा के दूसरे प्रश्न पत्र में पूछे गए एक सवाल ने आदिवास समाज के हृदय में गहरा घाव किया। इसके बाद से ही आयोग के अधिकारियो पर सवाल उठने लगे हैं और उठना भी लाजमी क्यूँ ना हो..! जिस पीढ़ी को यह बताना जरूरी हैं कि आदिवासी समाज ना केवल मंदिरो में विराजे भगवान को भगवान मानता हैं, बल्कि आदिवासी तो जल, जंगल और जमीन को भी एक तरह से भगवान मानकर उनकी पूजा करता है। लेकिन आयोग ने तो आदिवासियों को "आपराधिक प्रवृत्ति" का बता डाला हैं। अगर आयोग को आदिवासी समाज से जुड़ा सवाल परीक्षार्थियों से पूछना ही था तो उनके द्वारा इस युग में जीवित रखी गई भारतीय संस्कृति के पैरोकार के रूप में बताना था। लेकिन आयोग के अधिकारियो ने इस सवाल के माध्यम से आदिवासियो के प्रति लगाव के बजाय उन्हें समझने और उनके जीवन यापन को जानने की जिज्ञासा को ही लगभग खत्म कर दिया हैं। मैं उस जगह निवास करता हूँ जहाँ पर आदिवासी समाज एक बड़े समुदाय के रूप में मौजूद हैं। शहरों में तो भारतीय संस्कृति का एक तरह से पतन हो गया हैं लेकिन गांवो में भारतीय संस्कृति को जीवित रखने में आदिवासियो का योगदान उनके बीच रहने वालों से ज्यादा कोई नही समझ सकता हैं। अब बात करें आयोग द्वारा पूछे गए प्रश्न की तो इसको लेकर आयोग के उन अधिकारियो को आदिवासियो के बीच लाकर उनका जीवन दर्शन करवाना चाहिए, ताकि भविष्य में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग तो क्या कोई भी विभाग आदिवासियो के संबंध में यह अवधारणा खत्म कर दें कि आदिवासी अपराधी नही हैं बल्कि यह तो वनवासी होकर भारतीय संस्कृति के आज भी ध्वज वाहक के रूप में माने जाते हैं। एक बार आदिवासियो का इतिहास पढ़ना अब उन अधिकारियो के लिए जरूरी हैं जिन्होंने यह सवाल परीक्षा के प्रश्न पत्र में डाला हैं...

उक्त लेख के लेखक  रमेश प्रजापति ( युवा पत्रकार) राजगढ़-सरदारपुर (धार) हैं...
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