समकालीन भक्ति,सामाजिक समरसता और अनुशासन का अनूठा अध्याय
अक्षय भंडारी - 9893711820
धार (मध्यप्रदेश)। मालवा की माटी केवल ऐतिहासिक शौर्य की गवाह नहीं, बल्कि उन लोक-परंपराओं की भी संरक्षिका है, जो समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं। धार जिले की सरदारपुर तहसील का ऐतिहासिक नगर राजगढ़ इसका जीवंत उदाहरण है। यहाँ भाद्रपद मास आते ही भक्ति किसी एक मंदिर या विशाल पंडाल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरा नगर एक वृहद देवस्थान में परिवर्तित हो जाता है।
यहाँ श्रीमद् भागवत महापुराण का आयोजन एक नहीं, बल्कि तेरह अलग-अलग सनातन धर्म मंदिरों में एक ही समयावधि में समानांतर रूप से संपन्न होता है। तेरह व्यासपीठों से एक साथ प्रवाहित होती कथा, एक ही क्षण गूँजती आरतियाँ और गलियों में उमड़ती अपार श्रद्धा - राजगढ़ की यह परंपरा भारतीय लोक-आस्था, अनुशासन और उत्कृष्ट सामुदायिक प्रबंधन का विलक्षण उदाहरण है।
जब एक विचार ने लिया कालजयी परंपरा का रूप
इस अनूठी कथा-परंपरा का बीजारोपण 20 सितंबर 1987 (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, रविवार) को हुआ था। उस समय नगर के प्रबुद्ध नागरिकों और श्री सनातन समाज राजगढ़ ने एक दूरदर्शी संकल्प लिया - पुण्य का प्रवाह केवल एक केंद्र तक सीमित न रहे, बल्कि नगर के हर प्रमुख मोहल्ले और विभिन्न समाजों के मंदिरों तक पहुँचे।
इसी पावन सोच के साथ प्रथम वर्ष दस मंदिरों में एक साथ कथा का श्रीगणेश हुआ। श्रद्धालुओं का जुड़ाव बढ़ता गया और 6 सितंबर 2008 (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, शनिवार) को इस श्रृंखला में तेरहवाँ मंदिर भी सम्मिलित हो गया। बीते तीन दशकों से अधिक समय से अनवरत जारी यह आध्यात्मिक साधना आज राजगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
नंद घर आनंद भयो - तेरह व्यासपीठ,एक ही लय
इस परंपरा की सबसे अनोखी बात यह है कि तेरह पृथक मंदिरों में विराजमान विद्वान कथावाचक निर्धारित समयानुसार कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हैं।
जब कथा श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के पावन प्रसंग पर पहुँचती है, तब लगभग एक ही क्षण में तेरहों मंदिरों से शंखध्वनि, घड़ियाल और जयघोष एक साथ गूँज उठते हैं। उस क्षण संपूर्ण राजगढ़ मानो एक विशाल प्रांगण में बदल जाता है। गली-गली से उठती नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की की स्वर-लहरियाँ, ढोल-नगाड़ों की थाप और माखन-मिश्री के प्रसाद की महक पूरे वातावरण को अलौकिक बना देती है। यहाँ भक्ति केवल सुनी नहीं जाती, बल्कि अनुभूत की जाती है।
महामारी भी नहीं डिगा सकी अटूट आस्था
किसी भी परंपरा की वास्तविक शक्ति उसकी निरंतरता में निहित होती है। वर्ष 2020 और 2021 में, जब कोविड-19 महामारी के कारण देशभर में सांस्कृतिक व धार्मिक आयोजन स्थगित थे, तब भी राजगढ़ की यह धारा थमी नहीं।
प्रशासनिक दिशा-निर्देशों का पूर्ण पालन करते हुए सभी 13 मंदिरों में सीमित उपस्थिति के बीच पोथी-स्थापना की गई। सभी मंदिरों में विधिवत पूजन, आरती और कथा-पाठ की परंपरा को अक्षुण्ण रखा गया। यह केवल आयोजन बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि संकट के समय में अपनी मूल चेतना और सामूहिक आस्था को जीवित रखने का अनुपम उदाहरण था।
जहाँ जातिगत सीमाएँ गौण,सामाजिक समरसता मुख्य
इस आयोजन का सबसे सुंदर सामाजिक आयाम इसका समावेशी स्वरूप है। यहाँ अलग-अलग समाजों द्वारा संचालित मंदिर इस आयोजन के केंद्र बनते हैं। सात दिनों तक जातीय व सामाजिक सीमाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं और संपूर्ण नगर एक परिवार की भाँति इस आध्यात्मिक अनुष्ठान में रम जाता है।
श्री सनातन समाज राजगढ़ के कुशल समन्वय से संचालित यह आयोजन सिद्ध करता है कि धार्मिक अनुष्ठान केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने और परस्पर संवाद का भी सशक्त माध्यम हैं।
राजगढ़ की 13-मंदिर श्रीमद् भागवत कथा हमें यही सिखाती है कि भक्ति को भव्य पंडालों की ज़रूरत नहीं, सच्चे मन की ज़रूरत होती है। जब तेरह अलग-अलग मोहल्लों के मंदिर एक ही समय पर, एक ही कथा सुनते हैं, तो वे सिर्फ कथा नहीं सुनते - वे पूरे नगर को एक परिवार बना देते हैं।
यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि परंपराएँ तभी जीवित रहती हैं, जब पूरा समाज उसे अपनी जिम्मेदारी समझे। राजगढ़ ने दिखाया है कि अगर संकल्प में एकता हो, तो तेरह अलग-अलग धाराएँ भी मिलकर एक ही ज्ञानगंगा बन सकती हैं। यही राजगढ़ का दुनिया को संदेश है।


