गुरु पूर्णिमा विशेष: गुरु के बिना शून्य है जीवन,समर्पण से ही मिलता है सच्चा मार्ग
धर्म। भारतीय संस्कृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा का दिन केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि यह अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले 'गुरु' के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है। इस गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर, सुप्रसिद्ध मोहनखेड़ा तीर्थ के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्य देव श्रीमद् विजय हितेश चंद्र सूरीजी महाराजा ने एक अत्यंत मार्मिक और जीवन को नई दिशा देने वाला संदेश दिया है।
गुरु ही हैं जीवन का कल्याणकारी आधार
आचार्य देव ने अपने विशेष संदेश में स्पष्ट किया कि भौतिक संसार में चाहे कितनी भी उपलब्धियां प्राप्त कर ली जाएं, लेकिन गुरु के बिना जीवन का न तो कोई वास्तविक आरंभ होता है और न ही कोई सही गंतव्य मिलता है। गुरु ही हमारे जीवन के सच्चे मार्गदर्शक और वह मजबूत आधार हैं, जो हर परिस्थिति में हमारा कल्याण करते हैं।
'गुरु हमारा हाथ थामें' - एक गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य
आचार्य श्री के संदेश का सबसे गहरा और प्रभावशाली विचार यह था कि हमारा पुरुषार्थ (प्रयास) केवल गुरु को खोजने का नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा होना चाहिए कि 'गुरु स्वयं हमारा हाथ थाम लें।' उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में एक बड़ा सत्य बताया— यदि हम इंसान गुरु का हाथ पकड़ने जाते हैं, तो हमारी कमजोरियों या सांसारिक परिस्थितियों के कारण हो सकता है कि वह हाथ हमसे छूट जाए। लेकिन, यदि हमारे भावों को देखकर गुरु ने स्वयं हमारा हाथ पकड़ लिया, तो वह जीवन में कभी नहीं छूट सकता।
समर्पण ही है गुरु का हृदय जीतने की कुंजी
गुरु का यह सान्निध्य और मंगलकारी आशीर्वाद कैसे प्राप्त हो? इसके उत्तर में आचार्य देव ने बताया कि इसके लिए पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है। जब कोई शिष्य पूर्ण तल्लीनता, भक्ति और समर्पण के भाव से गुरु की शरण में जाता है, तभी वह गुरु का हृदय जीत सकता है। यह समर्पण ही शिष्य को उसके आत्म-उत्थान के मार्ग पर ले जाता है।
आनंदमय जीवन का मंगल आशीर्वाद
इस विशेष अवसर पर, गच्छाधिपति आचार्य देव ने सभी भक्तों के लिए मंगलकामनाएं व्यक्त कीं। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि गुरु की कृपा से सभी का जीवन आनंदमय और प्रसन्नता से भरा रहे, और हर व्यक्ति निरंतर आगे बढ़ते हुए अपनी आध्यात्मिक प्रगति (आत्म-उत्थान) के मार्ग पर प्रशस्त हो।
आज के समय में जब चारों ओर वैचारिक भटकाव है, आचार्य देव श्रीमद् विजय हितेश चंद्र सूरीजी का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि जीवन की नैया पार लगाने के लिए एक सच्चे गुरु के मार्गदर्शन और उनके प्रति अटूट विश्वास से बड़ा कोई संबल नहीं है।


