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पुलिस ने दी गार्ड ऑफ ऑनर, परिवार ने निभाई अंतिम इच्छा: महेंद्र छाजेड़ का देहदान बना प्रेरणा









 






  राजगढ़ (धार)। कहते हैं इंसान जीते जी तो बस अपने काम आता है, लेकिन असली इंसान वो है जो स्वर्गवास के बाद भी दूसरों के काम आ जाए। राजगढ़ के वरिष्ठ नागरिक महेंद्र छाजेड़ ने ऐसा ही कर दिखाया। उनकी कहानी सुनकर आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या सच में देह का अंत भी इंसान की सेवा की भावना को रोक सकता है?

  महेंद्र छाजेड़ जैन समाज के प्रतिष्ठित और बेहद सम्मानित नागरिक थे। उन्होंने संथारा लेकर देह त्यागी, लेकिन उनकी आखिरी ख्वाहिश कुछ और ही थी। उन्होंने परिवार से कह रखा था — "मेरे बाद मेरा यह शरीर बेकार न जाए, किसी के काम आए।" इसी इच्छा का सम्मान करते हुए उनकी पत्नी मंजुला छाजेड़ ने यह कहा:

 "मैं इनकी पत्नी मंजुला छाजेड़ ने बताया इनकी हमेशा से इच्छा रही थी कि मेरा हमेशा अंगदान कभी भी मैं होऊँ तो अंगदान करना। उनकी इच्छानुसार मैं अपना फर्ज निभा रही हूँ और खुशी-खुशी मैं इनका पूरे शरीर का डोनेट कर रही हूँ।"

 जैसे ही खबर फैली तो कीर्ति भंडारी और चंदन शर्मा तुरंत पहुंचे। उन्होंने तुरंत देहदान की प्रक्रिया शुरू की। इंदौर से हेमंत छाबरिया जुट गए। उन्होंने एलएनसीटी मेडिकल कॉलेज के डॉ. स्वप्निल शारदा को फोन लगाया। डॉक्टर साहब ने इंदौर से अपनी टीम राजगढ़ रवाना कर दी।

  यह सिर्फ देहदान की कहानी नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार के नियमों के मुताबिक, जो भी शरीर दान करता है, उसे पुलिस का गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। इस बार पूरा राजगढ़ थाना इस सम्मान का गवाह बना। अनुविभागीय अधिकारी सलोनी अग्रवाल के निर्देश पर धार पुलिस ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ स्वर्गीय महेंद्र छाजेड़ को गार्ड ऑफ ऑनर देकर सलामी दी। इस कार्य में नायब तहसीलदार यादव जी और राजगढ़ थाना प्रभारी समीर पाटीदार का विशेष सहयोग रहा। सिर्फ सोचिए, एक ऐसा इंसान जो अब इस दुनिया में नहीं, उसके पार्थिव शरीर को पुलिस की सलामी की गूंज के साथ विदाई दी जा रही हो। उस वक्त देखने वालों की आंखें नम हो गईं।

 महेंद्र छाजेड़ की उदारता सिर्फ यहीं नहीं रुकती। डॉ. जी.एस. ददरवाल ने उनकी आंखों का दान किया। अब कोई दो व्यक्ति इस दुनिया को देख पाएंगे — उन्हीं की आंखों से। यानी महेंद्र छाजेड़ ने देह त्यागने के बाद भी दो लोगों को रोशनी देने का रास्ता बना दिया, एक मेडिकल कॉलेज को पढ़ने के लिए शरीर दिया, और पूरे समाज को यह सीख दे गए कि देना सिर्फ जीते जी नहीं, बल्कि इस शरीर से विदा होने के बाद भी दिया जा सकता है।

 इस पूरे पुनीत कार्य में अजय पंवार, नगर पालिका उपाध्यक्ष दीपक जैन, अक्षय भंडारी और कई लोगों ने सहयोग दिया।

 इस पूरी मुहिम के सूत्रधार हैं — जितेंद्र भंडारी (जैन)। वे पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं और 'नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान जनजागरण अभियान' के संयोजक हैं। उनकी तत्परता और समन्वय की बदौलत ही यह सब इतनी सहजता से संभव हो पाया।

  तो अगली बार जब आप किसी को अंगदान या देहदान से रोकें, तो याद कर लीजिएगा राजगढ़ के महेंद्र छाजेड़ को, जिनका शरीर आज इंदौर के एलएनसीटी मेडिकल कॉलेज में छात्रों को पढ़ा रहा है और उनका नेत्रदान किसी दो जरूरतमंद की आंखों में रोशनी भरेगा।

"जीते जी सब जीते हैं, असली जीत तो देह त्यागने के बाद होती है।"


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