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अष्टमी पर लिए जाएंगे वर्षीतप के संकल्प,इस वर्ष 14 महीने से अधिक चलेगी तप साधना,अगले वर्ष अक्षय तृतीया तक रहेगा उपवास-आहार का कठोर क्रम

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  धर्म।  जैन धर्म की तप परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले वर्षीतप के संकल्प इस वर्ष चैत्र कृष्ण अष्टमी (बुधवार, 11 मार्च 2026) को लिए जाएंगे। यह पावन दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ के जन्म कल्याणक के रूप में भी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
   इस अवसर पर जैन समाज के साधु-साध्वियाँ तथा श्रावक-श्राविकाएँ वर्षीतप का संकल्प लेकर कठिन तप साधना का आरंभ करेंगे। संकल्प लेने के बाद साधक अगले वर्ष अक्षय तृतीया तक उपवास और संयम का कठोर नियम निभाते हैं।
जैन समाज में वर्षीतप को सबसे कठिन और पुण्यदायी तपों में गिना जाता है। श्रद्धालु इसे केवल उपवास नहीं, बल्कि म आत्मसंयम, त्याग और आत्मशुद्धि की महान साधना मानते हैं। इस दौरान साधक संयमित जीवन, ध्यान, स्वाध्याय और धार्मिक साधना में समय व्यतीत करते हैं।

दो वर्षों तक चलता है तप का कठिन क्रम -

इस तप का नियम अत्यंत कठोर होता है। इसमें साधक पूरे तेरह महीने एक विशेष क्रम का पालन करते हैं—एक दिन पूर्ण उपवास,दूसरे दिन आहार। यह क्रम लगातार लंबे समय तक चलता रहता है। उपवास और आहार का यह क्रम लगभग एक वर्ष से अधिक अवधि तक चलता है, जिसके कारण इसे अत्यंत कठिन तप साधना माना जाता है।
  साधक इस दौरान अपने दैनिक जीवन को पूरी तरह अनुशासन में ढाल लेते हैं। भोजन, व्यवहार, वाणी, विचार और आचरण—सभी में संयम का पालन किया जाता है। तप का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, मन की स्थिरता और इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करना है।

23 प्रकार के आहारों का त्याग करेंगे साधक -

  वर्षीतप का संकल्प लेने वाले साधक कई प्रकार के आहारों का त्याग करते हैं। जैन धर्म की परंपरा के अनुसार इस तप में लगभग 23 प्रकार के खाद्य पदार्थों का त्याग किया जाता है।
इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं—
  बासी भोजन,जमीकंद, बहुबीज वाले पदार्थ, अधिक मसालेदार भोजन, तामसिक आहार। इसके साथ ही साधक अनेक अन्य धार्मिक नियमों का भी पालन करते हैं—रात्रि में जल ग्रहण नहीं करना, प्रतिदिन सुबह और शाम प्रतिक्रमण करना, दोनों समय गुरुवंदन करना,स्वाध्याय और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन।

ध्यान और आत्मचिंतन
   इस प्रकार वर्षीतप केवल उपवास की साधना नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संयम और आध्यात्मिक अनुशासन का अभ्यास है।

दीर्घकालीन तप के प्रेरणास्रोत -

   जैन समाज में कई संत और साधक वर्षीतप जैसी कठिन साधनाओं के माध्यम से समाज को प्रेरणा देते रहे हैं।
स्थानकवासी जैन श्रमण संघ के चतुर्थ आचार्य डॉ. शिव मुनि इस वर्ष 20 अप्रैल को अपना 41वाँ वर्षीतप पूर्ण कर 42वें वर्षीतप में प्रवेश करेंगे।
  इतने लंबे समय तक निरंतर तप साधना करने वाले आचार्य शिव मुनि जैन समाज के एकमात्र आचार्य हैं जो यह तपस्या कर रहे हैं, इसके अलावा हज़ारों की संख्या में साधु - साध्वी, श्रावक- श्राविकाएं यह तप साधना कर रहे है।
   उनकी तपस्या, त्याग और अनुशासन जैन समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं और अनेक श्रद्धालु उनसे प्रेरित होकर तप और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।

तेरह महीने तक नहीं मिला पारणा-

   जैन परंपरा के अनुसार जब भगवान आदिनाथ ने दीक्षा ग्रहण की, तब उन्होंने संकल्प लिया कि वे गन्ने के रस से ही अपना पारणा करेंगे।
   उस समय किसी को इस विधि की जानकारी नहीं थी, इसलिए कोई भी उन्हें गन्ने का रस अर्पित नहीं कर सका। परिणामस्वरूप उन्हें लगभग तेरह महीने तक पारणा नहीं मिला और वे निरंतर तपस्या करते रहे।
   अंततः उनका पहला पारणा हस्तिनापुर में हुआ। जैन परंपरा के अनुसार राजा श्रेयांस कुमार ने उन्हें गन्ने का रस अर्पित कर उनका पारणा कराया।
   इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में आज भी जैन समाज अक्षय तृतीया के दिन वर्षीतप का पारणा “इक्षुरस” से अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ करते है।


अधिकमास के कारण इस वर्ष बढ़ेगी तप की अवधि-

  धार्मिक पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में अधिकमास पड़ने के कारण इस बार वर्षीतप की अवधि सामान्य वर्षों की तुलना में अधिक रहेगी।

इस वर्ष ज्येष्ठ मास दो बार आएगा-

  एक सामान्य ज्येष्ठ और एक अधिक ज्येष्ठ। अधिकमास 17 मई 2026 से प्रारंभ होकर 15 जून 2026 तक रहेगा। इसके कारण वर्षीतप साधकों को लगभग 14 महीनों से अधिक समय तक तप साधना करनी होगी।

आत्मशुद्धि और संयम का महापर्व -
      
     श्रमण डॉ पुष्पेंद्र ने बताया कि वर्षीतप जैन धर्म में केवल तपस्या नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का महापर्व माना जाता है। यह तप मनुष्य को त्याग, धैर्य, अनुशासन और आत्मसंयम का पाठ पढ़ाता है।
आज के भौतिकवादी और भागदौड़ भरे जीवन में भी अनेक श्रद्धालु इस कठिन तप साधना को अपनाकर यह संदेश देते हैं कि आध्यात्मिक शक्ति, आत्मसंयम और आस्था के बल पर मनुष्य किसी भी कठिन साधना को पूर्ण कर सकता है।
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