जमशेदपुर। शहर सिर्फ़ ईंट-पत्थर का बना एक ढांचा नहीं होता, उसमें बसती हैं कहानियाँ संघर्ष की, उम्मीद की, और अपनेपन की। “ह्यूमन्स ऑफ जमशेदपुर” (Humans of Jamshedpur) ऐसा ही एक प्लेटफॉर्म है, जो हर हफ़्ते शहर की इन प्रेरक कहानियों को पूरे भारत तक पहुँचाने का काम कर रहा है। इस हफ़्ते पेश है एस. के. ज़ुल्फ़ुकार अली, जिसमें समय बदला, हालात बदले, पर शहर से जुड़ा रिश्ता कभी नहीं टूटा।
58 वर्षीय जमशेदपुरवासी एस. के. ज़ुल्फ़ुकार अली की यह दास्तान, उनके जन्म से पहले ही इस शहर में लिखनी शुरू हो गई थी। उनके दादा वर्ष 1919 में रोज़गार की तलाश में जमशेदपुर आए थे। पिता ने भी यही रास्ता अपनाया, मगर वर्ष 1964 के दंगों के बाद परिवार को वापस गाँव लौटना पड़ा। लगा कि जमशेदपुर से जुड़ा हर नाता समाप्त हो गया है। लेकिन तकदीर के धागे अक्सर वहीं ले जाते हैं जहाँ हमारा दिल अटका रहता है। वर्ष 1985 में उन्होंने स्वयं फैसला लिया, बड़ों की शुरू की गयी कहानी को आगे बढ़ाना है। चालीस–पचास रुपये जेब में और जिज्ञासा व हिम्मत दिल में लेकर वो जमशेदपुर लौट आए। यही सफ़र उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।
सरकारी स्कूल में पढ़े इस युवक के लिए अंग्रेज़ी एक नई दुनिया की तरह थी। चौथी कक्षा के बाद “हेन” और “कॉक” जैसे शब्दों से हुई शुरुआत, और यहाँ आकर लोगों को “चिकन” कहते सुनकर एहसास हुआ, सीखना अभी बहुत बाकी है। बिना किसी कोचिंग के उन्होंने पुरानी किताबों से, लोगों से, और अनुभवों से सीखा। आज भी उनका मानना है कि सबसे बड़ा ज्ञान किताबों से नहीं, देखने और समझने से मिलता है। इस शहर ने उन्हें परिवार भी दिया, दो बेटे और एक बेटी, जिसे उन्होंने महज़ 40 दिन की उम्र में गोद लिया था। “परिवार खून से नहीं, प्यार और जिम्मेदारी से बनता है।” उनकी बेटी आज कॉलेज में पढ़ रही है और उनकी सबसे बड़ी गर्व की वजह है।
उनका करियर बेलडीह के एक क्लब में कोच के रूप में शुरू हुआ। दिलचस्प बात यह कि जिस खेल के लिए उन्हें रखा गया था, उसके बारे में उन्हें शुरुआत में कुछ भी नहीं मालूम था। ईमानदारी से उन्होंने कहा-“मैं सिर्फ़ क्रिकेट और फुटबॉल जानता हूँ।” मगर सीखने की चाह ने उन्हें वहीं आगे बढ़ाया। बच्चों को प्रशिक्षित करते हुए उन्होंने अनुशासन और मानवीय समझ का सबसे बड़ा पाठ सीखा।
शहर के प्रति उनका प्रेम कभी कम नहीं हुआ। उनकी नज़र में जमशेदपुर व्यवस्था और सलीके का उत्कृष्ट उदाहरण है सड़कें, बिजली, पानी हो या किसी भी तरह की नागरिक सुविधाएँ, सब कुछ संतुलित और भरोसेमंद। और युवाओं के लिए उनका सीधा संदेश यह है कि “चलता है” वाली सोच छोड़ो। मेहनत और फैसले ही भविष्य बनाते हैं, किस्मत नहीं। यह कहानी सिर्फ़ एक व्यक्ति की जीवनयात्रा नहीं, बल्कि यह बताती है कि जमशेदपुर हर उस इंसान का शहर है, जो सपने देखने और उन्हें सच करने का साहस रखता है।



