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राजकमल किताब उत्सव का चौथा दिन,नवीन सागर,विनय दुबे और पवन करण की कविता-संग्रह का लोकार्पण




 



- भगत सिंह ने पहले से चुन रखा था शहादत का रास्ता : प्रदीप गर्ग
- हिमालय का हाल सबको पता है लेकिन उसे लेकर गहन चिंतन की कमी है : अजय सोडानी


   भोपाल। राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा हिन्दी भवन में आयोजित पाँच दिवसीय ‘किताब उत्सव’ के चौथे दिन पाँच सत्रों में कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस दौरान ‘भारतीय साहित्य का समकाल’, ‘देश प्रेम की विरासत’, ‘आलोचना का आज’ जैसे विषयों पर हुई चर्चा हुई। वहीं नवीन सागर और पवन करण की ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ और विनय दुबे की ‘सम्पूर्ण कविताएँ’ पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। अंतिम सत्र में हिमालय यात्री व लेखक अजय सोडानी ने अपनी किताब ‘एक था जांस्कर’ के सन्दर्भ में व्याख्यान दिया। 

*‘भारतीय साहित्य का समकाल’ पर चर्चा*

  पहले सत्र में ‘भारतीय साहित्य का समकाल’ विषय पर चर्चा हुई जिसमें राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानन्द निरुपम, कथाकार व लोकभारती प्रकाशन के सम्पादक मनोज कुमार पाण्डेय और राजकमल उर्दू के सम्पादक तसनीफ़ हैदर ने हिस्सा लिया। इस दौरान वक्ताओं ने साहित्य की बहुभाषिकता और उसकी सामाजिक भूमिका पर विचार साझा किए।
  
  मनोज कुमार पांडेय ने कहा कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति सभी भाषाओं को नहीं समझ सकता, ऐसे में अनुवादक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। देश में लगभग 60 भाषाओं में उपन्यास लिखे जा रहे हैं। ऐसे में हिन्दी के साथ-साथ अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ना भी ज़रुरी है। अन्य भाषाओं के साहित्य से हमें सीखना चाहिए, क्योंकि साहित्य लोगों के बीच की दूरी को कम कर शत्रुता और तटस्थता की भावना को खत्म करता है और मैत्री के भाव को बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा कि साहित्य लोगों को जीवन के विभिन्न रंगों और कोणों से अवगत कराता है।
  
  वहीं, तसनीफ़ हैदर ने कहा कि आज के दौर में एक इंसान के भीतर कई तरह की दुनिया मौजूद है और साहित्य उसे आईना दिखाने का काम करता है। साहित्य के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को पहचान पाता है। उन्होंने कहा कि यह प्रतिस्पर्धा का दौर है और साहित्य व्यक्ति को हार और जीत दोनों को स्वीकार करने का तरीका सिखाता है। आज की कहानियों में मानवीय और अंदरूनी समस्याओं की चर्चा बढ़ी है, जो समाज की वास्तविकताओं को सामने लाती है।

देश प्रेम की विरासत पर हुई चर्चा
 
  दूसरे सत्र में प्रदीप गर्ग की किताब ‘क्रांतिपथ का पथिक : दास्तान भगतसिंह की’ के सन्दर्भ में चर्चा हुई। इस अवसर पर वक्ताओं ने भगत सिंह के विचारों और उनकी विरासत पर प्रकाश डाला। विजय बहादुर ने कहा कि जिसे हम क्रांतिकारी मानते हैं, वह दरअसल एक आम आदमी की तरह अपने जीवन से गहरा प्रेम करता है। उनके भीतर एक लेखक और कवि की संवेदनशीलता भी थी। उन्होंने कहा कि जो लोग भगत सिंह को सच्चाई के साथ महसूस करना चाहते हैं, उनके लिए यह किताब बहुत मददगार साबित होगी।

  प्रदीप गर्ग ने कहा कि आम धारणा के विपरीत भगत सिंह ने पहले से शहादत का रास्ता चुन रखा था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह गलतफहमी है कि महात्मा गांधी ने भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। उन्होंने बताया कि जब भगत सिंह हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े, तब से किसी भी प्रकार की डकैती की घटना नहीं हुई। गर्ग ने कहा कि भगत सिंह के बारे में कई मिथक फैले हुए हैं, जिनको इस पुस्तक में तोड़ने का प्रयास किया गया है।

‘आलोचना का आज’ विषय पर परिचर्चा

  तीसरे सत्र ‘आलोचना का आज’ में वक्ताओं ने समकालीन साहित्यिक आलोचना की चुनौतियों और उसके बदलते स्वरूप पर विचार व्यक्त किए। अवधेश त्रिपाठी ने कहा कि रचनाकार और आलोचक के बीच का संबंध कमजोर हुआ है। उन्होंने कहा कि आलोचना का आज लोकतंत्रीकरण हो चुका है और बुक-इंस्टाग्रामर तथा इन्फ्लुएंसर्स के प्रभाव के कारण पेशेवर आलोचकों का महत्व घटा है। त्रिपाठी के अनुसार, किसी विधा को समझने की प्रामाणिकता पहले आलोचक से मिलती थी, ऐसे में आलोचक की ‘मृत्यु’ एक सांस्कृतिक संकट की ओर इशारा करती है। उन्होंने आगे कहा कि आलोचना की दिशा तय करना ही रचनाओं का मार्ग तय करना है पर आज आलोचना दोहरे संकट से जूझ रही है—एक, यह अकादमिक दायरे तक सीमित हो गई है और दूसरा, व्यावहारिक आलोचना की कमी है।

  वहीं, विजय बहादुर सिंह ने कहा कि आलोचक कला के रहस्यों को समझने वाला होता है। मात्र एक स्कॉलर आलोचक नहीं बन सकता। जैसे लेखक का पाठकों से रिश्ता होता है, वैसे ही आलोचक का भी समाज से जुड़ा होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सच्चा आलोचक समय-समय पर ही जन्म लेता है और आलोचना रचना से कहीं अधिक कठिन कार्य है। आज के दौर में कई आलोचक अपनी जिम्मेदारियों से कटते जा रहे हैं, जो साहित्य के लिए एक चुनौती है।

कविताओं की तीन किताबें हुईं लोकार्पित

  अगले सत्र में कवि नवीन सागर और पवन करण की ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ और विनय दुबे की ‘सम्पूर्ण कविताएँ’ पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। इस दौरान वक्ताओं ने कविता की संवेदनशीलता और उसके बदलते स्वरूप पर अपने विचार व्यक्त किए।

  शम्पा शाह ने कहा कि एक सहृदय पाठक के बिना कुछ कविताएँ अपना रूप ही नहीं खोल पातीं। उन्होंने नवीन सागर की कविताओं पर बात करते हुए कहा कि उनकी तमाम कविताओं में से किसी एक ‘बुरी कविता’ को ढूँढना मुश्किल है। उनकी विशेषता यह है कि वे अपनी ही कविताओं में स्वयं को कठघरे में खड़ा करते हैं।

  पवन करण ने कहा कि आजकल शीर्ष प्रकाशकों ने कविता प्रकाशित करने से लगभग मना कर दिया है। यह स्थिति आनेवाले समय के लिए सही संकेत नहीं है। विजय बहादुर सिंह ने कहा कि नवीन सागर की कविताओं में सूक्ष्म अनुभव-बोध है। उन्होंने कवि विनय दुबे का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी कविताएँ सुनकर शुरुआत में यह लगता है कि वे कविता कह ही नहीं रहे, लेकिन अंत में वे ऐसी गहरी बात कह जाते हैं जिसका अनुमान लगाना कठिन होता है। उन्होंने कहा कि सच्चा कवि वही है जो सौ लोगों में अलग ढंग से लिखे। विनय दुबे की विशेषता यह है कि उनकी कविता में सभी लोग अनचाहे भी मौजूद हो जाते हैं।

हिमालय का आज : एक हिमालय यात्री की चिन्ता

  अंतिम सत्र में हिमालय यात्री व लेखक अजय सोडानी ने अपनी किताब ‘एक था जांस्कर’ के सन्दर्भ में व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि आज हिमालय पर क्या हो रहा है, यह सबको पता है लेकिन हमारे बीच से गहन चिंतन अनुपस्थित है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि सब जानते हुए भी हम इसके लिए कुछ कर क्यों नहीं रहे हैं।

  सोडानी ने कहा कि हिमालय के मरने की खबर हमारे पास नहीं आती। हर जगह का समकाल अलग होता है, लेकिन लोगों को यह भ्रम में डाला गया है कि सब समान है। उन्होंने कहा कि हमें हमारे भूतकाल को खारिज करना सिखाया गया है। दुनिया दो हिस्सों में बंटी है—एक वे जो प्रकृति के लिए लड़ते हैं और दूसरे जो प्रकृति को हराना चाहते हैं।

  उन्होंने आगे कहा कि जिन्हें केवल वैभव और ज़मीन चाहिए, उनका लोकतंत्र से कोई वास्तविक नाता नहीं है। आज की दुनिया को ‘तोड़ो और बाँटो’ का आसान सूत्र मिल गया है और अधिकांश संघर्ष नदियों और पहाड़ों के बीच ही है। उन्होंने चिंता जताई कि आज विरोध करने वाले बहुत कम बचे हैं और जो बचे भी हैं, उन्हें जेल में डाल दिया जा रहा है।

किताब उत्सव के अंतिम दिन बुधवार को होंगे ये कार्यक्रम

  किताब उत्सव के अंतिम दिन बुधवार को दोपहर 2:30 बजे से कार्यक्रम शुरू होगा। पहले सत्र में मनोज कुमार पांडेय, तसनीफ हैदर और सुमेर सिंह राठौड़ अपनी किताबों के चुनिंदा अंशों का पाठ करेंगे। इसके बाद उस्मान ख़ान के चर्चित कविता-संग्रह ‘इच्छाओं के जीवाश्म’ पर मनोज कुमार पांडेय उनसे संवाद करेंगे। अगले सत्र में नीलेश रघुवंशी की नई किताब ‘गद्य का पानी’ का लोकार्पण होगा। इसके बाद फ़िल्म निर्माता-लेखक सीमा कपूर की आत्मकथा ‘यूँ गुज़री है अब तलक’ और पराग मांदले के कहानी-संग्रह ‘बाकी सब तो माया है’ पर चर्चा होगी। 

  किताब उत्सव का समापन भव्य ‘काव्य-संध्या’ से होगा जिसमें राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, नीलेश रघुवंशी, सविता भार्गव, अनिल करमेले, आरती, वसंत सकरगाए, श्रुति कुशवाहा, आस्तीक वाजपेयी, अरुणाभ सौरभ, चित्रा सिंह और धीरेन्द्र सिंह फैयाज अपनी कविताएँ प्रस्तुत करेंगे। सत्र का संचालन अभिषेक वर्मा करेंगे।
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