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खरमोर अभयारण्य पर संकट: वन विभाग की चूक से किसानों और पक्षियों दोनों का भविष्य खतरे में




 

 पावर ग्रिड और ट्रांसमिशन लाइन निर्माण में नियमों की अनदेखी, किसानों ने की तत्काल रोक लगाने की मांग

   धार, सरदारपुर: खरमोर अभयारण्य का अस्तित्व अब खत्म होने की कगार पर पहुंच चुका है। न खरमोर बचे, न मोर—इनकी उड़ान वन विभाग के लापरवाह अधिकारियों की नीतियों और गलतियों ने छीन ली है। कभी पक्षियों की किलकारियों से गूंजने वाला यह क्षेत्र अब एक गहरे सन्नाटे में डूबता जा रहा है। बीते 41 वर्षों से विसंगतियों का दंश झेल रहे इस अभयारण्य में न केवल पक्षियों के संरक्षण में विफलता मिली है, बल्कि यहां के किसानों और स्थानीय ग्रामीणों को भी तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

   सरकार जहां वन्यजीव संरक्षण के लिए प्रयासरत है, वहीं मध्य प्रदेश वन विभाग की लापरवाही संरक्षण के इन प्रयासों पर पानी फेर रही है। धार जिले की सरदारपुर तहसील में स्थित यह अभयारण्य 348.12 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, और इसके साथ 250 मीटर का इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) अधिसूचित है। इस संरक्षित क्षेत्र में 14 ग्राम पंचायतों को शामिल किया गया है, लेकिन इसका सीधा असर वहां रहने वाले किसानों और स्थानीय निवासियों पर पड़ा है। वे अपनी निजी भूमि का क्रय-विक्रय नहीं कर सकते, रजिस्ट्री और नामांतरण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

  सबसे गंभीर बात यह है कि संरक्षित क्षेत्र में 14 ग्राम पंचायतों  पिछले 16 वर्षों में खरमोर पक्षी विलुप्त हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद वन विभाग संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है। वास्तविकता यह है कि अभयारण्य के अंदर भी इन पक्षियों को उचित संरक्षण नहीं मिल सका।

वन विभाग की बड़ी गलती: ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइन की अनुमति

  अब इस अभयारण्य के अस्तित्व पर एक और खतरा मंडरा रहा है। ग्राम अमोदिया (धुलेट फोरलेन के पास) में स्थापित 400/220 kV पावर ग्रिड सबस्टेशन के लिए कोई पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) नहीं किया गया। यह संरक्षित क्षेत्र से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, लेकिन न तो वन विभाग से, न ही पर्यावरण मंत्रालय से कोई औपचारिक अनुमति ली गई।

  सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पावर ग्रिड के दस्तावेजों में इसे "राजगढ़ (धुलेट)" के नाम से दर्शाया गया है, जिससे संदेह की स्थिति बन गई है। यह ग्रिड गुजरात और मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों को बिजली आपूर्ति करता है ।

  इसी पावर ग्रिड से 220 kV की ट्रांसमिशन लाइन बिछाई जा रही है, जिसमें भी नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की 80वीं बैठक में साफ निर्देश दिए गए थे कि खरमोर अभयारण्य और उसके पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) में ट्रांसमिशन लाइन भूमिगत (Underground) होगी, जबकि अभयारण्य क्षेत्र से बाहर इसे ओवरहेड (Overhead) रखने की अनुमति दी गई थी।

  लेकिन, मध्यप्रदेश वन विभाग की एक प्रशासनिक त्रुटि के कारण आदेश की प्रतिलिपि में "ओवरहेड" शब्द जोड़ दिया गया, जिससे जिला वन विभाग, प्रशासन और किसानों के बीच भारी भ्रम की स्थिति पैदा हो गई। यह गलती न केवल सरकारी आदेशों की मूल भावना के विपरीत है, बल्कि किसानों और स्थानीय अधिकारियों के लिए अव्यवस्था और अन्याय की स्थिति भी उत्पन्न कर रही है।

किसानों ने किया विरोध,कार्य पर रोक लगाने की मांग

  इस प्रशासनिक लापरवाही से नाराज किसानों ने एसडीएम और वन विभाग को ज्ञापन सौंपकर इस त्रुटि को सुधारने की मांग की। किसानों का कहना है कि जब तक इस गलती को दुरुस्त नहीं किया जाता और निर्धारित शर्तों के अनुसार कार्य नहीं किया जाता,तब तक इस परियोजना पर अविलंब रोक लगाई जाए।

  इस दौरान ग्राम अमोदिया के सोहन चोयल, संतोष सोलंकी, भानु सोलंकी और राजगढ़ के बाबुलाल कुशवाह सहित कई पीड़ित किसान ज्ञापन सौंपने पहुंचे। वे कल कलेक्टर और एसपी को भी ज्ञापन देंगे।

   किसानों का कहना है कि यदि प्रशासन और वन विभाग जल्द से जल्द इस गलती को नहीं सुधारते हैं, तो यदि कार्यवाही नहीं हुई, तो न्याय के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।




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