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साधु संसार मे रहते है,संसार साधु मे नही रहता : श्री दिलीप मुनिजी म.सा

 


 राजगढ़(धार)। यह संसार एक मुसाफ़िर खाना है, यहाँ जन्म लेने वाले मनुष्य का कोई भी स्थायी संबंध नही है, फ़िर भी मनुष्य पागलो की तरह स्वार्थ के संबंधो के लिए पाप कार्य करता रहता है, यहाँ जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव की मृत्यु निशचित है, जन्म ओर मरण का यह फ़ेर अनादि काल से गतिमान है, जन्म मरण की समझ केवल मानव को होती है,किसी अन्य प्राणी को नही, ईतनी समझ होने के बाद भी मानव निरंतर पाप कार्य करता रहता है, कर्म के बंध तो स्वयं भगवान को भी भोगना पड़े चाहे वो महावीर हो या राम, कर्म की सत्ता से कोई भी नही बच सकता है, अन्य धर्म अपने अनुयायी को भक्त बनने की प्रेरणा देते है, लेकिन परमात्मा महावीर का शासन प्रत्येक इंसान को स्वयं परमात्मा बनने का मार्ग बताता है, लोग कहते है की साधु साध्वी भगवंत भी तो ईसी संसार मे रहते है ये सत्य है की साधु साध्वी जी म.सा भी ईसी संसार मे रहते है लेकिन साधु ओर संसारी मे इतना फ़र्क होता है की साधु संसार मे तो रहते है किन्तु साधु साध्वी जी मे संसार नही होता है, मोक्ष की अभिलाषा करने वाले प्रत्येक जीव को संसार का त्याग करके संयम पथ को ग्रहण करना पड़ता है, तभी वो मुक्ति को प्राप्त होता है, जीनवाणी का श्रवण प्रत्येक मानव के भागय मे नही होता है विरले पुण्यवान जीव ही जीनवाणी का श्रवण कर सकते है, आपके राजगढ नगर मे जैन समाज की 2500-3000 की संख्या होने के बाद भी प्रवचन मे 250-300 की उपस्थिति भी नही होती है ये अत्यंत सोचनीय विषय है आप सभी ईस बात पर अवश्य चिंतन करे, उक्त प्रेरणादायी प्रवचन बुधवार को स्थानक भवन पर आयोजित धर्मसभा मे तपस्वीराज पूज्य श्री दिलीप मुनिजी म.सा ने व्यक्त किये, धर्मसभा को युवा संत पूज्य श्री गिरीश मुनिजी म.सा के द्वारा संबोधित करते हुए जीव अजीव, जड़ चेतन, जन्म मृत्यु के भेद के बारे मे सार गंभीर प्रवचन दिए गए है, समाज के हेमंत वागरेचा ने बताया की बड़ी संख्या मे उपस्थित समाजजन अति उत्साह के साथ जीनवाणी का लाभ प्रतिदिन ले रहे है।

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