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विद्या की प्राप्ति बिना विनय के सम्भव नहीं : मुनि पीयूषचन्द्रविजय

 



 राजगढ़ (धार) । वर्षा ऋतु के चातुर्मास में जिन वाणी का श्रवण श्रावक-श्राविका अपनी आत्मा के विकास के लिये करते है । विद्या की प्राप्ति बिना विनय के सम्भव नहीं होती है । उत्तराध्ययन सूत्र के प्रथम शब्द में ही विनय भाव जीवन में अंगीकार करने के लिये कहा गया है । हम जब भी आचार्यश्री व गुरु भगवन्त के दर्शन वंदन करने के लिये जाये, वंदन से पूर्व आचार्यश्री या गुरुभगवन्त से वंदन करने की आज्ञा लेना चाहिये । भगवान महावीर के 630 वर्षो बाद आचार्य श्री आर्यरक्षितसूरीश्वरजी म.सा. ने अध्ययन की दृष्टि से 45 आगम को 4 अनुयोगों में विभक्त किया जो द्रव्यानुयोग, चरणकरणानुयोग, गणितानुयोग,  धर्मकथानुयोग के नाम से जाने जाते है । धर्मकथानुयोग में सभी महापुरुषों के जीवन का उल्लेख आता है । उत्तराध्ययन सूत्र प्रभु महावीर की 16 प्रहर की अंतिम देशना है व 45 आगमों का इसमें सार है । प्रभु की विद्यमान स्थिति में 9 गणधर निर्वाण को प्राप्त हो चूके थे एवं प्रथम गणधर श्री गौतमस्वामीजी को केवलज्ञान की प्राप्ति प्रभु श्री महावीरस्वामी के निर्वाण के पश्चात् हुई । उस समय संघ की व्यवस्थाओं का भार श्री सुधर्मास्वामी पर आया तभी से श्री सुधर्मास्वामी की पाट परम्परा प्रारम्भ हुई जो 11 गणधर में से सुधर्मास्वामी की पाट परम्परा आज तक विद्यमान है और सुधर्मास्वामी की पाट परम्परा से ही सौधर्मबृहत्तपोगच्छीय परम्परा का आरम्भ हुआ । परमात्मा के 34 अतिशय होते है । साधना के मार्ग में साधक की कई परीक्षाऐं होती है । गुरु हमारे पथ प्रदर्शक होते है । बिना गुरु के साधना सम्भव नहीं है । उक्त बात रविवार को राजेन्द्र भवन राजगढ़ की 50 दिवसीय प्रवचन माला में गच्छाधिपति आचार्य देवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्यरत्न मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. ने कही । आपने कहा कि अपात्र को कभी भी शिक्षा नहीं दी जा सकती है । अपनी साधना की शक्ति का शक्तिपात योग्य पात्र पर ही किया जाना चाहिये । किसी व्यक्ति ने खीर बनायी सभी सुखे मेवें आदि का उपयोग किया और उस स्वादिष्ट खीर में यदि एक बुंद जहर की गिर जाये तो वह जहर पुरी खीर को खराब कर सकता है । इसी प्रकार छोटी सी चूक भी साधना में असफलता दिलवा देती है ।

आज सोमवार को प्रवचन से पूर्व में अनिलकुमार मनोहरलालजी खजांची परिवार ने उत्तराध्ययन सूत्र एवं श्री मथुरालालजी प्यारचंदजी मोदी परिवार ने धन्यकुमार चरित्र नियमित चलने वाले प्रवचन के लिये मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. एवं मुनिराज श्री जिनचन्द्रविजयजी म.सा. को व्होराया ।

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