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आचार्यश्री रवीन्द्रसूरिजी म.सा. की पंचम पूण्यतिथि मनायी

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राजगढ़ (धार) 09 जुलाई 2021 । श्री आदिनाथ राजेन्द्र जैन श्वे. पेढ़ी ट्रस्ट श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ के तत्वाधान में सप्तम पट्टधर अर्हत् ध्यानयोगी प.पू. गच्छाधिपति आचार्य देवेश श्रीमद्विजय रवीन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पंचम पूण्यतिथि शुक्रवार को मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री रजतचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री वैरागयशविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जिनचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जीतचन्द्रविजयजी म.सा., मुनिराज श्री जनकचन्द्रविजयजी म.सा. एवं साध्वी श्री सद्गुणाश्री जी, साध्वी श्री संघवणश्री जी, साध्वी श्री विमलयशाश्री जी म.सा. आदि ठाणा की निश्रा में मनायी गयी ।






इस अवसर पर मुनिराज श्री जीतचन्द्रविजयजी म.सा. ने कहा कि मैं आचार्य श्री रवीन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के सानिध्य में वर्ष 2015 में आया तभी से उनका शिष्य बनने की मेरी प्रबल भावना थी पर वे हमेशा मुझे टालते रहे और अंतिम समय में हित शिक्षा प्रदान करते हुऐ मुझे कहा कि तुमको श्री ऋषभचन्द्रविजयजी म.सा. का शिष्य बनना है और मेरा आशीर्वाद में हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा । मुनिश्री ने कहा की मेने तभी से उनके आदर्शो पर चलने का संकल्प लिया और मैं सच्चाई, सरलता के साथ अपने संयम जीवन को आगे बढ़ा रहा हूॅं । किसी ने ठीक ही कहा कि भक्त गुरु के होते है चेलो के नहीं । आज हम कितनी भी प्रगति क्यों ना कर ले पर गुरु आखिर गुरु ही होता है हमें गुरु की बराबरी करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिये । हम उनकी भावनानुसार तीर्थ विकास में अपना पूरा योगदान देगें । साध्वी श्री तत्वलोचनाश्री जी म.सा. ने भी भावांजलि अर्पित करते हुए अपने संस्मरण सुनाये ।

इस अवसर पर तीर्थ के मेनेजिंग ट्रस्टी सुजानमल सेठ ने कहा कि आचार्य श्री रवीन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. अर्हत् ध्यानयोगी होकर हमेशा ध्यान साधना में रत रहते थे । वे करुणा की मूर्ति थे । आप जीवन में परोपकार की भावना रखते थे । हम उनके बताये हुऐ मार्ग पर चल कर तीर्थ विकास में अपना योगदान देने का पूरा प्रयास कर रहे है । हम उनकी भावनाओं को पूर्ण करें और उनके अधूरे कार्य को पूरा करें तभी हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

कोषाध्यक्ष हुक्मीचंद वागरेचा ने कहा कि सियाणा के दोनों नन्दन ने अपने प्रयास व सोच के अनुसार श्री मोहनखेड़ा तीर्थ का विकास कर तीर्थ को विश्व के मानचित्र पर लाये । यह बात अलग है की आचार्य श्री रवीन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. हमेशा धीमी गति से कार्य करने के पक्षधर थे जबकि आचार्य श्री ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. त्वरित निर्णय के पक्षधर हुआ करते थे पर दोनों का विजन तीर्थ विकास का ही था ।

ट्रस्टी मेघराज जैन ने कहा कि जब आचार्य रवीन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की आचार्य पदवीं की बात चली उस वक्त उन्होंने आचार्य पदवीं का मोह नहीं रखने की बात कही मगर समाज के निर्णय के आगे फिर आचार्य बने । आचार्यश्री हमेशा प्रकृति प्रेमी होकर जंगलों में ही ध्यान साधना करने के पक्ष में रहते थे । आचार्य श्री रवीन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. आत्मज्ञानी थे । आचार्य श्री ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. को उनके जन्मदिवस पर पांच मिनट तक सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद के साथ अर्जित योग साधना से शक्ति पात किया । ट्रस्टी मांगीलाल रामाणी ने भी अपनी भावांजलि व्यक्त करते हुये अपने संस्मरण सुनाये ।

कार्यक्रम में मेनेजिंग ट्रस्टी सुजानमल सेठ, कोषाध्यक्ष हुक्मीचंद वागरेचा, ट्रस्टी मेघराज जैन, मांगीलाल रामाणी, राजगढ़ श्रीसंघ से अरविंद जैन, तीर्थ के महाप्रबंधक अर्जुनप्रसाद मेहता, सहप्रबंधक प्रीतेश जैन सहित वरिष्ठ समाजसेवी उपस्थित थे ।

प्रातः की वेला में मुनिराज श्री रजतचन्द्रविजयजी म.सा. ने इक्कीसा का पाठ करवाया गया व लाभार्थी परिवार द्वारा आरती उतारी गयी । इसके पश्चात् सामुहिक सामायिक हुई पश्चात् गौशाला में गायों को गुड़ लापसी, कबूतरों को दाना परोसा गया ।

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