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अभिधान राजेंद्र कोष के साथ राजगढ़ से मोहनखेड़ा तक निकली ऐतिहासिक पैदल यात्रा,हाथी,बग्गी और लोकनृत्य के साथ उमड़ा श्रद्धा का सैलाब









 



  
   राजगढ़ (धार)। जैन समाज के महान सुधारक और युगदृष्टा प.पू. प्रातः स्मरणीय श्रीमद् विजय राजेन्द्रसूरिश्वरजी महाराज साहेब के दीक्षा एवं आचार्य पदवी दिवस के पावन अवसर पर आज राजगढ़ की पावन धरा से श्री मोहनखेड़ा महातीर्थ तक एक भव्य और ऐतिहासिक पैदल यात्रा संघ का आयोजन किया गया। इस गौरवमयी यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता 'अभिधान राजेन्द्र कोष' की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिसे पहली बार पैदल यात्रा में शामिल कर एक नया इतिहास रचा गया।

शाही ठाट-बाट और सांस्कृतिक छटा के साथ हुआ संघ प्रयाण

  मंगलवार सुबह 8:30 बजे मण्डी गेट स्थित निवास स्थान से संघ का प्रस्थान जयकारों के साथ हुआ। यात्रा की भव्यता देखते ही बनती थी; सबसे आगे धर्म की केसरिया ध्वजा लहरा रही थी, जिसके पीछे सुसज्जित गजराज (हाथी) और गुरुदेव का दिव्य रथ चल रहा था। यात्रा के आकर्षण में चार चाँद तब लग गए जब पारंपरिक आदिवासी लोकनृत्य की प्रस्तुति ने मार्ग को जीवंत बना दिया।

  विशेष रूप से 7 सुसज्जित बग्गियाँ इस यात्रा का मुख्य केंद्र रहीं, जिनमें लाभार्थी परिवार के सदस्य जैन धर्म के महान विश्वकोश 'अभिधान राजेन्द्र कोष' के खंडों को ससम्मान अपने हाथों में लेकर चल रहे थे। पूरे मार्ग में समाजजनों ने जगह-जगह गुरुदेव की रथ प्रतिमा के समक्ष गहुली की और संघपति परिवार का आत्मीय स्वागत व बहुमान किया। इस पैदल संघ के पुण्यशाली लाभार्थी अशोक राजमलजी भण्डारी परिवार (राजगढ़) रहे।

धर्मसभा में गुरुदेव के ज्ञान और त्याग का गुणगान

  मोहनखेड़ा तीर्थ पहुँचने पर आयोजित विशाल प्रवचन सभा में  राष्ट्रसंत प.पू. कोंकण केशरी गच्छाधिपति आयार्च देवेश श्रीमद्विजय लेखेन्द्रसूरिश्वरजी म. सा. ने गुरुवंदन के पश्चात धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि आचार्य भगवंत की आराधना में बैठने का अवसर मिलना ही अपने आप में पुण्य का उदय है। यही 'वटवृक्ष' हमें संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा प्रदान करता है।

 प.पू. गच्छाधिपति आचार्यदेव श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरिश्वरजी म.सा. के शिष्य प.पू. मुनिराज श्री पियूषचन्द्रविजयजी महाराज ने गुरुदेव के संघर्षमयी जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज का दिन दादा गुरुदेव के दीक्षा और आचार्य पदवी का दिन है। आज ही की तिथि से रत्नराज जी से राजेंद्र सूरीश्वरजी बनने की वह महान यात्रा शुरू हुई थी, जो अंतिम समय तक ज्ञान की सतत साधना बनी रही। गुरुदेव ने 60 वर्ष की आयु में 'अभिधान राजेन्द्र कोष' की रचना का बीड़ा उठाया था। उनकी यही ज्ञान साधना, त्याग और चरित्र तप की यात्रा आज हमारे सामने है। वे सच्चे अर्थों में संघ के सुधारक थे और श्री त्रिस्तुतीक श्री संघ की पहचान ही गुरुदेव से है।

अभिधान राजेंद्र कोष: एक वैश्विक धरोहर

  प.पू. गच्छाधिपति आचार्यदेव हितेशचन्द्रसूरिश्वरजी महाराज ने इस ऐतिहासिक ग्रंथ की महत्ता बताते हुए कहा कि अभिधान राजेंद्र कोष में समस्त विषयों का समावेश है। इसे प्रिंट करने में ही 17 वर्ष का लंबा समय लगा था। आज यह अनुपम कोष केवल भारत ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के कई प्रमुख संग्रहालयों में भी जैन दर्शन का गौरव बढ़ा रहा है।

ट्रस्ट मंडल द्वारा सम्मान 

  कार्यक्रम के दौरान लाभार्थी परिवार ने आचार्य द्वय एवं साध्वी मंडल को भक्ति भाव से कांबली ओढ़ाई। साथ ही, वर्षीतप की कठोर आराधना में लीन मुनि पीयूष चंद्र विजयजी महाराज साहब का भी विशेष बहुमान करते हुए उन्हें कांबली ओढ़ाई गई। श्री आदिनाथ राजेंद्र जैन श्वेतांबर पेढ़ी ट्रस्ट मंडल की ओर से सुजामनल सेठ ने संघपति भण्डारी परिवार के गुरु समर्पण भाव की अनुमोदना की और ट्रस्ट मंडल की ओर से उनका सम्मान किया।

  आयोजन के अंत में प्रफुल्लकुमार, प्रितेशकुमार सुमेतीलालजी सराफ परिवार की ओर से आयोजित स्वामीवात्सल्य में सकल जैन श्रीसंघ ने बड़ी संख्या में पधारकर जिनशासन की शोभा बढ़ाई।

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