यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि भारत में शिक्षा एक उद्योग बन चुकी है। बच्चे आज ज्ञान हासिल करने से ज्यादा टॉपर बनने की दौड़ में धकेले जा रहे हैं। हर सड़क, हर दीवार और हर वेबसाइट पर कोचिंग संस्थानों के विज्ञापन दिखाई देते हैं, जिनमें आईएएस या अन्य परीक्षाओं के टॉपर मुस्कुराते हुए दिखते हैं। इन विज्ञापनों का मकसद यही होता है कि छात्र और उनके परिवार इस विश्वास में आ जाएँ कि इन संस्थानों में पढ़कर कोई भी टॉपर बन सकता है। लेकिन सच्चाई अक्सर इन दावों से बिल्कुल अलग होती है। कई बार जिन छात्रों की तस्वीरों का इस्तेमाल किया जाता है, वे उस संस्था से नियमित रूप से पढ़े भी नहीं होते। कई संस्थान तो केवल टेस्ट सीरीज़ देने वाले छात्रों को भी “अपना टॉपर” बताकर प्रचार कर देते हैं। धीरे-धीरे यह पूरा सिस्टम शिक्षा से ज्यादा मार्केटिंग पर आधारित हो गया है।
कोचिंग इंडस्ट्री आज हजारों करोड़ रुपये का कारोबार है, जो भावनाओं और सपनों पर खड़ी है। परिवार अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में अपनी जमा-पूँजी तक खर्च कर देते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि हर छात्र टॉपर नहीं बन सकता। टॉप करना कुछ चुनिंदा छात्रों की मेहनत, धैर्य और अपनी पढ़ने की आदतों का परिणाम होता है, जो अक्सर सेल्फ-स्टडी से ही हासिल होता है। लेकिन जब हर जगह सिर्फ टॉपरों की तस्वीरें दिखाई जाती हैं, तो सामान्य छात्र भी यह मान बैठता है कि यही सफलता का एकमात्र रास्ता है। इसी वजह से आज छात्रों में दबाव और चिंता बढ़ रही है। असफलता का डर इतना गहरा हो चुका है कि कई छात्र मानसिक तनाव का शिकार होते हैं और कई मामलों में यह स्थिति आत्महत्या तक पहुँच जाती है।
यह समझना बहुत जरूरी है कि शिक्षा का असली उद्देश्य जीवन को समझना, कौशल बढ़ाना और सोचने की क्षमता विकसित करना था। लेकिन आज कई संस्थान शिक्षा से ज्यादा उपलब्धियों का व्यापार कर रहे हैं। इस व्यापार में छात्र की असली क्षमता और रुचि कहीं गुम हो जाती है। विज्ञापन इतने प्रभावशाली होते हैं कि छात्र यह भूल जाते हैं कि हर किसी का सफर अलग होता है। टॉपर बनना ही सफलता नहीं है, बल्कि अपनी क्षमता के अनुसार सही दिशा में मेहनत करना ही असली उपलब्धि है।
इस स्थिति में सरकार का हस्तक्षेप भी बेहद आवश्यक हो गया है। शिक्षा विज्ञापनों के लिए सख्त नियम बनाए जाने चाहिए, ताकि झूठे या भ्रामक दावे करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई हो सके। ऐसे कानून से न केवल छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि कोचिंग इंडस्ट्री में पारदर्शिता भी बढ़ेगी। यह जरूरी है कि संस्थान शिक्षा को सेवा की तरह देखें, न कि टॉपरों की तस्वीरें बेचकर पैसे कमाने का माध्यम। छात्रों और अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि सफलता सिर्फ एक रैंक या नंबर से तय नहीं होती। हर बच्चा अपनी क्षमता में अलग होता है और हर किसी की मंज़िल भी अलग होती है। अगर किसी को सफलता न मिले, तो निराश होने की जरूरत नहीं। जीवन में अवसर बहुत हैं और असफलता कभी अंत नहीं होती। असली सफलता अपने सपनों और अपनी मेहनत पर विश्वास रखने में है, न कि किसी कोचिंग के विज्ञापन में दिखने वाली मुस्कान में।



