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श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ अट्ठम तप की आराधना का तृतीय दिन प्रभु की उपासना करने वाला कभी दुःखी नहीं होता : मुनि पीयूषचन्द्रविजय



  राजगढ़ (धार) । श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु की उपासना में सभी आराधक अट्ठम तप की तीसरे पायदान की ओर अग्रसर हो चूके है । आज आराधना का तीसरा दिन है ओर सभी आराधकों का तीसरा उपवास सुखशातापूर्वक हो रहा है । हम सभी प्रभु पार्श्वनाथ भगवान के जीवन वृतांत का श्रवण कर रहे है । उत्सर्पिणी व अवसर्पिणी दोनों ही काल में 24-24 तीर्थंकर होते है । उत्सर्पिणी काल के नवमें तीर्थंकर दामोदर स्वामी के समक्ष अषाढ़ी श्रावक ने प्रभु से प्रश्न किया कि मुझे मोक्ष कब प्राप्त होगा और मेरी मुक्ति कब होगी । प्रभु ने कहा कि तुम अवसर्पिणी काल के 23 वें तीर्थंकर प्रभु श्री पार्श्वनाथ प्रभु के आर्यघोष नाम के गणधर बनोगें तब तुम्हारी आत्मा का कल्याण होगा व मोक्ष की प्राप्ति होगी । यदि सामान्य व्यक्ति अट्ठम तप की आराधना करें और देवी या देवता खुश होकर वरदान मांगने का कहे तो सामान्य व्यक्ति सुख समृद्धि की कामना करता है पर सच्चा श्रावक ऐसी कोई मांग नहीं करता है । अषाढ़ी श्रावक को प्रभु की उपासना का भाव जागृत हो गया ओर प्रभु प्रतिमा का निर्माण प्रारम्भ करवाया । उक्त बात श्री राजेन्द्र भवन राजगढ़ में गच्छाधिपति आचार्य देवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्यरत्न मुनिराज श्री पीयूषचन्द्रविजयजी म.सा. ने कही । आपने कहा कि अषाढ़ी श्रावक द्वारा बनवायी गयी श्री शंखेश्वर तीर्थ में विराजित पार्श्वनाथ प्रभु की प्रतिमा श्वेत वर्ण 7 फणो वाली व 71 इंच की है । यह प्रतिमा तीनों ही लोको में प्रचलित है । यहां सभी श्रावक श्राविकाओं की मनोकामना पूर्ण होती है । प्रभु की उपासना करने वाला कभी दुःखी नहीं होता है । हम प्रभु से क्या मांगते है ? प्रभु ने जो संसार में त्याग दिया है हम उसी की मांग प्रभु से अभी तक करते चल आये है । मांगने वाला भिक्षुक कहलाता है । एक मंदिर के बाहर मांगता है तो दूसरा मंदिर के अंदर मांगता है । अंदर वाले और बाहर वाले में कोई अंतर नहीं है । दोनों ही एक ही श्रेणी के है । धर्म दो प्रकार के होते है निश्चय धर्म और व्यवहार धर्म ।

गुरुवार को प्रातः 8 बजे श्री मथुरालालजी प्यारचंदजी मोदी परिवार राजगढ़ की और अट्ठम तप के आराधकों के पारणे का आयोजन राजेन्द्र भवन में रखा गया है । पारणे के पश्चात् तपस्वीयों एवं लाभार्थी परिवार का बहुमान सकल जैन श्रीसंघ राजगढ़ की और से श्री पुखराजजी मांगीलालजी मेहता परिवार द्वारा किया जावेगा ।

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