राजगढ़ में साध्वीजीद्वय ने अभिग्रह के साथ 36 उपवास की दीर्घ तपस्या पूर्ण की। दादा गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी के जन्म द्विशताब्दी वर्ष में हुआ यह तपस्या प्रसंग बना प्रेरणा का विषय।
राजगढ़-धार । पुण्यनगरी राजगढ़ (राजगृही) में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वीजीद्वय ने 36 उपवास की दीर्घ तपस्या का अभिग्रह पूर्वक पारणा कर आध्यात्मिक साधना का प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया। यह तपस्या पूज्य दादा गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के जन्म द्विशताब्दी वर्ष के अवसर पर विशेष अभिग्रह के साथ पूर्ण की गई।
पूज्य दादा गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के जन्म द्विशताब्दी वर्ष के अवसर पर राजगढ़ में विराजित गच्छाधिपति श्रीमद्विजय नित्यसेनसूरीश्वरजी म.सा. एवं आचार्य श्रीमद्विजय जयरत्नसूरीश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी श्री अनंतदृष्टाश्रीजी म.सा. एवं साध्वी श्री मयूरकलाश्रीजी म.सा. की सुशिष्या साध्वी श्री प्रवज्यानिधिश्रीजी म.सा. एवं साध्वी श्री आर्यनिधिश्रीजी म.सा. ने 36 उपवास की कठिन तपस्या पूर्ण की।
चातुर्मास समिति के कीर्ति भण्डारी ने बताया कि पूज्य दादा गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. ने लगभग 125 वर्ष पूर्व राजगढ़ नगर में अपना अभिग्रह किया था। उसी ऐतिहासिक प्रसंग की स्मृति को आगे बढ़ाते हुए साध्वीजीद्वय ने दादा गुरुदेव के जन्म द्विशताब्दी वर्ष में 36 उपवास का अभिग्रह लेकर तपस्या को समर्पित किया।
विशेष अभिग्रह के अनुसार पारणा पूज्य दादा गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के नाम के प्रथम अक्षर ‘र’ तथा पूज्य गुरुणी श्री अनंतदृष्टाश्रीजी म.सा. के नाम के प्रथम अक्षर ‘अ’ वाले श्रावक या श्राविका के माध्यम से पूर्ण किया जाना था। यह अभिग्रह श्रीमती राजकुमारीजी कापड़िया एवं श्रीमती अमिताजी कापड़िया के निवास पर पूर्ण हुआ।
साध्वीजीद्वय की इस दीर्घ तपस्या की जानकारी समाजजनों के बीच सार्वजनिक रूप से नहीं थी। अभिग्रह की विशेष जानकारी भी साध्वीजीद्वय के अतिरिक्त किसी अन्य को ज्ञात नहीं थी। तपस्या पूर्ण होने के बाद जब इस अभिग्रह की जानकारी सामने आई तो जैन समाज में इसे साधना, संयम और श्रद्धा का प्रेरणादायी प्रसंग माना गया।
जैन परंपरा में अभिग्रह का विशेष महत्व
जैन धर्म में अभिग्रह को तप और संयम की अत्यंत महत्वपूर्ण साधना माना जाता है। उपवास या तपस्या के दौरान साधक द्वारा मन में किसी विशेष परिस्थिति, नियम या शर्त के पूर्ण होने पर ही आहार या पारणा ग्रहण करने का संकल्प लिया जाता है, उसे अभिग्रह कहा जाता है।
अभिग्रह में साधक अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण होने तक तपस्या जारी रखता है। निर्धारित परिस्थिति पूरी नहीं होने पर साधक पारणा नहीं करता और अपने तप को आगे जारी रखता है। यही कारण है कि अभिग्रह को आत्मसंयम, दृढ़ संकल्प और आध्यात्मिक अनुशासन से जुड़ी विशेष साधना माना जाता है।
राजगढ़ में साध्वीजीद्वय द्वारा 36 उपवास का अभिग्रह और उसका निर्धारित विधि से पारणा जैन समाज के लिए श्रद्धा एवं प्रेरणा का विषय बना है। दादा गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. के जन्म द्विशताब्दी वर्ष में हुआ यह तपस्या प्रसंग राजगढ़ की धार्मिक परंपरा और जैन साधना के इतिहास में एक विशेष अध्याय के रूप में देखा जा रहा है।

